सपनों वाली बहू
सुबह का समय था।
आँगन में धूप हल्की-हल्की फैल रही थी।
रीमा अपनी सास कमला देवी के साथ रसोई में नाश्ता बना रही थी। तभी उसके ससुर रामप्रसाद जी अख़बार लेकर अंदर आए।
“अरे सुनो कमला! हमारे शहर में महिला उद्यमिता प्रतियोगिता होने वाली है। बड़े-बड़े लोग आएंगे। जो जीतेगा उसे अपना बिज़नेस शुरू करने के लिए पैसे भी मिलेंगे।”
कमला देवी हँस पड़ीं —
“अजी, ये सब बड़े घरों की औरतों के काम हैं। हमारी बहू तो घर संभाले वही बहुत है।”
रीमा चुप रही।
पर उसके मन में कुछ हलचल हुई।
रीमा का सपना...
रीमा को बचपन से ही मिठाइयाँ बनाना बहुत पसंद था।
जब भी घर में कोई त्योहार आता, उसकी माँ तरह-तरह के लड्डू, नमकीन और पकवान बनाकर गाँव में बेचती थीं। छोटी-सी रीमा हमेशा उनकी मदद करती—कभी आटा गूंधती, कभी चाशनी देखती, तो कभी लड्डू गोल-गोल बनाती। धीरे-धीरे उसने स्वाद, माप और मेहनत—तीनों का हुनर सीख लिया।
समय बीता और रीमा की शादी शहर में हो गई।
ससुराल का घर बड़ा था, परिवार अच्छा था, किसी चीज़ की कमी नहीं थी।
लेकिन एक बात वह अक्सर सुनती—
“बहू, घर की लक्ष्मी बाहर काम नहीं करती।”
रीमा चुप रहती। उसने कभी किसी से बहस नहीं की, न ही अपनी इच्छा ज़ाहिर की।
वह अपने सारे काम मन लगाकर करती रही।
पर उसके दिल के किसी कोने में एक सपना अब भी ज़िंदा था—
एक दिन अपनी खुद की मिठाई की दुकान खोलने का, जहाँ लोग उसके हाथ का स्वाद चखें और उसकी पहचान सिर्फ “किसी की बहू” नहीं, बल्कि “एक हुनरमंद मिठाई बनाने वाली” के रूप में हो।
एक दिन…
उसकी ननद पूजा कॉलेज से आई और बोली —
“भाभी! हमारे कॉलेज में फूड फेस्ट होने वाला है। बाहर के लोग भी आएंगे। आप तो इतनी अच्छी मिठाई बनाती हो, आप स्टॉल क्यों नहीं लगाती?”
कमला देवी ने तुरंत टोका —
“कहीं जाने की जरूरत नहीं। घर का काम कम है क्या?”
रीमा चुप हो गई।
पर रात को उसके पति रोहन ने उससे पूछा —
“तुम सच में स्टॉल लगाना चाहती हो?”
रीमा ने धीमे से कहा —
“हाँ… पर माँजी को अच्छा नहीं लगेगा।”
रोहन मुस्कुराया —
“माँ को मैं समझाऊँगा।”
शर्तों के साथ इजाज़त...
बहुत समझाने और मनाने के बाद आखिरकार कमला देवी ने गहरी साँस लेते हुए कहा —
“ठीक है बहू, अगर तुम्हें जाना ही है तो जा सकती हो। लेकिन याद रखना, घर का एक भी काम अधूरा नहीं रहना चाहिए। और स्टॉल पर तुम साड़ी पहनकर ही जाओगी। हमें अपने घर की इज़्ज़त का भी ध्यान रखना है।”
रीमा ने सिर झुकाकर शांति से जवाब दिया —
“जी माँजी, जैसा आप कहेंगी वैसा ही होगा।”
उसने बिना किसी बहस के उनकी हर शर्त मान ली, क्योंकि उसके लिए अपने सपने के साथ-साथ परिवार की मर्यादा भी उतनी ही ज़रूरी थी।
तैयारी...
अगले सात दिनों तक रीमा ने सच में खुद को पूरी तरह काम में झोंक दिया।
सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठ जाती। पहले सास-ससुर और पति के लिए चाय बनाती, फिर नाश्ता तैयार करती, घर की सफाई करती, बर्तन धोती और दोपहर का खाना बनाकर सबको खिला देती।
दोपहर होते ही वह रसोई को फिर से सजा कर अपने सपनों की तैयारी में लग जाती। बड़े ध्यान से सामग्री नापती, नए स्वाद सोचती और बार-बार चखकर देखती कि मिठास बिल्कुल सही हो।
रात को जब सब सो जाते, तब भी उसकी मेहनत खत्म नहीं होती। वह तैयार मिठाइयों को डिब्बों में सजाकर पैक करती, उन पर छोटे-छोटे लेबल लगाती और अगले दिन की सूची बनाती।
इस बार उसने कुछ खास बनाने की ठानी थी।
साधारण मिठाई नहीं — कुछ नया, कुछ अलग।
उसने पान के स्वाद वाले खुशबूदार लड्डू बनाए, जिनमें इलायची और गुलकंद की हल्की सुगंध थी।
फिर चॉकलेट और सूखे मेवों से नरम-मुलायम बर्फी तैयार की।
और साथ ही गुड़ और घी से बनी कुरकुरी कुकीज़, जो स्वाद में मीठी होने के साथ सेहतमंद भी थीं।
धीरे-धीरे उसकी ननद पूजा भी उसके पास आकर खड़ी हो जाती।
पहले वह बस देखती रही, फिर एक दिन चुपके से बोली —
“भाभी, मैं मदद कर दूँ?”
