गलतफ़हमी की दीवार
सुबह का समय था।
मोहल्ले में चाय की खुशबू फैल रही थी।
औरतें दरवाज़े के बाहर झाड़ू लगा रही थीं और बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी चल रही थी।
उसी मोहल्ले में रहती थी आरती।
दो साल पहले उसने अपनी पसंद से शादी की थी। इसलिए मोहल्ले में उसे लोग प्यार से नहीं, ताने मारकर “लव मैरिज वाली बहू” कहते थे।
उसका पति समीर एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था।
घर में सास शकुंतला देवी, देवर रोहन और ननद पायल भी रहते थे।
मोहल्ले के ठीक सामने वाले घर में डॉक्टर करण रहते थे।
वह शहर में नए थे। उनका परिवार दूसरे शहर में रहता था, इसलिए वे यहाँ अकेले ही रहते थे। शांत स्वभाव, पढ़े-लिखे और विनम्र इंसान थे, इसलिए धीरे-धीरे मोहल्ले में उनकी अच्छी छवि बन गई थी।
एक शाम घर के सारे लोग नीचे बैठे थे।
आरती अपने कमरे में कपड़े समेट रही थी।
तभी दरवाज़ा धीरे से खुला।
पायल अंदर आई। उसके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
“भाभी… मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
आरती मुस्कुराई,
“अरे, इतनी घबराई हुई क्यों हो? क्या बात है?”
पायल ने दरवाज़ा बंद किया और कुछ पल चुप खड़ी रही।
उसके हाथ काँप रहे थे।
“भाभी… मैं करण से शादी करना चाहती हूँ। हम दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। काफी समय से बात कर रहे हैं। लेकिन घर वाले कभी नहीं मानेंगे। माँ तो सुनते ही नाराज़ हो जाएँगी।”
आरती ने ध्यान से पायल की बात सुनी।
वह तुरंत जवाब नहीं दी।
कुछ पल कमरे में खामोशी रही।
फिर आरती ने धीरे से पूछा,
“क्या करण भी तुमसे शादी करना चाहता है? या ये सिर्फ तुम्हारी तरफ से है?”
पायल ने तुरंत कहा,
“नहीं भाभी, वो भी मुझसे शादी करना चाहता है। उसने अपने घर पर भी बात की है। लेकिन हम दोनों जानते हैं कि यहाँ सबसे बड़ी मुश्किल हमारे घर वाले हैं।”
आरती ने गहरी साँस ली।
वह जानती थी कि इस घर में प्रेम विवाह का नाम लेना भी आसान नहीं है।
फिर उसने पायल का हाथ पकड़ा और कहा,
“अगर तुम दोनों सच में एक-दूसरे से प्यार करते हो, और शादी के लिए गंभीर हो… तो मैं तुम्हारी मदद करूंगी। लेकिन कोई भी कदम सोच-समझकर उठाना होगा। जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला बाद में पछतावा बन जाता है।”
पायल की आँखों में उम्मीद चमक उठी।
“सच भाभी? आप मेरी मदद करेंगी?”
आरती मुस्कुराई,
“हाँ, लेकिन एक शर्त पर — झूठ, छुपाव और गलत तरीका नहीं अपनाएँगे। हम सही समय का इंतज़ार करेंगे और सही तरीके से बात करेंगे।”
पायल की आँखों में आँसू आ गए।
वह बोली,
“आप सच में मेरी सबसे बड़ी ताकत हैं भाभी।”
आरती ने उसके सिर पर हाथ रखा।
उसे अंदाज़ा नहीं था कि इस एक फैसले से आने वाले दिनों में कितना बड़ा तूफ़ान खड़ा होने वाला है।
टिफिन का राज़...
पायल रोज़ बड़े मन से करण के लिए खाना बनाती थी।
वह हर डिब्बा बड़ी सफाई से सजाती, ताकि करण को घर जैसा स्वाद मिले।
लेकिन किसी को शक न हो, इसलिए टिफ़िन देने आरती जाती थी।
वह चुपचाप जाती, टिफ़िन देती और तुरंत वापस आ जाती।
मगर मोहल्ले की औरतों की नज़रें हमेशा खिड़कियों के पीछे से लगी रहती थीं।
उन्हें जैसे किसी खबर का इंतज़ार रहता था।
एक दिन शांति ने खिड़की से झाँकते हुए कहा,
“देखा तुम लोगों ने? रोज़-रोज़ डॉक्टर के घर जाती है। कुछ तो गड़बड़ जरूर है।”
दूसरी औरत ने बात को और हवा देते हुए कहा,
“हम तो पहले ही कह रहे थे, लव मैरिज वाली बहू पर भरोसा नहीं करना चाहिए। ऐसी बहुएँ अपनी मर्ज़ी की मालिक होती हैं।”
तीसरी बोली,
“अभी तो शुरुआत है, आगे-आगे देखो क्या होता है।”
बस फिर क्या था —
धीरे-धीरे ये कानाफूसी पूरे मोहल्ले में फैल गई।
हर घर में उसी बात की चर्चा होने लगी, और बिना सच्चाई जाने ही आरती को शक की नज़रों से देखा जाने लगा।
बाजार वाली घटना...
