पेंशन की पोटली

 

Elderly Indian mother giving savings to her son in a warm family home, emotional moment with daughter-in-law watching quietly.


सुबह की हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। तुलसी के पास दिया अभी भी टिमटिमा रहा था। घर में चाय की खुशबू फैली हुई थी।


सावित्री देवी अपनी पुरानी सी संदूकची खोलकर कुछ कागज़ और एक छोटी सी थैली देख रही थीं। तभी उनकी बहू राधा कमरे में आई।


“मां जी, नाश्ता तैयार है,” राधा ने कहा।


सावित्री देवी ने जल्दी से थैली बंद कर दी और मुस्कुरा दीं, “आ रही हूं बहू।”


राधा की नजर उस थैली पर पड़ चुकी थी। उसे लगा, जरूर इसमें पैसे होंगे। पिछले कुछ महीनों से यही बात उसके मन में चुभ रही थी।



घर की स्थिति...


सावित्री देवी अपने बेटे दीपक, बहू राधा और पोती खुशी के साथ रहती थीं। दीपक एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। कमाई ठीक-ठाक थी। घर का खर्च आराम से चल जाता था। थोड़ी-बहुत बचत भी हो जाती थी।


सावित्री देवी को उनके स्वर्गीय पति की सरकारी नौकरी की पेंशन मिलती थी। हर महीने करीब आठ हजार रुपए आते थे। वह पैसे अपने पास ही रखती थीं। कभी-कभी अपनी दवाइयां, मंदिर का चढ़ावा या किसी रिश्तेदार की मदद में खर्च कर देती थीं।


राधा को यही बात खटकती थी।


उसे लगता था — जब घर का सारा खर्च दीपक उठा ही रहा है, तो मां जी की पेंशन भी घर में ही लगनी चाहिए।



एक दिन की बात...


उस दिन दोपहर का समय था। धूप आँगन में हल्की-हल्की फैल रही थी। सावित्री देवी की पुरानी सहेली शांता मिलने आई थीं। दोनों बरामदे में चारपाई पर बैठकर बीते दिनों की बातें कर रही थीं—बचपन की शरारतें, पुरानी यादें, और जीवन के उतार-चढ़ाव।


लेकिन बातों के बीच सावित्री देवी ने महसूस किया कि शांता के चेहरे की मुस्कान अधूरी है। उसकी आँखों में एक छिपी हुई चिंता साफ झलक रही थी।


कुछ देर चुप रहने के बाद शांता ने धीमी आवाज़ में कहा,

“बहन… लड़के की स्कूल की फीस भरनी है। इस महीने हाथ थोड़ा तंग हो गया है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं।”


सावित्री देवी ने बिना एक पल गंवाए उसका हाथ थाम लिया।

“अरे, बस इतनी सी बात? तूने पहले क्यों नहीं बताया?”


वह तुरंत अपने कमरे में गईं। अलमारी से अपनी छोटी सी थैली निकाली और उसमें से पाँच हजार रुपए निकालकर शांता के हाथ में रख दिए।


“ये रख ले। आराम से लौटा देना जब हो सके। बच्चों की पढ़ाई कभी नहीं रुकनी चाहिए। बाकी खर्च तो किसी तरह टल जाता है, पर पढ़ाई का समय वापस नहीं आता।”


शांता की आँखें भर आईं। वह बार-बार धन्यवाद कहती रही।


रसोई में खड़ी राधा यह सब देख रही थी। उसके हाथ तो काम कर रहे थे, लेकिन मन में हलचल मच गई थी। उसे लगा—घर में कितने खर्चे हैं, और मां जी बिना पूछे इतने पैसे दे रही हैं।


उसके मन में हल्की सी खिन्नता और असहमति घर कर गई।



शाम का तूफान...


रात को दीपक कमरे में आया तो देखा राधा बिस्तर पर बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी। चेहरे पर हल्की नाराज़गी साफ झलक रही थी।


“सुनो, आज तुम्हारी मां ने अपनी सहेली को पाँच हज़ार रुपये दे दिए,” राधा ने बात शुरू की।


दीपक ने शर्ट के बटन खोलते हुए शांत स्वर में पूछा, “अच्छा… तो?”


“तो क्या मतलब? घर में भी तो खर्चे हैं। खुशी की कोचिंग शुरू करनी है। महीने का बजट पहले ही तंग रहता है। और मां जी ऐसे पैसे बाँटती रहेंगी तो कैसे चलेगा?”


दीपक कुछ पल चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “राधा, वो उनकी पेंशन है। उनका अपना पैसा है। उस पर उनका हक है।”


राधा तुरंत बोल पड़ी, “हक? जब वो हमारे साथ रह रही हैं, खाना-पीना सब यहीं से हो रहा है, तो फिर पैसे अलग रखने का क्या मतलब? घर में ही तो लगने चाहिए।”


दीपक ने गहरी साँस ली और उसकी तरफ देखते हुए कहा, “तुम ये चाहती हो कि मां हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए हमसे पूछें? अगर उन्हें किसी को मदद करनी हो, दवा लेनी हो या कहीं कुछ देना हो, तो हर बार हमारे सामने हाथ फैलाएँ?”


राधा कुछ नहीं बोली। उसके पास जवाब तो था, लेकिन शब्द नहीं। वह चुपचाप तकिए की तरफ देखने लगी।


कमरे में कुछ देर सन्नाटा रहा।


राधा बाहर से शांत थी, लेकिन उसके मन की नाराज़गी अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।



सच का खुलासा...