रीमा मुस्कुरा दी।
अब दोनों मिलकर काम करने लगीं।
पूजा पैकिंग संभालती, डिब्बों पर रिबन बांधती और बीच-बीच में चखकर कहती —
“भाभी, ये तो जीतने वाली मिठाई है!”
रीमा थकी जरूर रहती थी,
पर उसकी आँखों में चमक थी —
क्योंकि इस बार वह सिर्फ मिठाई नहीं बना रही थी,
अपने सपनों को आकार दे रही थी।
फूड फेस्ट का दिन...
रीमा ने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी, बालों में सफेद गजरा सजाया और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लेकर अपने स्टॉल पर पहुँच गई। उसके हाथ थोड़े काँप रहे थे, लेकिन आँखों में आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।
शुरुआत में लोग उसके स्टॉल के सामने रुककर सिर्फ नाम पढ़ते और मिठाइयों को देखते हुए आगे बढ़ जाते। कोई कीमत पूछता, कोई बस मुस्कुराकर चला जाता। रीमा के दिल की धड़कन तेज हो रही थी — क्या सच में किसी को पसंद आएगा?
तभी एक मध्यम उम्र की महिला आगे बढ़ीं। उन्होंने पान लड्डू का छोटा-सा टुकड़ा चखा। जैसे ही स्वाद उनके मुँह में घुला, उनकी आँखें चमक उठीं।
“वाह! इतना स्वाद तो बड़े होटल में भी नहीं मिलता!”
उनकी आवाज़ थोड़ी ऊँची थी, इसलिए आस-पास खड़े लोग भी सुनने लगे। कुछ और लोग आगे आए। किसी ने चॉकलेट बर्फी चखी, किसी ने गुड़ की कुकीज़। हर किसी के चेहरे पर संतोष और आश्चर्य साफ दिखाई दे रहा था।
धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी। जो लोग पहले सिर्फ देख रहे थे, अब लाइन में खड़े थे। पैसे गिनते-गिनते और पैकेट देते-देते रीमा को समय का एहसास ही नहीं रहा।
कुछ ही घंटों में उसकी सारी मिठाइयाँ बिक चुकी थीं। सामने खाली ट्रे रखी थीं… और रीमा की आँखों में खुशी के आँसू चमक रहे थे।
परिणाम...
शाम को रिज़ल्ट अनाउंस हुआ
जज ने माइक उठाया और मुस्कुराते हुए कहा —
“इस साल की महिला उद्यमिता प्रतियोगिता की विजेता हैं… रीमा शर्मा!”
कुछ पल के लिए रीमा को यकीन ही नहीं हुआ कि उसने सही सुना है।
पास खड़ी पूजा ने उसका हाथ पकड़कर कहा — “भाभी, आपका ही नाम लिया है!”
रीमा की आँखों में खुशी के आँसू भर आए। वह धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ी। पूरा हॉल तालियों की गूंज से भर गया।
मुख्य अतिथि ने उसे 2 लाख रुपये की सहायता राशि का चेक और एक सुंदर ट्रॉफी भेंट की।
कैमरों की फ्लैश चमकने लगीं।
रीमा ने कांपती आवाज़ में कहा —
“ये जीत सिर्फ मेरी नहीं, मेरे परिवार के विश्वास की जीत है।”
जैसे ही वह मंच से नीचे उतरी, तालियों की गूंज और तेज़ हो गई। उस पल उसे लगा — उसके सपनों को सच में उड़ान मिल गई है।
घर पहुँचते ही रीमा ने देखा कि गली में हलचल है। मोहल्ले की कई औरतें दरवाज़े के बाहर खड़ी थीं। किसी के हाथ में फूल थे, कोई मुस्कुरा रहा था, तो कोई आपस में धीमे-धीमे बातें कर रहा था।
जैसे ही रीमा अंदर आई, सबकी नज़रें उसी पर टिक गईं।
तभी कमला देवी आगे बढ़ीं। उनके चेहरे पर आज अलग ही चमक थी। उन्होंने रीमा का हाथ पकड़ा, उसे अपने पास खड़ा किया और ऊँची आवाज़ में बोलीं —
“सुन लीजिए सब लोग… ये मेरी बहू है। और आज मुझे इस पर बहुत गर्व है। इसने हमारे घर का नाम रोशन किया है।”
उनकी आवाज़ में सच्चाई और अपनापन साफ झलक रहा था।
रीमा ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन सासू माँ उसे इस तरह सबके सामने अपना गर्व कहेंगी। उसकी आँखें भर आईं। होंठों पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन आँसू खुशी के थे।
उस पल उसे लगा —
आज उसने सिर्फ़ एक प्रतियोगिता नहीं जीती,
बल्कि अपने परिवार का दिल भी जीत लिया।
सोच में बदलाव...
कुछ दिन बाद कमला देवी ने खुद कहा —
“बहू, दुकान खोलने की तैयारी कर ले। घर का काम मैं देख लूँगी। तू बस आगे बढ़।”
ननद पूजा हँसते हुए बोली —
“अब सबको बताऊँगी कि मेरी भाभी बिज़नेस वुमन हैं!”
रोहन ने दुकान के बोर्ड पर लिखा —
“रीमा’स स्वीट्स — स्वाद जो दिल जीत ले”
सीख:
✔️ बहू और बेटी में कोई फर्क नहीं होता।
✔️ अगर परिवार साथ दे तो सपने सच होते हैं।
✔️ हुनर किसी डिग्री का मोहताज नहीं होता।
और इस तरह रीमा ने न सिर्फ प्रतियोगिता जीती,
बल्कि अपने परिवार का दिल भी जीत लिया।

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