अब यह घर तुम्हारा है
“सीमा… ज़रा जल्दी करो, मेहमान आने वाले हैं।”
बड़ी भाभी की तेज़ आवाज़ रसोई तक पहुँची तो सीमा ने जल्दी से हाथ धोए और दुपट्टा ठीक किया।
उम्र पैंतीस साल… लेकिन चेहरे पर समय की थकान चालीस से कम नहीं लगती थी।
सीमा जब सोलह साल की थी, तभी एक सड़क दुर्घटना में माँ-पापा दोनों चले गए थे।
तीनों बड़े भाइयों ने उसे अपने साथ रख लिया। शुरू-शुरू में सब ठीक था। भाई उसे बहुत प्यार करते थे।
लेकिन जैसे-जैसे घर में भाभियाँ आईं, सीमा का स्थान धीरे-धीरे बदलने लगा।
वह इस घर की बेटी से ज़्यादा एक जिम्मेदारी बन गई।
सुबह सबसे पहले उठना… पूरे घर का नाश्ता बनाना… बच्चों को तैयार करना… कपड़े धोना… और फिर पास के छोटे से स्कूल में पढ़ाने जाना।
वह कभी शिकायत नहीं करती थी।
शायद उसने अपनी किस्मत से समझौता कर लिया था।
उसका रंग हल्का साँवला था और चेहरे की बनावट बिल्कुल सादगी भरी थी। भाभियाँ अक्सर कहतीं—
“इतनी उम्र हो गई… अब कौन करेगा इससे शादी?”
सीमा बस मुस्कुरा देती।
उसने उम्मीद करना बहुत पहले छोड़ दिया था।
लेकिन पिछले महीने कुछ अलग हुआ।
जिस स्कूल में वह पढ़ाती थी, वहाँ अक्सर एक सज्जन अपने बेटे को छोड़ने आते थे।
उनका नाम अरविंद था।
शांत स्वभाव… विनम्र व्यवहार।
उनकी पत्नी का दो साल पहले बीमारी से निधन हो चुका था।
उनका सात साल का बेटा, राहुल, बहुत चुप रहता था।
सीमा ने उसे पढ़ाते-पढ़ाते महसूस किया कि वह बच्चा माँ के प्यार के लिए तरस रहा है।
वह उसे थोड़ा ज़्यादा ध्यान देने लगी।
धीरे-धीरे राहुल मुस्कुराने लगा।
एक दिन अरविंद ने स्कूल के बाहर सीमा से कहा—
“आपसे एक ज़रूरी बात करनी है।”
सीमा घबरा गई।
“जी कहिए…”
“मैं… आपसे शादी करना चाहता हूँ।”
सीमा के हाथ से किताबें लगभग गिर गईं।
“लेकिन… मैं…”
“मुझे पता है आप क्या सोच रही हैं,” अरविंद ने शांत स्वर में कहा,
“मैं आपको कोई एहसान नहीं दे रहा। मुझे अपने बेटे के लिए माँ चाहिए… और मुझे लगता है, आप उससे भी ज़्यादा उसकी ज़िंदगी में रोशनी ला सकती हैं।”
सीमा कुछ नहीं बोली।
उसकी आँखों में हल्की नमी थी।
आज वही अरविंद अपने परिवार के साथ सीमा को देखने आने वाले थे।
भाभियाँ बाहर बैठक में बैठी थीं।
सीमा चाय बना रही थी।
“ध्यान रखना… कोई गलती मत करना,” छोटी भाभी ने ताना मारा।
सीमा चुप रही।
वह ट्रे लेकर बाहर आई।
उसके हाथ हल्के काँप रहे थे।
उसने चाय सामने रखी।
तभी राहुल दौड़कर आया और सीधे सीमा के पास खड़ा हो गया।
“मैम… आप हमारे घर कब आओगी?”
सब चौंक गए।
सीमा ने उसकी तरफ देखा।
अरविंद मुस्कुराए।
“अगर सीमा जी चाहें… तो बहुत जल्दी।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
बड़े भाई ने हिचकते हुए पूछा—
“आपको सीमा में क्या पसंद आया?”
अरविंद ने बिना झिझक जवाब दिया—
“इनका दिल।”
भाभियाँ एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
“और एक बात और,” अरविंद ने आगे कहा,
“मैं सीमा जी को अपने घर की जिम्मेदारी नहीं… सम्मान देना चाहता हूँ।”
सीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
शायद पहली बार किसी ने उसे बोझ नहीं… इंसान समझा था।
दो हफ्ते बाद सीमा की शादी बहुत सादगी से संपन्न हो गई।
न बैंड-बाजा, न कोई दिखावा — बस घर के आँगन में कुछ अपने लोग, हल्की-सी सजावट और धीमे-धीमे बजते मंगल गीत।
फेरे लेते समय सीमा का दिल अजीब-सी शांति से भरा था।
जैसे बरसों बाद उसे अपनी जिंदगी की नई दिशा मिल रही हो।
विदाई का समय आया तो माहौल भारी हो गया।
बड़े भाई की आँखें लाल थीं। वे हमेशा मजबूत बने रहे थे, लेकिन आज उनकी आवाज़ भर्रा गई।
उन्होंने सीमा का हाथ पकड़ लिया —
“हमें माफ़ कर देना, सीमा… अगर कभी तुझे दुख दिया हो तो…”
सीमा की आँखें भी नम हो गईं।
उसने धीरे से उनके हाथ अपने माथे से लगा लिए।
“ऐसा मत कहिए भैया… माँ-पापा के बाद आपने ही तो मुझे संभाला था। अगर आप न होते तो मैं कहाँ होती?”
भाई कुछ कह नहीं पाए। बस उसका सिर सहलाते रहे।
सीमा ने एक बार पीछे मुड़कर घर को देखा —
वही आँगन, वही दीवारें, वही यादें…
लेकिन इस बार उसके कदम बोझिल नहीं थे।
उसके दिल में डर कम था, उम्मीद ज़्यादा थी।
आज पहली बार उसे लगा कि वह किसी समझौते के लिए नहीं,
बल्कि अपने हिस्से की इज़्ज़त और अपनापन पाने के लिए जा रही है।
नई जिंदगी उसका इंतज़ार कर रही थी —
और इस बार वह तैयार थी… मुस्कुराते हुए।
जब वह नए घर पहुँची, राहुल दौड़कर उसके गले लग गया।
“मम्मी… आप आ गईं!”
सीमा रुक गई।
यह शब्द उसने कभी अपने लिए नहीं सुना था।
उसकी आँखें भर आईं।
अरविंद उसके पास आए और धीरे से बोले—
“अब यह घर तुम्हारा है… और हम भी।”
सीमा ने पहली बार खुद को अकेला नहीं महसूस किया।
उसकी किस्मत अब समझौतों से नहीं… सम्मान और अपनेपन से लिखी जा रही थी।

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