जब दिल की गांठ खुली
दोपहर का समय था।
गर्मी की हल्की तपिश पूरे आँगन में फैली हुई थी। घर के अंदर हल्की सी खामोशी थी और सब लोग अपने-अपने काम में लगे हुए थे।
उसी समय घर का दरवाज़ा थोड़ा तेज़ी से खुला।
दरवाज़े पर खड़ी थी सीमा।
उसके चेहरे पर थकान भी थी और गुस्सा भी। आँखों में जैसे कई दिनों से जमा हुआ दर्द छिपा बैठा था।
अंदर आते ही उसने तेज़ आवाज़ में पुकारा—
“माँ… ओ माँ… कहाँ हो आप?”
आँगन में झाड़ू लगा रही उसकी भाभी पूजा ने आवाज़ सुनी तो झट से मुड़ी।
सीमा को देखकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“अरे दीदी! नमस्ते… अचानक? सब ठीक तो है ना?”
सीमा ने हल्की सी नज़र पूजा पर डाली और बोली—
“भाभी, माँ कहाँ हैं? मुझे उनसे बात करनी है।”
पूजा ने झाड़ू एक तरफ रख दी और हाथ पोंछते हुए बोली—
“मम्मी जी मंदिर गई हैं। बस आती ही होंगी। आप बैठिए ना दीदी… कितने दिनों बाद आई हैं।”
सीमा बिना कुछ बोले सोफे पर बैठ गई।
पूजा उसके चेहरे को गौर से देख रही थी। उसे समझ आ गया था कि सीमा के मन में कुछ भारी चल रहा है।
वह बोली—
“आप बैठिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।”
कुछ ही देर में पूजा चाय और गरम पकौड़े लेकर आई और सीमा के सामने रख दिए।
“लीजिए दीदी… गरम-गरम खाइए। रास्ते से आई हैं, थक गई होंगी।”
सीमा ने कप उठाया, लेकिन उसका मन कहीं और ही था।
कुछ पल की चुप्पी के बाद पूजा ने धीरे से पूछा—
“दीदी… सब ठीक तो है ना?”
सीमा की आँखें अचानक भर आईं।
वह बोली—
“क्या ठीक होगा भाभी… जिंदगी जैसे बस चल ही रही है।”
पूजा ने उसके पास बैठते हुए कहा—
“अगर मन में कुछ है तो कह दीजिए। कभी-कभी मन हल्का करना जरूरी होता है।”
सीमा ने गहरी साँस ली और बोलना शुरू किया—
“आपको पता है ना… मेरी पढ़ाई कितनी अच्छी थी। मुझे बैंक में नौकरी भी मिल गई थी।”
पूजा बोली—
“हाँ दीदी, मम्मी जी ने बताया था।”
सीमा की आवाज़ भर्रा गई—
“लेकिन मेरी सास ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि घर की बहू बाहर जाकर नौकरी नहीं करेगी।”
वह कुछ पल के लिए चुप हो गई।
फिर बोली—
“मैंने अपने पति से भी कहा था कि वह मेरा साथ दें… लेकिन उन्होंने भी यही कहा कि माँ की इच्छा के खिलाफ नहीं जा सकते।”
सीमा की आँखों से आँसू निकल आए।
“उस दिन मैं बहुत दुखी होकर यहाँ आई थी। मैंने माँ को सब बताया… मुझे लगा था कि माँ मेरा साथ देंगी। पर उन्होंने भी मुझे समझा दिया कि ससुराल के फैसले में दखल नहीं दे सकतीं।”
उसने दुख भरी मुस्कान के साथ कहा—
“और अब देखिए… जब आपको नौकरी मिली है तो माँ कितनी खुश हैं। हर जगह आपकी तारीफ करती रहती हैं।”
उसकी आवाज़ में दर्द था—
“कभी-कभी लगता है कि माँ को अब मेरी परवाह ही नहीं है।”
इतने में दरवाज़े की आहट हुई।
सीमा की माँ शारदा देवी मंदिर से लौट रही थीं। उन्होंने अंदर आते ही सीमा की बातें सुन ली थीं।
वह धीरे से पास आकर बोलीं—
“सीमा बेटा… तुम ऐसा क्यों सोच रही हो?”
सीमा ने माँ की तरफ देखा और बोली—
“तो क्या गलत कह रही हूँ मैं? जब मुझे नौकरी करनी थी तब आपने मुझे समझा दिया… और अब भाभी के लिए आप लोगों से सलाह लेने जा रही हैं।”
शारदा देवी ने शांत भाव से उसके पास बैठते हुए कहा—
“बेटा, हर परिस्थिति एक जैसी नहीं होती।”
सीमा ने नाराज़ होकर कहा—
“मुझे तो सब एक जैसा ही लगता है।”
शारदा देवी ने प्यार से उसका हाथ थाम लिया।
“तुम्हें शायद पता नहीं… लेकिन तुम्हारे जाने के बाद मैंने तुम्हारी सास से इस बारे में बात की थी।”
सीमा चौंक गई।
“सच?”
“हाँ बेटा। उन्होंने कहा था कि अगर तुम अपने शहर में ही कोई काम करना चाहो तो उन्हें कोई ऐतराज नहीं होगा।”
सीमा चुप हो गई।
शारदा देवी ने आगे कहा—
“लेकिन उस समय तुम इतनी नाराज़ थी कि तुमने आगे बात ही नहीं बढ़ाई।”
पूजा भी धीरे से बोली—
“दीदी, मम्मी जी सही कह रही हैं। अगर आप चाहें तो अभी भी कुछ कर सकती हैं।”
सीमा ने आश्चर्य से पूछा—
“अब क्या कर सकती हूँ?”
पूजा मुस्कुराई—
“आपको तो सिलाई और डिजाइनिंग बहुत अच्छी आती है। क्यों न आप अपना छोटा सा बुटीक शुरू करें?”
शारदा देवी ने भी कहा—
“हाँ बेटा… अगर तुम चाहो तो हम सब तुम्हारा साथ देंगे।”
सीमा के चेहरे पर धीरे-धीरे सोच की लकीरें उभरने लगीं।
उसे महसूस हुआ कि वह इतने दिनों से गुस्से और शिकायत में उलझी हुई थी कि उसने कभी शांत होकर रास्ता ढूँढने की कोशिश ही नहीं की।
वह धीरे से बोली—
“शायद गलती मेरी ही थी… मैंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं।”
शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा, नाराज़गी में हमें अक्सर सही बातें भी गलत लगने लगती हैं।”
सीमा की आँखें भर आईं।
वह उठी और माँ को गले लगा लिया।
“माँ… मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपको गलत समझ बैठी।”
शारदा देवी मुस्कुराईं।
“अरे पगली… माँ से भी कोई माफी मांगता है क्या?”
पूजा हँसते हुए बोली—
“चलो अब इतनी बड़ी बात समझ में आ गई है तो आज मिठाई बनती है।”
तीनों हँसने लगीं।
उस दिन सीमा के दिल की एक पुरानी गांठ खुल गई।
उसे समझ आ गया—
रिश्तों में सबसे बड़ा दुश्मन नाराज़गी नहीं, बल्कि गलतफहमी होती है।

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