रिश्तों की असली कीमत

 

Elderly Indian parents discussing family responsibilities at home while facing financial concerns for their daughter's needs


रामप्रसाद जी बरामदे में कुर्सी पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे और उनकी पत्नी सरोजिनी देवी रसोई में चाय बना रही थीं।


तभी सरोजिनी देवी ने आवाज़ लगाई—


“सुनिए जी…! ज़रा यहां आइए।”


रामप्रसाद जी अख़बार मोड़कर रसोई के दरवाज़े तक आए और बोले—


“क्या हुआ भाग्यवान…?”


सरोजिनी देवी ने धीरे से कहा—


“अभी-अभी सीमा का फोन आया था। कह रही थी कि अगले महीने उसकी ससुराल में बहुत बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम है… उसे कुछ पैसों की जरूरत है।”


रामप्रसाद जी कुछ पल चुप रहे, फिर बोले—


“कितने पैसे मांगे हैं…?”


“पचास हजार…”


रामप्रसाद जी ने गहरी सांस ली।


“भाग्यवान…! हमारी पेंशन से घर का खर्च जैसे-तैसे चलता है… ऊपर से तुम्हारी दवाइयों का खर्च भी है… इतना पैसा कहां से लाएंगे…?”


सरोजिनी देवी ने धीरे से कहा—


“वह हमारी बेटी है… अगर हम नहीं देंगे तो कौन देगा…?”


रामप्रसाद जी ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप अंदर चले गए।



रामप्रसाद जी के दो बच्चे थे—

बेटा रोहित और बेटी सीमा।


रोहित की शादी हो चुकी थी और वह अपनी पत्नी पूजा के साथ मुंबई में रहता था।

सीमा की शादी इंदौर में हुई थी।


दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त थे।


रामप्रसाद जी ने सोचा कि क्यों ना रोहित से थोड़ी मदद मांगी जाए।


उन्होंने रोहित को फोन लगाया।


रोहित ने फोन उठाया—


“हाँ पापा… नमस्ते… कैसे हैं आप…?”


रामप्रसाद जी बोले—


“मैं ठीक हूं बेटा… तुम कैसे हो…?”


“हम भी ठीक हैं पापा… बताइए फोन कैसे किया…?”


रामप्रसाद जी थोड़ी देर चुप रहे, फिर बोले—


“बेटा… सीमा को कुछ पैसों की जरूरत है… अगर तुम थोड़ा हाथ बटा दो तो…”


रोहित ने तुरंत जवाब दिया—


“पापा… यहां पहले ही बहुत खर्च है… घर का लोन, गाड़ी की EMI… ऊपर से महंगाई इतनी बढ़ गई है… अभी तो बिल्कुल मुश्किल है…”


रामप्रसाद जी ने मुस्कुराकर कहा—


“ठीक है बेटा… कोई बात नहीं… बस ऐसे ही पूछ लिया था…”


और उन्होंने फोन रख दिया।


सरोजिनी देवी सब सुन रही थीं।


उनकी आंखों में हल्की नमी आ गई।


“क्या रोहित मदद नहीं करेगा…?”


रामप्रसाद जी हल्की मुस्कान के साथ बोले—

“नहीं भाग्यवान… रोहित कह रहा था कि उसके ऊपर पहले ही बहुत खर्च है। घर का लोन, गाड़ी की किस्त… इसलिए अभी मदद करना उसके लिए मुश्किल है।”



अगले दिन रामप्रसाद जी चुपचाप अपने पुराने दोस्त शंकरलाल जी के पास गए।


उन्होंने सारी बात बताई।


शंकरलाल जी बोले—


“अरे रामप्रसाद… इसमें चिंता की क्या बात है…?

तू पच्चीस हजार मुझसे ले जा… और बाकी किसी से ले लेना।”


रामप्रसाद जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा—


“तुमने बहुत बड़ा उपकार किया है दोस्त…”



कुछ दिनों बाद सीमा का वह पारिवारिक कार्यक्रम बहुत अच्छे तरीके से संपन्न हो गया।


घर में खुशी का माहौल था और सीमा के चेहरे पर संतोष और मुस्कान साफ दिखाई दे रही थी। उसे लग रहा था कि सब कुछ बहुत आसानी से हो गया।


लेकिन उसे इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि उसके माता-पिता ने उसकी खुशी के लिए कितनी चिंता और मेहनत की थी।


रामप्रसाद जी ने अपनी इज़्ज़त और बेटी की खुशी बनाए रखने के लिए अपने दोस्त से पैसे उधार लिए थे, और सरोजिनी देवी ने भी बिना किसी को बताए अपने कुछ गहने गिरवी रख दिए थे।


दोनों ने यह बात सीमा से इसलिए छुपा ली, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी अपनी खुशी के दिन किसी बोझ या अपराधबोध में रहे।


उनके लिए सबसे बड़ी खुशी यही थी कि उनकी बेटी मुस्कुरा रही थी और उसका सम्मान बना हुआ था।



लगभग तीन महीने बाद एक दिन रोहित का फोन आया।


“पापा… नमस्ते…!”


रामप्रसाद जी बोले—


“हाँ बेटा… कैसे हो…?”


रोहित थोड़ा हिचकते हुए बोला—


“पापा… दरअसल पूजा की तबीयत ठीक नहीं रहती… डॉक्टर ने कहा है कि उसे कुछ महीनों तक आराम चाहिए… अगर मां कुछ दिन के लिए यहां आ जाए तो…”


रामप्रसाद जी समझ गए कि अब बेटे को जरूरत पड़ गई है।


उन्होंने शांत आवाज़ में कहा—


“बेटा… तुम्हारी मां की तबीयत भी अब पहले जैसी नहीं रही… और मैं भी अकेला पड़ जाऊंगा… इसलिए शायद वह अभी नहीं आ पाएगी…”


रोहित चुप हो गया।


उसे पहली बार एहसास हुआ कि जब जरूरत थी तब उसने अपने माता-पिता की मदद नहीं की थी।


फोन रखने के बाद सरोजिनी देवी ने थोड़ा चिंतित होकर पूछा—


“आपने उसे मना क्यों कर दिया…? आखिर वह हमारा बेटा ही तो है…”


रामप्रसाद जी ने शांत स्वर में कहा—


“मैंने उसे ठुकराया नहीं है, बस थोड़ा सोचने का मौका दिया है। कभी-कभी इंसान को रिश्तों की असली कीमत समझने के लिए समय और अनुभव दोनों की जरूरत होती है।”


फिर हल्की मुस्कान के साथ बोले—


“अगर उसे सच में अपनी गलती का एहसास हो गया और वह दिल से हमें याद करेगा, तो देखना… हम खुद ही उसके पास चले जाएंगे। आखिर माता-पिता का दिल इतना कठोर नहीं होता कि हमेशा के लिए नाराज़ रह सके।”



दोस्तों…


रिश्ते पैसों से नहीं चलते,

पर जब अपनों को जरूरत हो और हम मुंह मोड़ लें…


तो रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे ठंडी पड़ जाती है।


इसलिए हमेशा याद रखिए—


परिवार वही होता है जो मुश्किल समय में साथ खड़ा रहे। 




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