भरोसे की विरासत

 

Emotional illustration of an Indian daughter-in-law sitting on the floor in a traditional home, holding a handwritten letter with tears in her eyes while remembering her late mother-in-law.


शाम का समय था।

आँगन में नीम के पेड़ की छाया लंबी होती जा रही थी और हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी।


घर के बरामदे में लकड़ी की कुर्सी पर बैठे श्यामलाल जी खामोशी से सामने देख रहे थे। उनके चेहरे पर थकान भी थी और चिंता भी।


उनकी पत्नी सावित्री देवी रसोई में चुपचाप खाना बना रही थीं।


घर में उनका बेटा राजेश, बहू प्रिया और सात साल का पोता नील भी रहता था।


राजेश की शादी को आठ साल हो चुके थे।


शादी के बाद से ही सावित्री देवी पूरे घर की जिम्मेदारी संभालती थीं। घर का हर फैसला वही करती थीं—कब क्या बनेगा, कितना खर्च होगा, किस चीज़ की जरूरत है, सब कुछ वही तय करती थीं।


राजेश की सैलरी भी हर महीने सीधे उनकी ही हाथों में जाती थी।


प्रिया शुरू-शुरू में यह देखकर थोड़ा असहज हो जाती थी।


उसे लगता था कि वह इस घर की बहू है लेकिन फिर भी घर के फैसलों में उसकी कोई जगह नहीं है।


एक दिन उसने अपने पति राजेश से कहा—


“तुम्हें नहीं लगता कि मांजी हर बात में बहुत ज्यादा दखल देती हैं?”


राजेश मुस्कुराया और बोला—


“प्रिया, मां ने सारी उम्र इस घर को संभाला है। पिताजी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए मां ने ही सब कुछ देखा। उन्हें आदत पड़ गई है। तुम बुरा मत मानो।”


प्रिया ने धीरे-धीरे यह बात समझ ली।


वह सोचने लगी कि अगर मांजी को इससे खुशी मिलती है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


अब प्रिया घर के काम करती, लेकिन हर बात मांजी से पूछकर करती।


समय धीरे-धीरे बीतता गया।


घर में सब कुछ ठीक चल रहा था।


लेकिन एक दिन अचानक सावित्री देवी की तबीयत बिगड़ गई।


डॉक्टर ने बताया कि उन्हें घुटनों की गंभीर समस्या है और अब उन्हें ज्यादा चलना-फिरना नहीं चाहिए।


कुछ ही दिनों में उनकी हालत ऐसी हो गई कि उन्हें ज्यादा समय बिस्तर पर ही रहना पड़ता था।


अब घर के कामों की जिम्मेदारी प्रिया पर आ गई।


एक दिन महीने की पहली तारीख को राजेश अपनी सैलरी लेकर मां के कमरे में आया।


“मां, ये लो इस महीने की सैलरी।”


सावित्री देवी ने पैसे लेकर कुछ देर देखा, फिर प्रिया को बुलाया।


“बहू, ये पैसे अब तुम रखो। अब घर तुम्हें संभालना है।”


प्रिया तुरंत बोली—


“नहीं मांजी, आप ही रखिए। मैं तो बस आपके कहे अनुसार काम कर लूंगी।”


सावित्री देवी ने मुस्कुराकर कहा—


“नहीं बहू, अब समय बदल गया है। अब यह जिम्मेदारी तुम्हें ही उठानी होगी।”


प्रिया ने झिझकते हुए पैसे ले लिये।


लेकिन उसने घर चलाने का तरीका वही रखा जो मांजी सिखाती थीं।


जब भी बाजार जाती, लौटकर हर खर्च का हिसाब सावित्री देवी को बताती।


सावित्री देवी को यह देखकर बहुत सुकून मिलता।


धीरे-धीरे उनके मन का डर भी खत्म होने लगा।


असल में उन्हें हमेशा एक डर सताता था।


आजकल वह अक्सर सुनती थीं कि कई जगहों पर बेटे-बहू अपने बूढ़े मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते।


उन्हें डर था कि कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो जाए।


इसी डर की वजह से उन्होंने हमेशा घर की बागडोर अपने हाथ में रखी थी।


लेकिन अब उन्हें लगने लगा था कि उनकी बहू अलग है।


एक दिन उन्होंने राजेश और प्रिया को अपने कमरे में बुलाया।


“बेटा, मैंने आज एक जरूरी काम किया है।”


राजेश ने पूछा—


“क्या काम मां?”


