कुछ मुलाक़ातें मुकम्मल नहीं होतीं
रोहन और साक्षी की पहली मुलाक़ात
मुंबई के एक कॉर्पोरेट ट्रेनिंग सेशन में हुई थी।
दोनों अलग-अलग कंपनियों से आए थे,
नाम की पट्टी छाती पर लगी थी
और चेहरे पर प्रोफेशनल मुस्कान।
लंच ब्रेक में
कॉफी मशीन के पास खड़े-खड़े
बस एक छोटी-सी बात से बातचीत शुरू हुई—
“शुगर कम है न?”
“हाँ… ज़िंदगी में भी वैसे ही रखती हूँ।”
बस…
यहीं से बातों का सिलसिला चल पड़ा।
ट्रेनिंग खत्म होने के बाद
दोनों पास ही के कैफे में बैठ गए।
दो घंटे कैसे निकल गए,
किसी को पता ही नहीं चला।
बचपन की बातें,
करियर के सपने,
पसंदीदा गाने
और वो अधूरी-सी हँसी
जिसमें अजनबियत बिल्कुल नहीं थी।
विदा होते वक्त
दोनों ने हाथ मिलाया,
मुस्कुराए
और बस इतना कहा—
“फिर मिलेंगे…”
लेकिन
फोन नंबर लेना
दोनों ही भूल गए।
अगले दो दिन
रोहन हर ट्रेनिंग बैच में
साक्षी को ढूंढता रहा।
और साक्षी
हर चेहरे में
रोहन को।
लेकिन
शहर बड़ा था
और किस्मत छोटी।
दोनों ने
थककर मान लिया
कि शायद ये मुलाक़ात
बस यहीं तक थी।
वक़्त बीतता गया।
रोहन अपने काम में डूब गया,
घर वालों ने शादी की बात छेड़ दी।
“अब उम्र हो रही है,”
“अच्छी लड़की मिली है,”
“सोच क्या रहा है?”
रोहन ने हाँ कर दी।
वो क्या कहता?
कि मैं किसी से प्यार करता हूँ
जिसका पता, नाम, नंबर—
कुछ भी नहीं?
शादी हो गई
नेहा से।
नेहा अच्छी थी—
समझदार, सुलझी हुई
और रिश्तों की क़द्र करने वाली।
धीरे-धीरे
ज़िंदगी पटरी पर आ गई।
दो बच्चे हुए—
आरव और नील।
सब ठीक था…
या यूँ कहें
ठीक दिखता था।
साक्षी ने शादी नहीं की थी।
घर में बार-बार दबाव बनाया जाता,
रिश्तों की बातें होतीं,
तस्वीरें दिखाई जातीं…
लेकिन हर बार
वो हल्की-सी मुस्कान के साथ
बस इतना कह देती—
“अभी थोड़ा और सेटल हो जाऊँ।”
असल सच ये था कि
ज़िंदगी में सब कुछ अपनी जगह था—
काम, पहचान, आत्मनिर्भरता…
बस दिल ही था
जो कभी सेटल हो ही नहीं पाया।
शादी के पूरे सात साल बाद
रोहन, पत्नी और बच्चों के साथ
शिमला घूमने आया था।
मॉल रोड पर
शाम की हल्की ठंड,
लोगों की चहल-पहल
और दुकानों की रौशनी के बीच—
अचानक
भीड़ के उस पार
उनकी नज़रें टकरा गईं।
एक पल के लिए
दोनों रुक गए।
यकीन करना मुश्किल था
कि सामने खड़ा चेहरा
सच में वही है।
वक़्त जैसे
उसी जगह
थम गया।
“तुम…?”
रोहन के होंठों से
बस इतना ही निकल पाया।
“रोहन…?”
साक्षी की आवाज़
हल्की-सी काँप गई।
इतने बरसों बाद भी
नाम
आज भी
उतनी ही आसानी से
होंठों तक आ गया।
रोहन के पास खड़ी नेहा ने
हैरानी से पूछा—
“आप इन्हें जानती हैं?”
रोहन ने
एक गहरी साँस लेकर कहा—
“हाँ…
ये मेरी दोस्त हैं।”
साक्षी ने
कुछ नहीं कहा।
बस
एक हल्की-सी मुस्कान के साथ
नज़रें झुका लीं।
अगले दिन
रोहन ने एक छोटे-से बहाने से
साक्षी का फोन नंबर ले लिया।
शाम ढलते ही
दोनों एक शांत-से कैफे में मिले।
वहाँ शब्द कम थे,
खामोशी ज़्यादा।
कॉफी ठंडी हो रही थी,
लेकिन दिलों में उथल-पुथल थी।
कुछ पल चुप रहने के बाद
रोहन ने हिम्मत जुटाकर पूछा—
“तुमने शादी क्यों नहीं की?”
साक्षी ने एक पल भी नहीं सोचा।
धीरे-से बोली—
“तुम्हारे बाद
कोई सही लगा ही नहीं।”
रोहन की आँखें भर आईं।
आवाज़ लड़खड़ा गई—
“काश…
उस दिन
हम दोनों ने
नंबर ले लिए होते।”
साक्षी हल्की-सी मुस्कुराई।
उस मुस्कान में दर्द भी था,
समझ भी।
“कुछ चीज़ें
अगर वक़्त पर न हों,
तो बाद में
गुनाह बन जाती हैं।”
फिर उसने गंभीर होकर कहा—
“रोहन,
अब तुम्हारी ज़िंदगी में
तुम्हारी पत्नी है,
तुम्हारे बच्चे हैं।
अब तुम्हारा प्यार
सिर्फ़ उनका हक़ है।”
रोहन ने काँपती हुई आवाज़ में पूछा—
“और मेरा…?”
साक्षी ने नज़रों में नज़र डालकर कहा—
“तुम्हारी याद
मेरे साथ रहेगी…
लेकिन तुम्हें
मैं नहीं रोकूँगी।”
विदा होते वक्त
साक्षी कुछ पल रुकी।
फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली—
“मैं भी अब शादी कर लूँगी…
और जब दुल्हन बनूँगी,
तुम्हें तस्वीर भेज दूँगी।”
रोहन की आँखें भर आईं।
वो कुछ कहना चाहता था,
लेकिन शब्द साथ नहीं दे रहे थे।
उसने बस
धीरे से सिर झुका लिया।
क्योंकि कुछ अलविदाएँ
शब्दों से नहीं,
खामोशी से कही जाती हैं।
कुछ महीनों बाद
एक तस्वीर आई।
साक्षी—
लाल जोड़े में सजी,
होंठों पर मुस्कान,
आँखों में एक अधूरी-सी चमक।
रोहन ने
तस्वीर को कुछ पल देखा,
फिर बिना कुछ कहे
फोन बंद कर दिया।
वह बाहर निकल आया
और बच्चों के साथ खेलने लगा,
जैसे सब कुछ
बिल्कुल सामान्य हो।
शाम को
नेहा ने धीरे से पूछा—
“सब ठीक है ना?”
रोहन ने
मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ… अब सब ठीक है।”
लेकिन सच ये था कि
कुछ मुलाक़ातें
कभी खत्म नहीं होतीं।
वे ज़िंदगी भर
दिल के किसी कोने में
खामोशी से बैठी रहती हैं—
ना शिकायत,
ना शोर,
बस एक मीठी-सी टीस बनकर
यादों में ज़िंदा रहती हैं।

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