कुछ दिन बाद अचानक घर का माहौल बदल गया।


शाम को खेलते-खेलते खुशी को तेज बुखार चढ़ गया। पहले तो सबने सोचा साधारण सर्दी-जुकाम होगा, लेकिन रात होते-होते उसकी हालत बिगड़ने लगी। उसका शरीर तप रहा था और वह बार-बार कराह रही थी।


घबराकर दीपक उसे तुरंत अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने जांचें लिख दीं। खून की जांच, एक्स-रे, दवाइयाँ — देखते ही देखते बिल बढ़ता चला गया।


राधा की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


“कुछ नहीं होगा हमारी बेटी को…” दीपक ने उसे दिलासा दिया, लेकिन उसके अपने चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी थीं।


रात देर से वे घर लौटे। खुशी को दवाइयाँ देकर सुला दिया गया।


दीपक चुपचाप सोफे पर बैठ गया। हाथ में अस्पताल की पर्चियां थीं और दिमाग में हिसाब-किताब चल रहा था।


सैलरी आने में अभी दस दिन बाकी थे। बैंक बैलेंस भी लगभग खाली था। ऊपर से आने वाले दिनों में और दवाइयों का खर्च।


वह पहली बार खुद को असहाय महसूस कर रहा था।


तभी धीरे-धीरे कदमों की आहट हुई।


सावित्री देवी अपने कमरे से बाहर आईं। उनके हाथ में वही पुरानी सी थैली थी, जिसे वे हमेशा संदूकची में संभालकर रखती थीं।


वे बिना कुछ कहे दीपक के पास आकर खड़ी हो गईं।


“बेटा…” उन्होंने कोमल स्वर में पुकारा।


दीपक ने सिर उठाया। “जी मां?”


सावित्री देवी ने थैली से दस हजार रुपए निकालकर उसके हाथ पर रख दिए।


“ये रख ले।”


दीपक चौंक गया। “मां, ये सब…?”


सावित्री देवी हल्का सा मुस्कुराईं।


“इसी दिन के लिए तो संभालकर रखती हूं। मां-बाप की कमाई और बचत का असली काम यही होता है — जब बच्चों पर मुश्किल आए, तो ढाल बन जाए। सोचा था, कभी जरूरत पड़े तो काम आएंगे।”


दीपक की आंखें भर आईं। उसने झुककर मां के हाथ पकड़ लिए।


“मां… आपने बताया क्यों नहीं कि आप इतना बचा रही थीं?”


“हर बात बताई नहीं जाती बेटा,” उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “कुछ बातें वक्त आने पर ही समझ आती हैं।”


दरवाजे पर खड़ी राधा सब सुन रही थी।


उसकी नजर उस थैली पर गई, जिसे वह अब तक सिर्फ ‘छुपाए हुए पैसे’ समझती थी।


आज वही पैसे उसके बच्चे के इलाज की उम्मीद बने थे।


उसके मन में जैसे किसी ने आईना रख दिया हो।


उसे एहसास हुआ —

वो थैली लालच की नहीं, सुरक्षा की थी।

वो पैसे मोह के नहीं, मां के भरोसे के थे।



अगली सुबह...


राधा हल्के कदमों से कमरे में आई। हाथ में चाय की ट्रे थी, पर मन में झिझक और पछतावा।


उसने चुपचाप कप मेज़ पर रखा और धीमे स्वर में बोली —

“मां जी…”


सावित्री देवी ने चश्मा उतारकर उसकी ओर देखा, “क्या हुआ बहू? इतनी उदास क्यों लग रही हो?”


राधा की आंखें भर आईं। उसने नजरें झुका लीं।

“मां जी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने बहुत गलत सोचा। आपके पैसों पर सवाल उठाया… जबकि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।”


कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।


सावित्री देवी हल्के से मुस्कुराईं। उन्होंने आगे बढ़कर राधा का हाथ थाम लिया।

“बहू, पैसा इतना बड़ा नहीं होता कि रिश्तों से ऊपर हो जाए। पैसे से ज्यादा जरूरी अपनापन होता है। मैं तुम्हारी दुश्मन नहीं हूं। जो कुछ भी है, आखिर तुम्हारा ही तो है।”


यह सुनते ही राधा खुद को संभाल नहीं पाई। उसकी आंखों से आंसू ढुलक पड़े। वह झुककर सावित्री देवी के कंधे से लग गई।


उस दिन दोनों के बीच की दूरी सचमुच खत्म हो गई।


एक नया समझौता...


उस दिन के बाद घर में एक नया नियम बना।


सावित्री देवी अपनी पेंशन खुद संभालती रहीं। लेकिन हर महीने थोड़ा हिस्सा खुशी के नाम से बचत में डालने लगीं।


राधा ने भी कभी दोबारा पैसों की बात पर सवाल नहीं उठाया।


उसे समझ आ गया था —


बुजुर्गों को सिर्फ सम्मान ही नहीं, आर्थिक आत्मनिर्भरता भी चाहिए।


हर इंसान चाहता है कि उसे छोटी-छोटी जरूरतों के लिए हाथ न फैलाना पड़े।



संदेश:


दोस्तों,


हम अक्सर सोच लेते हैं कि घर के बुजुर्गों को पैसों की क्या जरूरत?


लेकिन क्या हम खुद किसी के सामने हर छोटी जरूरत के लिए हाथ फैलाना चाहेंगे?


अगर उनके पास अपनी कमाई या पेंशन है, तो वह उनकी आत्मसम्मान की पूंजी है।


पैसे से ज्यादा जरूरी है — भरोसा, सम्मान और समझ।


और याद रखिए…


आज जो बुजुर्ग हैं, कल हम भी उसी जगह खड़े होंगे।





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