बस कुछ दिन के लिए…
रात के करीब दस बज रहे थे।
घर में सब सो चुके थे, लेकिन रसोई की हल्की-सी पीली रोशनी अब भी जली हुई थी।
रीमा चुपचाप बर्तन धो रही थी।
पानी की आवाज़ के बीच उसकी सिसकियाँ दबकर रह जा रही थीं।
कुछ देर पहले ही माँ का फोन आया था—
“बेटा… तेरे पापा की दवाइयाँ खत्म हो गई हैं।
डॉक्टर ने बाहर जाने से मना किया है।
तेरी बहन पायल की शादी है, समझ नहीं आ रहा क्या करें…
अगर तू पास होती, तो दिल को थोड़ा सहारा मिल जाता…”
रीमा फोन रखते ही फूट-फूटकर रो पड़ी थी।
लेकिन अब… आँसू भी आवाज़ नहीं कर पा रहे थे।
तभी पीछे से उसकी सास, शारदा देवी की आवाज़ आई—
“इतनी देर क्यों लगा रही हो?
कल सुबह जल्दी उठना है।”
रीमा ने आँचल से आँखें पोंछीं और धीरे से बोली—
“माँ जी… आपसे एक बात पूछनी थी।”
शारदा देवी ने थके स्वर में कहा—
“बोलो।”
रीमा ने काँपती आवाज़ में कहा—
“मेरी छोटी बहन की शादी है।
माँ-पापा की तबीयत ठीक नहीं रहती।
मम्मी चाहती हैं कि मैं शादी से कुछ दिन पहले वहाँ जाकर उनकी मदद कर दूँ…
अगर आप इजाज़त दें तो…”
इतना सुनते ही शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया।
“नहीं,”
उन्होंने बिना सोचे कहा।
“यहाँ घर कोई खाली नहीं है।
मेरे पैरों में दर्द रहता है, सर्दी बढ़ रही है।
सब काम कौन करेगा?”
रीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
“माँ जी… बस कुछ ही दिन…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
शारदा देवी ने तीखे स्वर में कहा—
“जिस दिन शादी होगी, उसी दिन चली जाना।
और ध्यान रखना—
अगर मेरी मर्जी के खिलाफ गईं, तो वापस आने की ज़रूरत नहीं।”
यह सुनते ही रीमा का दिल जैसे बैठ गया।
उसने सिर झुका लिया।
अब बोलने की ताक़त नहीं बची थी।
उसी समय ड्राइंग रूम में बैठे उसके ससुर, हरिनाथ जी, सब सुन चुके थे।
उन्होंने धीरे से आवाज़ दी—
“रीमा बेटा… तुम जाकर सो जाओ।”
रीमा चुपचाप कमरे में चली गई।
बिस्तर पर लेटते ही वह सिसक-सिसक कर रोने लगी।
उधर हरिनाथ जी ने शारदा देवी से कहा—
“शारदा… याद है,”
हरिनाथ जी ने बहुत धीमे स्वर में कहा,
“जब हमारी बेटी सीमा की शादी थी?”
शारदा देवी ने कुछ नहीं कहा।
बस नज़रें झुका लीं।
“तुमने उसे कितने दिन पहले बुला लिया था?”
हरिनाथ जी ने फिर पूछा।
“बीस दिन…”
शारदा देवी की आवाज़ भर्रा गई।
हरिनाथ जी कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
“और अगर उस वक्त सीमा यहाँ न आती,
तो क्या तुम अकेले सारी तैयारियाँ कर पाती?”
शारदा देवी की आँखें छलक आईं।
होंठ काँपने लगे, लेकिन शब्द नहीं निकले।
हरिनाथ जी ने बात आगे बढ़ाई—
“याद है, जब सीमा की सास बीमार थीं?
तब भी तुमने कहा था—
‘अगर मैं अपनी बेटी को कुछ दिनों के लिए
अपने पास नहीं रख सकती,
तो माँ कहलाने का क्या हक़ है?’”