एक दिन दोपहर के समय आरती और पायल बाजार जाने के लिए घर से निकलीं।
घर वालों से उन्होंने कहा था कि उन्हें रसोई का कुछ सामान खरीदना है।
उधर करण पहले से ही बाजार में एक कोने पर खड़ा उनका इंतज़ार कर रहा था। उसने साधारण कपड़े पहन रखे थे ताकि किसी का ध्यान उसकी तरफ न जाए।
बाजार में बहुत भीड़ थी। सब्ज़ी वालों की आवाज़, लोगों की धक्का-मुक्की और गाड़ियों का शोर — हर तरफ हलचल ही हलचल थी।
आरती आगे-आगे चल रही थी और पायल उसके पीछे।
करण थोड़ी दूरी बनाकर उनके साथ-साथ चल रहा था।
अचानक भीड़ में अफरा-तफरी मच गई।
पीछे से किसी ने ज़ोर से धक्का दिया।
इस धक्के से आरती का संतुलन बिगड़ गया।
वह लड़खड़ाकर आगे की ओर गिरने ही वाली थी।
तभी करण ने तुरंत आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया, ताकि वह ज़मीन पर न गिर जाए।
पायल पास ही खड़ी थी, वह नहीं गिरी थी।
गलतफहमी बस इतनी थी कि भीड़ में सबको साफ दिखाई नहीं दिया।
वो बस एक पल का सहारा था।
लेकिन उसी पल दूर खड़ी निधि की नज़र उन पर पड़ गई।
निधि ने बिना कुछ सोचे तुरंत अपने मोबाइल से उनकी फोटो खींच ली।
तस्वीर में ऐसा लग रहा था जैसे करण और आरती हाथ पकड़कर साथ चल रहे हों।
निधि के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
उसे जैसे कोई बड़ी बात हाथ लग गई हो।
शाम होते-होते वही तस्वीर व्हाट्सऐप ग्रुप में पहुँच गई।
फिर एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे फोन में घूमती चली गई।
रात तक पूरा मोहल्ला उसी फोटो की चर्चा कर रहा था।
किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की —
सबने अपनी-अपनी कहानी बना ली।
तूफ़ान...
रात होते-होते घर का माहौल अचानक बदल गया।
जहाँ थोड़ी देर पहले सब सामान्य था, वहीं अब गुस्सा, शक और चिल्लाहट से पूरा घर गूंज रहा था।
शकुंतला देवी का चेहरा गुस्से से लाल था।
वो जोर से बोलीं —
“हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी! लोगों के सामने सिर उठाकर चलना मुश्किल कर दिया।”
समीर भी खुद को संभाल नहीं पा रहा था।
उसकी आवाज़ में गुस्सा भी था और दर्द भी —
“आरती, मैंने तुम पर भरोसा किया था। तुमने ऐसा क्यों किया?”
आरती की आँखों में आँसू भर आए।
वो बार-बार समझाने की कोशिश कर रही थी —
“आप लोग जैसा सोच रहे हैं वैसा कुछ भी नहीं है। पहले मेरी बात तो सुन लीजिए…”
लेकिन उस समय कोई सुनने को तैयार नहीं था।
तभी बाहर से शोर सुनाई दिया।
मोहल्ले का कोई आदमी चिल्लाया —
“चलो! डॉक्टर के घर चलते हैं, वहीं सच्चाई पता चल जाएगी!”
कुछ ही मिनटों में पूरा मोहल्ला करण के घर के बाहर जमा हो गया।
हर तरफ फुसफुसाहट, गुस्सा और आरोप थे।
करण का दरवाज़ा अंदर से बंद था।
भीड़ में से किसी ने जोर से कहा —
“दरवाज़ा खोलो!”
अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
गुस्से में एक आदमी चिल्लाया —
“तोड़ दो दरवाज़ा!”
दो-तीन लोगों ने मिलकर जोर लगाया।
दरवाज़ा टूटकर खुल गया और लोग अंदर घुस गए।
करण घबरा गया।
वो डरते हुए बोला —
“आप लोग ऐसे क्यों कर रहे हैं? पहले मेरी बात तो सुनिए!”
लेकिन भीड़ का गुस्सा अब काबू में नहीं था।
कुछ लोगों ने उसका कॉलर पकड़ लिया।
धक्का-मुक्की शुरू हो गई।
घर का सारा सामान इधर-उधर बिखर गया।
करण खुद को बचाने की कोशिश करता रहा,
पर किसी को उसकी सफाई सुनने की फुर्सत नहीं थी।
वहीं बाहर खड़ी आरती बार-बार चिल्ला रही थी —
“रुक जाइए! आप लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं!”
