आधी रात की दस्तक

 

Rainy midnight village scene where a man carries his pregnant wife through heavy storm as another man opens his car door to help, symbolizing humanity and forgiveness.


रात के ठीक बारह बजे थे।

आसमान में काले बादल गरज रहे थे। तेज़ हवा खिड़कियों को हिला रही थी और मूसलाधार बारिश लगातार बरस रही थी।


गाँव के किनारे बने छोटे से पक्के मकान में रामू अपने परिवार के साथ सो रहा था। तभी—


ठक… ठक… ठक…


दरवाज़े पर कोई ज़ोर-ज़ोर से दस्तक दे रहा था।


रामू झुंझलाते हुए उठा।

“इस समय कौन आ गया?” उसने बड़बड़ाते हुए दरवाज़ा खोला।


दरवाज़े पर श्याम खड़ा था — सिर से पाँव तक भीगा हुआ। कपड़े शरीर से चिपके हुए। आँखों में घबराहट।


“रामू… बचा ले भाई…” श्याम हाँफते हुए बोला, “सीता को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई है। हालत ठीक नहीं है। अपनी गाड़ी से शहर के अस्पताल तक छोड़ दे। इतनी रात में और कोई साधन नहीं मिलेगा…”


रामू कुछ पल चुप रहा। दोनों के बीच पिछले कई महीनों से बोलचाल बंद थी। खेत की मेड़ को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया था। तब से एक-दूसरे को देखते भी नहीं थे।


रामू का मन सख्त हो गया।


“मेरी गाड़ी में पेट्रोल नहीं है,” उसने रूखे स्वर में कहा और दरवाज़ा बंद कर लिया।


श्याम कुछ देर वहीं खड़ा रहा। फिर भारी कदमों से वापस लौट गया।



घर पहुँचते ही उसने देखा — सीता दर्द से कराह रही थी।


“अब क्या करेंगे?” बूढ़ी माँ ने घबराकर पूछा।


श्याम ने बिना कुछ कहे पत्नी को सावधानी से कंधे पर उठाया और बारिश में निकल पड़ा।


हवा इतनी तेज़ थी कि कदम आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था। कीचड़ भरे रास्ते, अंधेरा, ऊपर से बिजली की चमक। सीता की चीखें उसका दिल चीर रही थीं।


चलते-चलते वह खुद को कोसने लगा —

“मैंने ही तो रामू को सबके सामने नीचा दिखाया था… हर वक्त उसकी बुराई की… अब वह क्यों मदद करेगा?”


फिर अगले ही पल गुस्सा भी आया—

“लेकिन इंसानियत भी कोई चीज़ होती है… उसे मदद करनी चाहिए थी…”


बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। श्याम की ताकत जवाब देने लगी। वह एक पेड़ के नीचे रुक गया। सीता लगभग बेहोश हो चुकी थी।


“हे भगवान… मेरी गलती की सज़ा इसे मत देना…” उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


उसी समय दूर से हेडलाइट की रोशनी दिखाई दी।


श्याम ने उम्मीद से हाथ हिलाया।


गाड़ी पास आकर रुकी।


वह रामू ही था।


“जल्दी बैठो!” रामू ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा।


श्याम हैरान था —

“पर… तुमने तो कहा था गाड़ी में पेट्रोल नहीं है…”


रामू ने नज़रें झुका लीं —

“गुस्से में झूठ बोल दिया था। जब तुम लौटे, तो दिल नहीं माना। सोचा — अगर आज कुछ हो गया तो ज़िंदगी भर पछताऊँगा। चलो, पहले अस्पताल चलते हैं।”


श्याम की आँखें भर आईं। दोनों ने मिलकर सीता को गाड़ी में बैठाया और तेज़ी से शहर की ओर निकल पड़े।



अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टरों ने तुरंत सीता को अंदर ले लिया।


आधा घंटा जैसे आधी ज़िंदगी के बराबर लग रहा था।


आख़िरकार नर्स बाहर आई।


“बधाई हो… स्वस्थ बच्चा हुआ है। माँ और बच्चा दोनों ठीक हैं।”


श्याम ने राहत की साँस ली।

रामू ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


कुछ देर बाद उन्हें नवजात बच्ची को दिखाया गया। नन्हीं सी गुड़िया हल्की सी आवाज़ में रो रही थी।


उसके रोने की आवाज़ में जैसे दोनों दोस्तों की सारी कड़वाहट धुल गई।


श्याम ने रामू की ओर देखा—

“भाई… माफ़ कर दे। मैंने बहुत गलत किया।”


रामू मुस्कुराया—

“मैं भी तो कम नहीं था। चलो, अब सब भूल जाते हैं।”


दोनों ने वहीं अस्पताल के बरामदे में एक-दूसरे को गले लगा लिया।



कुछ महीने बाद


गाँव में अब सब कुछ बदल चुका था।


दोनों परिवार फिर से साथ बैठने लगे। खेत की मेड़ का झगड़ा भी हँसी में खत्म हो गया। बच्ची का नाम रखा गया — “आशा”।


क्योंकि उसी रात उसने दो टूटे हुए दिलों में नई उम्मीद जगा दी थी।



सीख:


ईर्ष्या और अहंकार इंसान को अंदर से छोटा बना देते हैं।

लेकिन एक सही समय पर किया गया छोटा सा अच्छा काम रिश्तों को फिर से जोड़ सकता है।


कभी-कभी आधी रात की एक दस्तक ज़िंदगी भर की दूरी मिटा देती है।




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