कमरे में गहरी ख़ामोशी छा गई।
ऐसी ख़ामोशी,
जिसमें बीते फैसले,
और अनकहे पछतावे
धीरे-धीरे दिल में उतरने लगे।
शारदा देवी ने आँचल से आँखें पोंछीं।
शायद पहली बार
उन्हें अपनी गलती साफ़ दिखाई दे रही थी।
कमरे में गहरी चुप्पी छा गई।
हरिनाथ जी की आवाज़ भारी हो गई—
“आज वही पीड़ा रीमा के माँ-बाप भी महसूस कर रहे हैं।
बेटियाँ चाहे शादी के बाद कितनी ही दूर क्यों न चली जाएँ,
माँ-बाप के दिल में उनकी जगह कभी कम नहीं होती…
वहाँ हर दिन वही खालीपन रह जाता है।”
यह सुनते ही शारदा देवी की आँखें भर आईं।
आँसू बिना रोके गालों पर ढलकने लगे।
“मुझे डर लगता है…”
उन्होंने टूटती आवाज़ में कहा—
“अगर वह चली गई,
तो यह घर कैसे चलेगा?
मैं अकेली कैसे सब संभालूँगी?”
हरिनाथ जी ने धीरे से उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया—
उस स्पर्श में शिकायत नहीं, सिर्फ़ अपनापन था।
“घर काम से नहीं चलता, शारदा,”
उन्होंने शांत लेकिन गहरे स्वर में कहा।
“घर रिश्तों से चलता है।
अगर हम उसकी खुशी छीन लेंगे,
तो वह हमारे सामने रहते हुए भी कभी खुश नहीं रह पाएगी…
और ऐसा सूना घर,
जहाँ दिल उदास हों,
वह घर नहीं कहलाता।”
काफी देर तक शारदा देवी चुप रहीं।
फिर वह रीमा के कमरे की ओर बढ़ीं।
दरवाज़ा खोलते ही उन्होंने देखा—
रीमा तकिए में मुँह छिपाकर रो रही थी।
शारदा देवी का दिल भर आया।
“बहू…”
शारदा देवी ने बहुत धीरे, बिल्कुल माँ की तरह कहा।
रीमा चौंककर उठ बैठी।
आँखें सूजी हुई थीं, तकिया आँसुओं से भीगा था।
शारदा देवी कुछ पल उसे देखती रहीं।
फिर स्नेह से उसका सिर सहलाया।
भरे गले से बोलीं—
“अपने मायके जाने की तैयारी कर ले, बेटा।
मुझसे गलती हो गई थी।
माँ-बाप की सेवा से किसी बेटी को रोकना…
सच में बहुत बड़ा पाप है।”
इतना सुनते ही रीमा का बाँध टूट गया।
वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
वह उठकर सास से लिपट गई,
जैसे बरसों बाद कोई अपना मिल गया हो।
“माँ जी…”
उसके मुँह से बस यही शब्द निकल पाया।
शारदा देवी ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
उस पल वह सास नहीं,
सिर्फ़ एक माँ थी।
हरिनाथ जी दरवाज़े पर खड़े यह दृश्य देख रहे थे।
उनकी आँखें भी नम थीं।
उन्होंने मन ही मन सोचा—
“जिस घर में समझ जन्म ले ले,
वहाँ गिरे आँसू भी बेकार नहीं जाते।
वे रिश्तों की जड़ों को सींचते हैं,
और टूटते हुए मनों को फिर से जोड़ देते हैं।”
उस रात रीमा बहुत दिनों बाद
बेचैनी के बिना सो पाई।
तकिये पर सिर रखते ही
उसके भीतर का सारा डर,
सारी पीड़ा
जैसे किसी ने चुपचाप समेट ली हो।
क्योंकि उस दिन
उसे सिर्फ़ मायके जाने की अनुमति नहीं मिली थी—
उसे
माँ का आँचल,
समझ का सहारा
और अपनापन मिला था।

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