घर का स्वाद

Indian woman standing in a modern kitchen with traditional home cooked food, showing contrast between fast food lifestyle and homemade meals



नेहा ने जैसे ही ससुराल की रसोई में कदम रखा, उसे पहली ही बात समझ आ गई थी—

यहाँ चूल्हा सिर्फ नाम का था।


किचन में माइक्रोवेव था, एयर फ्रायर था, सैंडविच मेकर था,

लेकिन दाल रखने का डिब्बा नहीं था,

चावल का कनस्तर नहीं था।


सुबह नाश्ते में—ब्रेड, सॉसेज

दोपहर में—नूडल्स, बर्गर

रात में—पिज़्ज़ा या बाहर का खाना


नेहा कुछ दिनों तक चुप रही।

उसे लगा, “नए घर में आई हूँ, धीरे-धीरे सब समझ आ जाएगा।”


लेकिन एक दिन ड्रॉइंग रूम में बैठी उसकी ननद बोल पड़ी—


“भैया, मुझे तो घर का खाना खाने वाले लोग बिल्कुल अजीब लगते हैं।

मतलब रोज़ दाल-चावल? इतना बोरिंग!”


सास हँसते हुए बोलीं—

“अरे हाँ, जैसे कोई मजबूरी हो। अब ज़माना बदल गया है।”


नेहा ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन उस दिन से उसके मन में एक डर बैठ गया।


“अगर मैंने कह दिया कि मुझे दाल-चावल पसंद है…

तो ये लोग भी मुझे पुरानी सोच वाली समझेंगे।”


उस दिन से नेहा ने फैसला कर लिया—

“मैं भी वही खाऊँगी जो ये खाते हैं।”



मन का स्वाद...


तीन महीने बीत गए।


नेहा बाहर से मुस्कुराती थी,

लेकिन अंदर से थक चुकी थी।


पेट भरा होता था,

पर मन खाली।


एक रात वो मोबाइल पर खाना बनाते वीडियो देख रही थी—

घी में तड़की हुई दाल,

भाप छोड़ते चावल।


उसकी आँखें भर आईं।


“काश… आज बस एक कटोरी दाल मिल जाती।”


तभी उसकी जेठानी सुमन अंदर आई—


“अरे नेहा, इतनी चुप क्यों हो?”


“कुछ नहीं दीदी… बस घर की याद आ रही है।”


“तो चली जाओ कुछ दिन।

यहाँ सब मैं संभाल लूँगी।”


नेहा बिना देर किए मायके निकल गई।



मायके की थाली...


माँ ने जैसे ही उसे देखा, घबरा गई—


“अचानक कैसे आ गई?”


“माँ… दाल-चावल चाहिए।”


बस इतना ही कहा था नेहा ने।


माँ ने बिना सवाल किए खाना परोसा।

पहला निवाला मुँह में गया और नेहा रो पड़ी।



तभी नेहा का मोबाइल बज उठा।


स्क्रीन पर सुमन का नाम चमक रहा था।


“नेहा, जल्दी वापस आओ। बहुत बड़ी इमरजेंसी है।”


नेहा का हाथ एक पल को थाली पर ही ठहर गया।

दाल की खुशबू हवा में तैर रही थी,

चावल से उठती भाप आँखों में चुभने लगी।


वह बिना एक भी निवाला मुँह में डाले उठ खड़ी हुई।


थाली को चुपचाप मेज़ पर रख दिया।


हल्की-सी मुस्कान चेहरे पर लाने की कोशिश करते हुए उसने बस इतना कहा—


“आज भी… घर के खाने को सिर्फ देखना ही नसीब हुआ।

खाना फिर रह गया।”


और इतना कहकर

नेहा भारी मन से दरवाज़े की ओर बढ़ गई।



गलतफहमी...


घर पहुँची तो देखा—

टेबल पर ढेर सारा चाइनीज़ खाना।


सुमन हँसते हुए बोली—

“अगर देर करती तो नूडल्स ठंडे हो जाते।”


नेहा कुछ नहीं बोली।

बस बैठकर खा लिया।


लेकिन उस रात उसने तय कर लिया—


“अब चाहे जो हो, मैं अपनी पसंद छुपाऊँगी नहीं।”



पड़ोस की खुशबू...


कुछ दिन बाद नए पड़ोसी आए।

एक शाम उनके घर से उपमा की खुशबू आई।


नेहा की साँस रुक गई।


पड़ोसन सीमा टिफिन लेकर आई—


“थोड़ा सा बना था, सोचा बाँट दूँ।”


नेहा आगे बढ़ी ही थी कि सास बोल पड़ीं—


“अरे नहीं नहीं, हम घर का खाना नहीं खाते।”


सीमा असहज होकर लौट गई।


नेहा अंदर ही अंदर टूट गई।



सच सामने आया...


अगली सुबह नेहा की आँखों में आँसू थे।


सुमन ने देख लिया।


“अब बताओ… बात क्या है?”


नेहा सब कह गई।


सुमन सन्न रह गई।


“अरे पगली… हमने कभी घर के खाने को बुरा नहीं कहा।

वो बात किसी और संदर्भ में थी।”


पूरा परिवार बैठा।


सास बोलीं—


“हमें लगा तुम भी फास्ट फूड पसंद करती हो।”


नेहा पहली बार खुलकर बोली—


“मुझे घर का खाना चाहिए… रोज़।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।



नई शुरुआत...


उसी दिन नेहा ने रसोई में दाल-चावल बनाए।


चूल्हे पर चढ़ी दाल की तड़तड़ाहट,

जीरे की महक और पकते चावल की भाप

धीरे-धीरे पूरे घर में फैल गई।


सबसे पहले सास ने एक चम्मच चखा।

एक पल को वह रुकीं,

फिर बिना कुछ कहे दूसरी कौर ले ली।


ससुर ने भी प्लेट आगे बढ़ाई।

खाते ही उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।


“इतना स्वाद?”

“और पेट पर भी कोई भारीपन नहीं।”

“खाकर अजीब सी तसल्ली मिल रही है।”


सुमन यह सब देखकर हँस पड़ी।


“लगता है हम कब से एक गलत आदत के आदी हो गए थे,”

वह बोली।


उस दिन के बाद घर का नियम बदल गया।


कभी पिज़्ज़ा बनता,

तो कभी सादी दाल-चावल।


अब खाने में ज़बरदस्ती नहीं थी,

न दिखावा था,

न शर्म।


नेहा अब चुप नहीं थी।


और वह घर—

जो कभी सिर्फ रहने की जगह लगता था,

अब सच में घर लगने लगा था।



अंतिम भाव...


गलतफहमी ने उसके जीवन के कई महीने

चुपचाप छीन लिए थे,

बिना शोर किए, बिना शिकायत के।


लेकिन जिस दिन सच बोलने की हिम्मत हुई,

उसी एक बातचीत ने

सब कुछ बदल दिया।


तभी उसे समझ आया—


कभी-कभी

अपनी पसंद बताना

ज़िद नहीं होता,

वो अपने होने को स्वीकार करने की

सबसे सच्ची पहचान होती है।





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