चुपचाप रखी चाबी

Emotional Indian kitchen scene showing a woman cooking alone in a traditional home, remembering her mother-in-law with love and strength.


सरोज देवी को कमर में हमेशा दर्द रहता था।

दर्द ऐसा कि सुबह उठते ही पहले हाथ दीवार पर टिकता, फिर ज़मीन पर पाँव पड़ता।

डॉक्टर ने साफ कह दिया था—

“ज़्यादा चलना-फिरना मत कीजिए।”


लेकिन सरोज देवी के लिए यह बात मानना आसान नहीं था।


घर छोटा था—

एक कमरा, रसोई, और बाहर छोटी-सी बैठकी।

घर में उनके अलावा बेटा दीपक, बहू सीमा और सात साल का पोता आरव रहता था।


दीपक रोज़ सुबह दफ़्तर चला जाता,

और सीमा—

घर, बच्चा, रसोई, सब सँभालती।

लेकिन फैसले?

वो सरोज देवी के ही होते थे।


कब गैस भरवानी है,

कौन-सी दाल आएगी,

आरव का स्कूल कौन-सा होगा,

दीपक की तनख़्वाह कहाँ खर्च होगी—

सब कुछ वही तय करती थीं।


सीमा को शुरू-शुरू में बहुत अजीब लगता था।

वह सोचती—

“मैं भी इस घर की बहू हूँ, माँ हूँ… फिर भी मुझसे कुछ नहीं पूछा जाता।”


एक दिन उसने दीपक से कहा भी—

“आपकी माँ मुझ पर भरोसा ही नहीं करतीं।”


दीपक ने थके हुए स्वर में कहा—

“सीमा, उन्होंने पूरी ज़िंदगी अकेले घर चलाया है। अब उन्हें लगता है अगर उन्होंने हाथ छोड़ा, तो सब बिखर जाएगा।”


सीमा चुप हो गई।


धीरे-धीरे उसने भी अपने मन को समझा लिया।

जो माँजी कहतीं, वही करती।

अपनी पसंद उसने मन के किसी कोने में रख दी।


उसे लगने लगा—

“चलो, ज़िम्मेदारी तो माँजी पर है। मैं बस काम कर देती हूँ।”



एक दिन सरोज देवी बाथरूम में फिसल गईं।

कमर की हड्डी में चोट आई।

डॉक्टर ने सख़्त हिदायत दी—

“अब इन्हें आराम चाहिए। ज़्यादा हिलना-डुलना मना है।”


पहली बार घर की रफ्तार थम गई।


अगले महीने दीपक तनख़्वाह लेकर आया,

और आदतन माँ के पास गया।


सरोज देवी ने हाथ उठाकर उसे रोका—

“अब ये पैसे सीमा को दे दे।”


सीमा घबरा गई—

“नहीं माँजी, आप ही रखिए। आप बस बता दीजिएगा क्या करना है।”


दीपक हैरान रह गया।

जिस सीमा ने कभी घर की चाबी माँगी थी,

आज वही पीछे हट रही थी।


सरोज देवी ने गहरी साँस ली—

“बहू, अगर कल मैं न रही, तो?”


सीमा की आँखें भर आईं—

“आपको कुछ नहीं होगा माँजी।”


उस दिन के बाद सरोज देवी चुप हो गईं।

रौब कम हुआ,

डर सामने आ गया।


उन्हें एहसास हुआ—

“मैं इस डर में जी रही थी कि कहीं मेरा घर मुझसे छिन न जाए।”



भरोसे की शुरुआत...


सीमा अब सब्ज़ी ख़रीदने जाती,

लेकिन लौटकर थैला माँजी के सामने रखती—

“देखिए, दाम सही हैं न?”


एक-एक पैसे का हिसाब देती।

बचा हुआ पैसा भी।


सरोज देवी चुपचाप देखतीं।


एक शाम उन्होंने सीमा को बुलाया—

“मैंने अलमारी की चाबी तेरे तकिये के नीचे रख दी है।”


सीमा सकपका गई—

“माँजी, इसकी ज़रूरत नहीं है।”


सरोज देवी मुस्कुराईं—

“ज़रूरत भरोसे को होती है, बहू।”



छह महीने बाद सरोज देवी चुपचाप चली गईं।

घर में शोर था,

लेकिन सीमा के भीतर सन्नाटा।


तेरहवीं के बाद जब घर खाली हुआ,

सीमा हर काम से पहले उसी कमरे में जाती—

“माँजी, क्या बनाऊँ?”


खाली पलंग उसे काटने लगता।


एक दिन सफ़ाई करते हुए

अलमारी के नीचे उसे एक काग़ज़ मिला।


ख़त था।



ख़त


> “सीमा,


मैं जानती हूँ—

मेरे बिना भी तू कई बार मुझसे पूछने आएगी।

आदतें इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं।


लेकिन अब तुझे

अपने घर की धुरी

खुद बनना होगा।


जो डर मैं जीवन भर

अपने भीतर सँजोए रही,

उसे अपने साथ मत ढोना।


गलतियाँ होंगी—

तो भी रुकना मत,

आगे बढ़ते रहना।


क्योंकि अब तू

सिर्फ़ बहू नहीं है,

अब इस घर की छत

तू स्वयं है।


— माँ”



सीमा बहुत देर तक रोती रही।


फिर उसने आरव को गोद में उठाया।

रसोई में गई।

और पहली बार—

अपने मन से खाना बनाया।


आज भी जब वह डरती है,

वह ख़त निकालती है।


और उसे लगता है—

सरोज देवी

अब भी

उसके कंधे पर हाथ रखे खड़ी हैं।





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