अधूरी चिट्ठी की मिठास

Emotional moment between Indian mother in law and daughter in law sitting together at home in warm morning light


शाम का समय था।

आँगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था।


मीरा चुपचाप बैठी पुरानी अलमारी साफ कर रही थी। शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। नया घर, नए लोग, नई जिम्मेदारियाँ — सब कुछ अभी सीख ही रही थी।


तभी उसे अलमारी के एक कोने में एक पुरानी डायरी मिली। कवर पर लिखा था —

“सावित्री”


यह उसकी सास का नाम था।


मीरा ने धीरे से डायरी खोली।

पहले पन्ने पर अधूरी चिट्ठी लिखी थी —


"अगर मैं कभी कठोर लगूँ, तो समझ लेना कि ज़िंदगी ने मुझे ऐसा बनाया है..."


मीरा पढ़ती गई।


उसमें लिखा था कि कैसे सावित्री जी ने पति के गुजर जाने के बाद अकेले दोनों बेटों को पाला। कैसे समाज की बातें, रिश्तेदारों की ताने और जिम्मेदारियों का बोझ उन्हें मजबूत बनाता गया।


मीरा की आँखें नम हो गईं।


उसे याद आया —

कल ही तो मामूली सी बात पर मम्मी जी ने उसे डाँट दिया था क्योंकि दाल में नमक थोड़ा कम था।


मीरा को बहुत बुरा लगा था।

वह अपने कमरे में जाकर रोई भी थी।


लेकिन आज डायरी पढ़कर उसे लगा —

“शायद उनका गुस्सा डर से आता है… कहीं घर बिखर न जाए।”



अगले दिन सुबह से ही हल्की-हल्की बारिश हो रही थी।

आसमान पर बादल छाए थे और गली की मिट्टी कीचड़ में बदल चुकी थी। रास्ता फिसलन भरा था।


सावित्री जी सिर पर आँचल संभालते हुए बाजार से सब्ज़ियों का थैला उठाए घर की ओर लौट रही थीं। उम्र और गीली ज़मीन — दोनों ही उनके कदमों को भारी बना रहे थे।


दरवाज़े से यह दृश्य देखकर मीरा घबरा गई।

वह तुरंत बाहर दौड़ी और उनके हाथ से थैला पकड़ लिया।


“अरे मम्मी जी! आप इस बारिश में क्यों चली गईं? मुझे बता देतीं, मैं चली जाती।”


सावित्री जी कुछ पल चुप रहीं।

बारिश की बूंदें उनके चेहरे पर गिर रही थीं, लेकिन शायद आँखों की नमी कुछ और ही कह रही थी।


धीरे से बोलीं —

“तुम पर पहले ही इतना काम रहता है… तुम्हें और तकलीफ़ देना अच्छा नहीं लगता।”


मीरा ने थैला अंदर रखते हुए उनकी ओर देखा।

उसकी आवाज़ में अपनापन था —


“मम्मी जी, मैं इस घर की बहू जरूर हूँ, लेकिन पराई नहीं हूँ। यह घर अब मेरा भी है। आपका काम ही मेरा काम है… और आपकी जिम्मेदारियाँ बोझ नहीं, मेरा अपना फर्ज हैं।”


सावित्री जी की आँखें भर आईं।

उन्होंने पहली बार मीरा के सिर पर हाथ फेरा और बस इतना कहा —


“सच में… तू बोझ नहीं, सहारा है।”


बारिश अब भी हो रही थी,

लेकिन उस घर के भीतर एक अनकही दूरी चुपचाप पिघल चुकी थी। 



मीरा ने देखा कि मम्मी जी को सिलाई का बहुत शौक है।

लेकिन कई सालों से उन्होंने मशीन को छुआ तक नहीं था।


मीरा ने एक दिन पड़ोस की लड़कियों को बुलाया और कहा —

“मम्मी जी उन्हें सिलाई सिखाएँगी।”


पहले तो सावित्री जी हिचकिचाईं।

फिर धीरे-धीरे उनका मन लगने लगा।


घर में फिर से हँसी लौट आई।

सिलाई मशीन की “टर्र-टर्र” की आवाज़ पूरे घर में गूंजने लगी।


उस रात अचानक मीरा की तबीयत बिगड़ गई।

शाम से ही हल्का बुखार था, लेकिन आधी रात तक उसका शरीर तपने लगा। माथा जल रहा था और साँसें तेज़ चल रही थीं।


घर में हलचल मच गई। दवा दी गई, ठंडे पानी की पट्टियाँ रखी गईं। धीरे-धीरे सब अपने कमरों में चले गए, लेकिन सावित्री जी नहीं गईं।


वे चुपचाप मीरा के सिरहाने बैठी रहीं।

कभी उसके माथे पर हाथ फेरतीं, कभी उसके बालों को सहलातीं। बीच-बीच में घड़ी देखतीं और समय पर दवा देतीं।


रात के सन्नाटे में सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

सावित्री जी की आँखों में नींद नहीं थी — बस चिंता थी।


सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैली तो मीरा की आँख धीरे-धीरे खुली।

उसने महसूस किया कि किसी ने उसकी हथेली थाम रखी है।


उसने पलटकर देखा —

सावित्री जी उसी तरह बैठी थीं। उनकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे, लेकिन चेहरे पर राहत थी।


“मम्मी जी… आप सोई नहीं?” मीरा ने कमजोर आवाज़ में पूछा।


सावित्री जी ने उसके माथे पर हाथ रखा और हल्की मुस्कान के साथ बोलीं —

“तुम्हारे बिना घर खाली-खाली लगता है… कैसे सो जाती?”


मीरा की आँखें भर आईं।

वह धीरे से बोली —

“और आपके बिना घर अधूरा है…”


कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखती रहीं।

ना कोई शिकायत थी, ना कोई दूरी।


उस सुबह सिर्फ बुखार नहीं उतरा था —

दो दिलों के बीच की झिझक भी उतर गई थी। 



अधूरी चिट्ठी पूरी हुई...


कुछ दिनों बाद मीरा ने वही डायरी उठाई।

अधूरी चिट्ठी के नीचे उसने लिख दिया —


"कभी मैं भी थक जाऊँ या नाराज़ हो जाऊँ, तो मेरा हाथ छोड़ मत दीजिएगा। मैं अभी इस घर को समझना सीख रही हूँ। साथ रहेंगे तो यह घर सिर्फ मकान नहीं, सच में परिवार बन जाएगा।”


उसने डायरी सावित्री जी के तकिए के नीचे रख दी।


रात को सावित्री जी ने वह पढ़ा।

सुबह जब चाय बनी, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा —


“मीरा, आज चाय थोड़ी ज्यादा मीठी है।”


मीरा घबरा गई —

“ओह, शायद चीनी ज्यादा पड़ गई।”


सावित्री जी बोलीं —

“नहीं… आज मिठास सही है।”


और उस दिन पहली बार दोनों ने साथ बैठकर बिना किसी डर, बिना किसी झिझक के चाय पी।


क्योंकि रिश्ते डाँट से नहीं, समझ से मीठे होते हैं। 




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