अहम का दर्पण

 

Indian family moment where a mother-in-law respectfully welcomes her daughter-in-law’s parents, showing realization and equal respect in a middle class home


सुबह के करीब दस बजे थे।

दिल्ली के रोहिणी इलाके में स्थित “शर्मा निवास” की तीसरी मंज़िल की बालकनी से नीचे सड़क का शोर साफ सुनाई दे रहा था। गाड़ियाँ लगातार आ-जा रही थीं और आसमान में बादल धीरे-धीरे घिरते जा रहे थे।


घर की मालकिन कमला देवी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह गंभीरता और थोड़ा सा घमंड झलक रहा था। सामने उनकी बहू पूजा रसोई में खड़ी नाश्ता बना रही थी।


कमला देवी ने ऊँची आवाज़ में कहा—


“बहू, ज़रा जल्दी हाथ चला। तेरे ससुर जी को ऑफिस जाना है।”


पूजा ने मुस्कुराकर कहा—

“जी माँ जी, बस दो मिनट में पराठे तैयार हो जाएंगे।”


पूजा स्वभाव से बहुत शांत और समझदार लड़की थी। शादी को तीन साल हो चुके थे। उसने हमेशा कोशिश की कि घर में किसी को शिकायत का मौका न मिले।


लेकिन एक बात उसे हमेशा चुभती थी।


जब भी उसके मायके से कोई आता, कमला देवी का व्यवहार अचानक बदल जाता।



एक दिन दोपहर में पूजा की माँ और छोटा भाई मिलने आए।


पूजा बहुत खुश हो गई। उसने जल्दी-जल्दी चाय बनाई और सोचा कुछ अच्छा नाश्ता भी बना दे।


तभी कमला देवी रसोई में आ गईं।


“क्या कर रही है बहू?” उन्होंने पूछा।


“माँ जी, मम्मी आई हैं ना… तो सोचा थोड़ा पकौड़े बना दूँ।”


कमला देवी ने तुरंत कहा—


“पकौड़े? किस खुशी में? चाय बना और दो बिस्कुट रख दे प्लेट में। रोज-रोज दावत थोड़ी करनी है।”


पूजा चुप हो गई।


उसने वही किया जो सास ने कहा।


ड्राइंग रूम में उसकी माँ चाय-बिस्कुट लेकर बैठी थीं, लेकिन उनके चेहरे पर हल्की झिझक थी।


कमला देवी ने बस औपचारिक मुस्कान दी और अपने कमरे में चली गईं।


पूजा का दिल अंदर ही अंदर टूट गया।



लेकिन बेटी के ससुराल वालों के लिए…


कुछ दिनों बाद कमला देवी की बेटी रीना अपने ससुराल वालों के साथ आने वाली थी।


उस दिन घर का माहौल बिल्कुल अलग था।


कमला देवी सुबह से ही रसोई में लगी हुई थीं।


“बहू! जल्दी आटा गूंध। आज कचौड़ी भी बनानी है, दही बड़े भी, और मिठाई भी।”


पूजा ने आश्चर्य से पूछा—

“माँ जी, इतने सारे पकवान?”


कमला देवी ने गर्व से कहा—


“अरे, मेरी बेटी के ससुराल वाले आ रहे हैं। इज्जत का सवाल है।”


पूजा ने चुपचाप काम शुरू कर दिया।


लेकिन उसके दिल में एक सवाल बार-बार उठ रहा था—


“क्या मेरी माँ इज्जत के लायक नहीं?”



करीब एक महीने बाद एक दिन फोन आया।


रीना रो रही थी।


“माँ… मुझे बहुत बुरा लग रहा है।”


कमला देवी घबरा गईं।


“क्या हुआ?”


रीना बोली—


“कल मेरे ससुराल में मेरे मामा-मामी आए थे। लेकिन सासू माँ ने उन्हें ठीक से बैठाया भी नहीं। बस चाय-बिस्कुट देकर भेज दिया। सबके सामने मेरी बहुत बेइज्जती हो गई।”


कमला देवी गुस्से से भर गईं।


“ये कैसी बदतमीज़ी है! मेहमानों की इज्जत करना नहीं आता क्या?”


रीना ने धीमे से कहा—


“माँ… सासू माँ ने कहा कि ‘रिश्तेदार रोज आते हैं, दावत थोड़ी करेंगे।’”


कमला देवी अचानक चुप हो गईं।


यह वही शब्द थे जो वह खुद अक्सर कहती थीं।


फोन कटने के बाद वह कुछ देर तक सोचती रहीं।



एक अनजाना आईना...