सावित्री देवी ने कहा—


“मैंने अपनी वसीयत बनवा दी है। यह घर राजेश के नाम कर दिया है और जो भी गहने और पैसे हैं, वो मैं बहू को देना चाहती हूं।”


प्रिया घबरा गई।


“मांजी, इसकी क्या जरूरत है? आप ही सब संभालिए।”


सावित्री देवी बोलीं—


“बहू, यह सब मैं तुम्हें भरोसे के साथ दे रही हूं।”


उस दिन के बाद प्रिया ने पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली।


लेकिन उसने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि अब घर की मालकिन वही है।


वह आज भी हर छोटी-बड़ी बात मांजी से पूछती।


अगर बाजार जाती तो पहले साड़ी अपनी सास के लिये खरीदती।


खाना भी हमेशा उनकी पसंद का बनाती।


यह देखकर सावित्री देवी के दिल में अपनी बहू के लिये और भी प्यार बढ़ गया।


कुछ महीने बाद सावित्री देवी की तबीयत और बिगड़ गई।


और एक दिन उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


घर में शोक का माहौल छा गया।


तेरह दिन तक रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहा।


सब धीरे-धीरे वापस चले गए।


अब घर में केवल राजेश, प्रिया और नील रह गए।


राजेश ऑफिस चला जाता और प्रिया घर में अकेली रह जाती।


लेकिन अब उसे हर काम करते समय मांजी की याद आती।


वह अक्सर उनके कमरे में चली जाती।


खाली बिस्तर देखकर उसकी आंखों में आंसू आ जाते।


एक दिन वह कमरे की सफाई कर रही थी।


तभी उसे तकिये के नीचे एक पुराना लिफाफा मिला।


लिफाफे पर उसका नाम लिखा था।


प्रिया ने कांपते हाथों से उसे खोला।


उसमें सावित्री देवी का लिखा एक पत्र था।


पत्र में लिखा था—


“बहू,


मुझे पता है कि मेरे जाने के बाद तुम्हें हर काम में मेरी याद आएगी।


तुम शायद हर काम करने से पहले मेरे कमरे में आओगी।


लेकिन अब तुम्हें अपने तरीके से घर चलाना सीखना होगा।


समय बदल गया है।


अब तुम्हें ही इस घर की छत बनना है।


जिसके नीचे तुम्हारा परिवार सुरक्षित रहेगा।


मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।


अगर कभी मेरी बातों से तुम्हें दुख हुआ हो तो मुझे माफ कर देना।


तुम सिर्फ मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी हो।


तुम्हारी

मां — सावित्री”


पत्र पढ़ते ही प्रिया की आंखों से आंसू बहने लगे।


उसने पत्र को सीने से लगा लिया।


कुछ दिन बाद उसने धीरे-धीरे खुद को संभाल लिया।


अब वह पूरे घर को उसी प्यार और समझदारी से चलाने लगी जैसे सावित्री देवी चलाती थीं।


जब भी उसे कोई परेशानी होती, वह वह पत्र निकालकर पढ़ती।


और हर बार उसे ऐसा महसूस होता जैसे मांजी अभी भी उसके साथ खड़ी हैं।


समय बीतता गया।


लेकिन उस घर में आज भी एक चीज़ हमेशा बनी रही—


भरोसा और प्यार की विरासत।





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