सीमाएँ जो रिश्ते बचा लें
सुबह का समय था।
रसोई में बर्तनों की आवाज़ तेज़-तेज़ गूंज रही थी।
“मैं कोई मशीन नहीं हूँ… ऑफिस भी संभालूं और पूरा घर भी!”
नेहा गुस्से में आटा गूंथते हुए बड़बड़ा रही थी।
उसकी शादी को डेढ़ साल हो चुके थे। शादी से पहले ही उसने साफ कह दिया था कि वह नौकरी छोड़ेगी नहीं। उसके पति रोहन और ससुराल वालों ने भी हामी भर दी थी।
शादी के कुछ ही महीनों बाद नेहा को अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई। सब खुश थे।
लेकिन सास सुशीला जी ने उसी दिन एक बात साफ कह दी थी—
“बहू, नौकरी करना अच्छी बात है। मुझे कोई आपत्ति नहीं। पर मैं अब पहले जैसा सारा घर नहीं संभाल पाऊंगी। मैंने अपनी जिंदगी में बहुत काम कर लिया है। अब जितना होगा, उतना करूंगी… पर पूरी जिम्मेदारी मत देना।”
उस वक्त नेहा को लगा था कि ये कैसी सास है!
मां होती तो सब खुद संभाल लेती।
आख़िरकार सबने मिलकर एक रास्ता निकाल लिया। घर के रोज़मर्रा के कामों के लिए एक कामवाली रख ली गई और खाना बनाने के लिए अलग से कुक आने लगी। अब सुबह-शाम का खाना समय पर बन जाता था और घर की सफ़ाई भी नियमित होने लगी। धीरे-धीरे सबकी दिनचर्या संतुलित हो गई और घर का माहौल फिर से सामान्य लगने लगा।
लेकिन असली समस्या तब शुरू होती थी…
जब कामवाली छुट्टी ले लेती।
उस दिन जब ऑफिस से थकी-हारी नेहा घर लौटती, तो रसोई में जाकर रोटियां बनाना उसे सचमुच पहाड़ जैसा काम लगता। दिनभर की भागदौड़ के बाद उसके हाथ-पैर जवाब दे देते थे, लेकिन चूल्हा उसका इंतज़ार करता रहता था।
उसे सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती, जब वह ड्रॉइंग रूम में अपनी सास को आराम से बैठे देखती। कभी वे टीवी देख रही होतीं, कभी अख़बार पढ़तीं या पड़ोसन से बात कर रही होतीं।
हाँ, इतना ज़रूर था कि सुशीला जी सुबह कभी सब्ज़ी काट देतीं, तो कभी दाल चढ़ा देतीं। लेकिन जैसे ही नेहा ऑफिस से लौटकर रसोई में प्रवेश करती, वे अंदर झाँकती भी नहीं थीं।
नेहा के मन में बार-बार यही ख्याल उठता—
“ये जानबूझकर ऐसा करती हैं… ताकि सारा काम आखिर में मुझे ही करना पड़े।”
उसका मन खीझ और चिड़चिड़ाहट से भर जाता।
रात को वह अपनी माँ को फोन लगाती और दिनभर की सारी भड़ास निकाल देती। शिकायतें करते-करते उसका मन थोड़ा हल्का हो जाता, लेकिन भीतर की उलझन जस की तस बनी रहती।
उधर मायके में…
कुछ महीनों बाद नेहा के छोटे भाई की शादी तय हो गई।
सगाई का दिन था। घर में रौनक थी, मेहमानों की आवाजाही लगी हुई थी। मिठाइयों की खुशबू और हंसी की गूंज पूरे आँगन में फैल रही थी।
उसी दौरान नेहा की मां, कमला जी, बड़े गर्व से सबके सामने बोलीं—
“देखिए, मेरी बहू नौकरी करेगी तो भी मुझे जरा भी दिक्कत नहीं है। जब अभी तक मैंने अपना घर संभाला है तो आगे भी संभाल लूंगी। आखिर जब एक मां अपने बच्चों को अपने हाथों से खाना खिला सकती है, तो बहू को क्यों नहीं?”