उसी शाम अचानक पूजा के मोबाइल की घंटी बजी।

स्क्रीन पर उसके पिताजी का नाम चमक रहा था।


पूजा ने तुरंत फोन उठाया।


“हाँ पापा, नमस्ते।”


उधर से पिता की स्नेह भरी आवाज़ आई—


“बेटी, हम कल दिल्ली आ रहे हैं। सोचा तुमसे भी मिलते चलें। अगर तुम्हें कोई परेशानी न हो तो।”


यह सुनकर पूजा का चेहरा खुशी से खिल उठा, लेकिन उसी पल उसके मन में हल्की चिंता भी घर कर गई।


उसे अच्छी तरह पता था कि जब भी उसके मायके से कोई आता है, घर का माहौल बदल जाता है।


उसने धीमे से कहा—

“पापा, आप जरूर आइए। मुझे बहुत अच्छा लगेगा।”


फोन रखने के बाद वह कुछ देर चुप खड़ी रही।


तभी रसोई से कमला देवी की आवाज़ आई—


“बहू, ज़रा इधर आना।”


पूजा धीरे-धीरे रसोई की ओर बढ़ी।


“जी माँ जी?”


कमला देवी सब्ज़ी काटते-काटते रुक गईं और उसकी ओर देखने लगीं।


“अभी फोन किसका था?”


पूजा ने हल्की झिझक के साथ जवाब दिया—

“माँ जी… पिताजी का फोन था। वो कल यहाँ आने वाले हैं।”


कुछ पल के लिए रसोई में गहरी खामोशी छा गई।


पूजा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसे लगा शायद अब वही पुरानी बातें सुनने को मिलेंगी।


लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ।


कमला देवी ने धीरे से चाकू नीचे रखा और बोलीं—


“अच्छा… तो तेरे पिताजी आ रहे हैं।”


फिर उन्होंने थोड़ा रुककर कहा—


“सुन, सुबह बाजार से ताज़े समोसे और अच्छी मिठाई ले आना। और हाँ, खीर मैं खुद बनाऊँगी।”


पूजा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।


“माँ जी… सच?”


कमला देवी की आँखों में हल्की नमी तैर आई।


उन्होंने धीमे स्वर में कहा—


“बहू, आज मुझे एक बात समझ आई है। जब किसी के अपने लोग घर आएं और उन्हें सम्मान न मिले, तो दिल कितना दुखता होगा… यह बात आज महसूस हुई है।”


उन्होंने गहरी साँस ली और आगे बोलीं—


“जो दर्द मेरी बेटी ने अपने ससुराल में महसूस किया… शायद वही दर्द तू भी हर बार सहती रही होगी।”


पूजा की आँखें भर आईं।


उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप सिर झुका लिया।


उस पल पहली बार कमला देवी को महसूस हुआ कि बहू का दिल भी उतना ही कोमल होता है जितना अपनी बेटी का।


और शायद पहली बार इस घर में सिर्फ रिश्ते नहीं, बल्कि भावनाएँ भी समझी जा रही थीं।



अगले दिन जब पूजा के माता-पिता घर पहुँचे, तो एक ऐसा दृश्य सामने था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।


कमला देवी खुद दरवाज़े पर खड़ी थीं। जैसे ही उन्होंने पूजा के माता-पिता को आते देखा, उनके चेहरे पर अपनापन भरी मुस्कान आ गई।


“आइए समधी जी,” उन्होंने आदर से कहा,

“बहुत दिनों बाद आप लोग आए हैं। अंदर आइए।”


ड्राइंग रूम में मेज़ पहले से सजी हुई थी। प्लेटों में ताज़े समोसे, गरम-गरम खीर और मिठाई रखी थी। घर का माहौल आज अलग ही लग रहा था।


पूजा की माँ थोड़ी हैरान थीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक यह बदलाव कैसे आ गया। लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और खुशी साफ दिखाई दे रही थी।


कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा—


“समधी जी, आज मुझे एक बात समझ आ गई है। रिश्तों में ‘तेरा’ और ‘मेरा’ का फर्क नहीं होना चाहिए। बहू के मायके वाले भी उतने ही अपने होते हैं, जितने बेटी के ससुराल वाले।”


यह सुनकर पूजा की आँखें भर आईं।


उसने अपनी सास की तरफ देखा। आज पहली बार उनके चेहरे पर सख्ती नहीं, बल्कि सच्चा अपनापन दिखाई दे रहा था।


उसी पल पूजा के दिल में एक मीठा सा एहसास जागा।


उसे लगा जैसे आज इस घर में उसकी पहचान बदल गई है।


आज वह सिर्फ इस घर की बहू नहीं थी—


वह सच में इस घर की बेटी बन चुकी थी।



सीख:


कभी-कभी इंसान अपनी गलती तब समझता है जब ज़िंदगी उसे आईना दिखाती है।

रिश्तों में भेदभाव करने से घर का माहौल छोटा और कड़वा हो जाता है, लेकिन जब हम सबको बराबर सम्मान देते हैं तो वही घर प्यार और अपनापन से भर जाता है।


हमेशा याद रखिए —

सम्मान और व्यवहार वही लौटकर आता है जो हम दूसरों को देते हैं।





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