इंसानियत की असली जीत
दोपहर का समय था।
घर के आँगन में हल्की धूप फैली हुई थी और रसोई से मसालों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
सावित्री देवी रसोई के दरवाजे पर खड़ी होकर काम का जायज़ा ले रही थीं। घर में आज खास हलचल थी। उनके छोटे बेटे निखिल की नई नौकरी लगी थी और उसी खुशी में शाम को रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए बड़ा भोज रखा गया था।
घर की बहू, पूजा, सुबह से ही बिना रुके काम कर रही थी। कभी सब्ज़ियाँ काटना, कभी मिठाई सजाना, कभी मेहमानों के लिए बर्तन साफ करना—उसके हाथ एक पल को भी नहीं रुके थे।
सावित्री देवी बार-बार उसे टोकतीं,
“पूजा, मिठाई ठीक से सजाना… और हाँ, पनीर की सब्ज़ी में मसाला कम मत रखना। आज कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए।”
पूजा हल्की मुस्कान के साथ बस “जी माँ जी” कह देती, लेकिन उसके चेहरे पर थकान साफ दिखाई दे रही थी।
तभी अचानक पूजा का फोन बजा।
उसने जल्दी से हाथ पोंछे और फोन उठाया। दूसरी तरफ उसके पिता की घबराई हुई आवाज़ थी।
“बेटा… तुम्हारे छोटे भाई राहुल का एक्सीडेंट हो गया है। उसे अस्पताल में भर्ती किया है। डॉक्टर कह रहे हैं कि ऑपरेशन तुरंत करना पड़ेगा… तुम आ सको तो जल्दी आ जाओ।”
यह सुनते ही पूजा के हाथ कांपने लगे। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वह भागकर सावित्री देवी के पास गई और बोली,
“माँ जी… मुझे अभी अस्पताल जाना होगा। राहुल का एक्सीडेंट हो गया है। उसकी हालत बहुत खराब है।”
सावित्री देवी ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा,
“अभी? लेकिन शाम को मेहमान आने वाले हैं। घर में इतने सारे काम पड़े हैं। अगर तुम अभी चली जाओगी तो सब कैसे संभलेगा?”
पूजा की आँखों में आँसू आ गए।
“माँ जी, वह मेरा छोटा भाई है… वह मुझे बार-बार याद कर रहा होगा।”
सावित्री देवी ने थोड़ा सख्त स्वर में कहा,
“देखो बहू, हर घर में परेशानियाँ आती हैं। लेकिन घर की जिम्मेदारी भी कोई चीज़ होती है। दो-तीन घंटे बाद चली जाना।”
पूजा चुप हो गई।
उसके मन में तूफान चल रहा था। एक तरफ उसका घायल भाई अस्पताल में था, दूसरी तरफ ससुराल की जिम्मेदारी।
वह धीरे-धीरे वापस रसोई में चली गई और फिर से काम करने लगी।
शाम होते-होते घर मेहमानों से भर गया। सब लोग निखिल को बधाई दे रहे थे और खाने-पीने की तैयारी देख रहे थे।
इसी बीच निखिल की बड़ी बहन, आरती, भी अपने पति के साथ वहाँ पहुँची।
आरती ने देखा कि पूजा का चेहरा बुझा हुआ है और उसकी आँखें लाल हैं।
उसने धीरे से पूछा,
“क्या हुआ पूजा? तुम इतनी परेशान क्यों लग रही हो?”
पूजा पहले तो चुप रही, लेकिन फिर रोते हुए सारी बात बता दी।
आरती यह सुनकर हैरान रह गई।
वह तुरंत अपनी माँ सावित्री देवी के पास गई और बोली,
“माँ, आपको पता है पूजा के भाई का एक्सीडेंट हुआ है?”
सावित्री देवी ने हल्के से कहा,
“हाँ पता है… लेकिन अभी घर में मेहमान आए हैं, इसलिए मैंने उसे थोड़ी देर रुकने को कहा है।”
आरती की आवाज़ थोड़ी तेज हो गई।
“माँ, अगर मेरी जगह मैं होती और मेरे भाई के साथ ऐसा होता तो क्या आप मुझे भी रोक लेतीं?”
सावित्री देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
आरती ने आगे कहा,
“माँ, पूजा इस घर की बहू जरूर है… लेकिन उससे पहले वह किसी की बेटी और बहन भी है। अगर आज वह अपने भाई के पास नहीं जा पाई, तो शायद वह खुद को जिंदगी भर माफ नहीं कर पाएगी।”
आरती की बातें सुनकर सावित्री देवी का चेहरा गंभीर हो गया।
उन्हें अचानक अपना अतीत याद आ गया।
सालों पहले जब उनके छोटे भाई को बुखार में अस्पताल ले जाया गया था, तब वे भी ससुराल की वजह से समय पर नहीं पहुँच पाई थीं। उस दिन का पछतावा आज भी उनके दिल में कहीं छुपा हुआ था।
सावित्री देवी ने एक गहरी साँस ली।
फिर वे धीरे-धीरे रसोई की तरफ बढ़ीं जहाँ पूजा चुपचाप बर्तन सजा रही थी।
उन्होंने पूजा के कंधे पर हाथ रखा।
पूजा घबराकर बोली,
“माँ जी… मैं काम कर रही हूँ, सब ठीक हो जाएगा।”
सावित्री देवी ने नरम आवाज़ में कहा,
“काम बाद में भी हो जाएगा… लेकिन रिश्तों का समय वापस नहीं आता।”
पूजा ने हैरानी से उनकी तरफ देखा।
सावित्री देवी ने कहा,
“तुम अभी अपने भाई के पास जाओ। निखिल तुम्हारे साथ जाएगा।”
पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।
“लेकिन माँ जी… मेहमान?”
सावित्री देवी मुस्कुरा दीं।
“मेहमान खाना खाने आए हैं, दिल नहीं देखने। खाना हम सब मिलकर संभाल लेंगे… लेकिन तुम्हारा दिल अगर टूट गया तो उसे कोई नहीं संभाल पाएगा।”
पूजा ने झुककर अपने सास के पैर छुए और जल्दी से निखिल के साथ अस्पताल के लिए निकल गई।
घर के मेहमानों ने जब यह सब देखा तो कई लोगों ने सावित्री देवी की तारीफ की।
एक बुजुर्ग महिला ने कहा,
“आज आपने सच में एक माँ होने का फर्ज निभाया है।”
सावित्री देवी ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“बस इतना समझ लिया है कि रिश्तों की कीमत समाज की बातों से कहीं ज्यादा होती है।”
उस रात घर का खाना शायद थोड़ा साधारण रहा, लेकिन घर के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गए।
सीख:
परिवार की असली पहचान बड़े आयोजन या दिखावे से नहीं, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देने से होती है। रिश्तों से बड़ा कोई नियम नहीं होता।

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