उनकी बात सुनकर वहां बैठे रिश्तेदार प्रभावित हो गए। किसी ने कहा, “आजकल ऐसी सोच कहां मिलती है!” तो किसी ने उनकी तारीफ में सिर हिलाया।
नेहा भी गर्व से मुस्कुराते हुए बोली—
“देखा मम्मी! आप सच में बहुत अच्छी सास बनेंगी… मेरी सास जैसी नहीं।”
कुछ ही दिनों में शादी हो गई। नई बहू घर में आई। घर में फिर से खुशियों की हलचल शुरू हो गई।
शादी के बाद जब भाभी ने अपनी नौकरी ज्वाइन की, तब भी कमला जी का उत्साह कम नहीं हुआ। वे रोज़ सुबह जल्दी उठ जातीं। पहले सबके लिए नाश्ता बनातीं, फिर बहू का टिफिन बड़े प्यार से तैयार करतीं। शाम को उसके लौटने से पहले चाय तैयार रहती और रात का खाना भी समय पर सजा हुआ।
बहू भी शुरू-शुरू में बड़े प्यार से “मम्मी जी… मम्मी जी…” कहती रहती। कभी अपनी पसंद बताती, कभी ऑफिस की बातें साझा करती। घर का माहौल स्नेह और अपनापन से भरा हुआ था।
सबको लगता था — इससे बेहतर शुरुआत क्या हो सकती है।
धीरे-धीरे…
आदतें बदलने लगीं।
अब भाभी ऑफिस से लौटते ही सीधे अपने कमरे में चली जातीं।
कपड़े बदलतीं, मोबाइल उठातीं और आराम से लेट जातीं।
रसोई की तरफ झांकने की भी ज़रूरत नहीं समझतीं।
एक गिलास पानी तक खुद उठाकर नहीं पीतीं — “मम्मी जी, पानी दे दीजिए…” की आवाज़ लगा देतीं।
अगर कभी चाय बनने में थोड़ी देर हो जाती, तो उनके चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखाई देने लगती।
कभी-कभी तो बिना कुछ खाए ही चुपचाप कमरे में चली जातीं।
कमला जी सब देखतीं… सब समझतीं…
लेकिन कुछ कह नहीं पातीं।
बस चुपचाप अपने काम में लगी रहतीं।
एक दिन जब नेहा का फोन आया, तो बात करते-करते कमला जी की आवाज़ भर्रा गई।
“बेटा… शायद मुझसे ही गलती हो गई। शुरू में मैंने ही कह दिया था कि बहू को कुछ करने की ज़रूरत नहीं। अब अगर मैं कुछ कहूं तो उसे बुरा लगेगा। समझ नहीं आता… मैं मां हूँ या घर की कामवाली।”
उनकी आवाज़ में दर्द साफ झलक रहा था।
नेहा घबरा गई—
“मां! ये आप क्या कह रही हैं? आप भाई से साफ-साफ क्यों नहीं कह देतीं? ये ठीक नहीं है।”
कमला जी ने लंबी सांस ली और धीमे स्वर में बोलीं—
“किस मुंह से कहूं, बेटा? जब शुरुआत मैंने ही ऐसी की… मैंने ही उसे हर जिम्मेदारी से दूर रखा… अब अचानक कैसे कह दूं कि घर उसका भी है?
गलती मेरी ही है… मैंने सोच लिया था कि प्यार से सब संभाल लूंगी… लेकिन शायद प्यार में संतुलन भी ज़रूरी होता है।”
इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया।
नेहा देर तक मोबाइल हाथ में लिए बैठी रह गई…
उसे पहली बार अपनी मां की थकान महसूस हुई।
उस रात…
नेहा चुपचाप सोफे के कोने पर बैठी थी। उसके मन में अजीब सी हलचल चल रही थी।
ड्रॉइंग रूम में सुशीला जी आराम से बैठी थीं। उनके हाथों में ताज़ी मेंहदी लगी थी। वे बड़े ध्यान से अपने नाखूनों को देख रही थीं, जैसे कोई छोटी सी लड़की नया रंग देखकर खुश हो रही हो।
तभी ससुर जी हँसते हुए बोले —
“अरे भई, अब इस उम्र में ये सब सजना-संवरना? किसे दिखाना है?”
सुशीला जी मुस्कुराईं। उनकी मुस्कान में संतोष था, कोई झिझक नहीं।
“किसी को नहीं दिखाना,” उन्होंने धीरे से कहा,
“सारी उम्र घर-गृहस्थी में बीता दी। बच्चों को बड़ा किया, जिम्मेदारियाँ निभाईं… अब थोड़ा वक्त अपने लिए भी जी लूं तो क्या बुरा है?”