सच्चाई...
आरती ने दोनों हाथ जोड़कर ज़ोर से कहा—
“रुक जाइए! आप लोग बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। करण मेरा नहीं… पायल का होने वाला पति है!”
भीड़ जैसे पत्थर की तरह जम गई।
जो लोग अभी तक चिल्ला रहे थे, वे अचानक चुप हो गए।
पायल की आँखों से आँसू बह रहे थे।
वह काँपते कदमों से आगे आई और सबके सामने खड़ी हो गई।
“हाँ… करण मेरा बॉयफ्रेंड है,” उसने भर्राई आवाज़ में कहा।
“भाभी ने कुछ गलत नहीं किया। वो सिर्फ हमारी मदद कर रही थीं। अगर भाभी साथ न देतीं तो हम कभी अपनी बात घर वालों तक नहीं पहुँचा पाते।”
पूरा मोहल्ला सन्न रह गया।
लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
समीर ने धीरे से आरती की तरफ देखा।
उसकी आँखों में गुस्से की जगह अब पछतावा था।
वह आरती के पास आया और धीमे स्वर में बोला—
“मुझे तुम पर भरोसा करना चाहिए था। बिना सच्चाई जाने मैंने तुम पर शक किया… मुझे माफ कर दो।”
शकुंतला देवी भी आगे बढ़ीं।
उनकी आवाज़ अब पहले जैसी कठोर नहीं थी।
“बहू… हमसे गलती हो गई। हमने लोगों की बातों में आकर तुम्हें गलत समझ लिया। हमें माफ कर दो।”
आरती की आँखें भी नम हो गईं।
उसने सिर्फ इतना कहा—
“गलती सबसे होती है, माजी… लेकिन भरोसा टूटे, तो दिल बहुत दुखता है।”
नया फैसला...
कुछ दिन बाद घर में एक बड़ी बैठक रखी गई।
बैठक वाले कमरे में सभी लोग चुपचाप बैठे थे।
पहले जैसा गुस्सा और शोर नहीं था, बल्कि माहौल शांत था।
समीर ने सबसे पहले बात शुरू की,
“आज हम बिना गुस्से और बिना आरोप लगाए सिर्फ सच्चाई और बच्चों की खुशी के बारे में बात करेंगे।”
शकुंतला देवी ने गहरी सांस ली।
उन्होंने पायल और करण की तरफ देखा।
दोनों सिर झुकाए बैठे थे।
कुछ पल की खामोशी के बाद शकुंतला देवी बोलीं,
“हमसे गलती हुई। हमने बिना पूरी बात जाने फैसला कर लिया। अगर बच्चों की खुशी इसी में है, तो हमें मंज़ूर है।”
उनकी बात सुनते ही पायल की आँखों से आँसू बहने लगे।
करण ने हाथ जोड़कर कहा,
“माँ जी, मैं वादा करता हूँ, आपकी बेटी को हमेशा खुश रखूँगा।”
आरती के चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान थी।
समीर ने भी आगे बढ़कर करण के कंधे पर हाथ रखा।
कुछ ही दिनों में पूरे मोहल्ले को शादी का न्योता दिया गया।
इस बार वही लोग, जो पहले ताने मारते थे, अब मिठाइयाँ बाँट रहे थे।
बारात वाले दिन घर रोशनी से जगमगा रहा था।
ढोल की आवाज़ गूँज रही थी।
शकुंतला देवी खुद दरवाज़े पर खड़ी होकर बारात का स्वागत कर रही थीं।
मोहल्ले की औरतें, जो पहले फुसफुसाकर बातें करती थीं, आज खुलकर नाच रही थीं।
कोई कह रहा था,
“देखो, कितना अच्छा लड़का है।”
तो कोई बोला,
“सच में, बच्चों की खुशी में ही हमारी खुशी है।”
उस दिन सिर्फ एक शादी नहीं हुई थी,
बल्कि पुराने विचारों की दीवार भी टूट गई थी।
सीख:
उस दिन पूरे मोहल्ले को एक बड़ी सीख मिली —
गलतफ़हमी इंसान को अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ा कर देती है।
यह सबसे खतरनाक दुश्मन होती है, क्योंकि यह सच को देखे बिना फैसला करवा देती है।
और यह भी समझ आया कि —
भरोसा किसी भी रिश्ते की सबसे मज़बूत नींव होता है।
जहाँ भरोसा होता है, वहाँ रिश्ते टूटते नहीं, और जहाँ भरोसा नहीं होता, वहाँ अपना भी पराया लगने लगता है।
उस दिन के बाद आरती को कोई “लव मैरिज वाली बहू” कहकर नहीं बुलाता था।
अब वह पूरे मोहल्ले में एक समझदार, सुलझी हुई और परिवार को जोड़कर रखने वाली बहू के नाम से पहचानी जाने लगी।
उसने सिर्फ अपना नहीं, बल्कि सोच का भी सम्मान जीत लिया था।

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