नेहा उन्हें देखती रह गई।
आज पहली बार उसे उनकी बातें चुभ नहीं रही थीं… बल्कि समझ आ रही थीं।
उसे अपनी मां याद आ गई —
थका हुआ चेहरा…
कमर पर बंधा आंचल…
आँखों में छुपे आँसू…
मां ने भी तो पूरी जिंदगी घर के लिए ही खपा दी थी।
लेकिन उन्होंने कभी अपने लिए रुककर सोचा ही नहीं।
नेहा के मन में जैसे कोई परदा हट गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ —
उसकी सास ने समय रहते अपने लिए एक सीमा तय कर ली थी।
उन्होंने साफ कह दिया था कि वे सब कुछ नहीं संभालेंगी।
और शायद इसी वजह से आज वे मुस्कुरा पा रही थीं।
मां ने ऐसा नहीं किया।
उन्होंने सब कुछ अपने सिर ले लिया… और आज वही बोझ उन्हें अंदर ही अंदर तोड़ रहा था।
नेहा की आँखें नम हो गईं।
आज उसे शिकायत नहीं… समझ मिली थी।
अगले दिन…
रसोई में उस दिन नेहा बिना किसी खीझ के गई।
उसके कदम आज हल्के थे, जैसे मन का बोझ कहीं पीछे छूट गया हो।
पीछे-पीछे सुशीला जी भी धीरे से रसोई तक आ गईं। वे दरवाज़े पर खड़ी होकर नेहा को देखने लगीं। शायद उन्हें लगा आज फिर बहू के चेहरे पर नाराज़गी दिखेगी… लेकिन ऐसा कुछ नहीं था।
नेहा ने गैस जलाते हुए मुड़कर देखा और हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“मम्मी जी… आज हम दोनों मिलकर खाना बनाते हैं?”
सुशीला जी थोड़ी चौंक गईं।
“क्यों बेटा? आज कामवाली नहीं आई क्या?”
नेहा ने आटा निकालते हुए शांत स्वर में कहा—
“नहीं, कामवाली तो आई है। बस… आज मुझे लगा कि घर सिर्फ काम से नहीं, साथ से चलता है। अगर हम मिलकर काम करेंगे तो बोझ भी नहीं लगेगा और समय भी अच्छा बीतेगा।”
कुछ पल के लिए रसोई में सन्नाटा छा गया।
सुशीला जी ने धीरे से सब्ज़ी उठाई और काटने लगीं। उनकी आंखों में नमी थी, पर चेहरे पर संतोष की मुस्कान।
“बहू… ये बात समझने में लोगों को सालों लग जाते हैं,” उन्होंने धीमे से कहा।
नेहा ने भी मुस्कुराकर जवाब दिया—
“सीखने में देर हो जाए तो भी ठीक है मम्मी जी… बस समझ आ जानी चाहिए।”
उस दिन रसोई में सिर्फ खाना नहीं बन रहा था…
दो दिलों के बीच की दूरी भी पिघल रही थी।
कुछ दिनों बाद…
नेहा कुछ दिनों के लिए मायके आई हुई थी। घर का माहौल पहले जैसा ही था, लेकिन अब उसकी नज़रें बदल चुकी थीं।
शाम को भाभी ऑफिस से लौटीं। थकी हुई थीं। बैग सोफ़े पर रखा और सीधे कमरे की ओर बढ़ने लगीं। तभी नेहा ने मुस्कुराते हुए आवाज़ दी—
“भाभी, आइए… आज चाय हम दोनों मिलकर बनाते हैं।”
भाभी ने हल्की सी हैरानी से उसकी ओर देखा और बोलीं—
“अरे रहने दो ना, मम्मी बना देंगी। वो तो बना ही देती हैं रोज़।”
नेहा उनके पास आई। उसके स्वर में अपनापन था, शिकायत नहीं।
“नहीं भाभी… मम्मी ने बहुत सालों तक हम सबके लिए किया है। अब थोड़ा हम भी सीखें, थोड़ा हम भी उनका हाथ बँटाएँ। आखिर घर हम सबका है।”
भाभी कुछ पल चुप रहीं। शायद उन्होंने पहली बार इस बात को उस नज़र से सोचा।
दरवाज़े के पास खड़ी कमला जी ये सब सुन रही थीं।
आज उनके चेहरे पर थकान नहीं, संतोष था।
आँखों में हल्की नमी थी… लेकिन दिल में सुकून।
उन्हें लगा —
शायद देर से ही सही, पर उनकी बेटी ने समझ लिया है कि रिश्ते निभाने के लिए सिर्फ त्याग नहीं, संतुलन भी ज़रूरी होता है।
सीख क्या थी?
रिश्ते प्यार से चलते हैं…
लेकिन प्यार का मतलब अपनी सीमा खो देना नहीं होता।
जो शुरुआत में साफ नियम बना लेता है,
वह आगे चलकर सम्मान भी बचा लेता है।
और जो हर जिम्मेदारी अपने सिर ले लेता है,
उसे कभी-कभी अपना ही अस्तित्व खोना पड़ता है।
अंत में…
नेहा अब समझ चुकी थी —
अच्छी सास वह नहीं होती जो सारी जिम्मेदारियाँ अपने कंधों पर उठाकर खुद को भूल जाए,
बल्कि वह होती है जो रिश्तों में संतुलन बनाए रखे और अपना आत्मसम्मान भी संभाले।
और अच्छी बहू वह नहीं होती जो हर बात पर शिकायत करे,
बल्कि वह होती है जो परिस्थितियों को समझे, सहयोग करना सीखे और रिश्तों को निभाने की कोशिश करे।

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