माँ की आख़िरी सीख
दीवार पर टंगी माँ की तस्वीर के सामने रखा दिया धीमी रोशनी में जल रहा था।
घर के अंदर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी, जैसे हर कोना किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
राहुल कुर्सी पर चुपचाप बैठा था।
हाथों में माँ की पुरानी चश्मे की डिब्बी थी, जिसे वह बार-बार खोलकर बंद कर रहा था।
माँ को गए अभी सिर्फ पंद्रह दिन हुए थे, लेकिन राहुल को लग रहा था जैसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सहारा अचानक छिन गया हो।
घर में अब बस दो ही लोग रह गए थे—
राहुल और उसकी छोटी बहन मीरा।
मीरा उम्र में बीस साल की थी, मगर उसकी समझ एक छोटे बच्चे जैसी थी।
वह ज़्यादातर चुप रहती थी, कभी-कभी खुद से बातें करती और कभी बस खिड़की से बाहर देखते रहती।
माँ के रहते सब संभल जाता था।
माँ ही मीरा को नहलाती, खाना खिलाती, दवा देती और उसे प्यार से समझाती रहती।
राहुल बस नौकरी करता और बाकी जिम्मेदारियाँ माँ पर छोड़ देता।
लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था।
राहुल के मन में बार-बार एक ही सवाल आता—
"मैं अकेला मीरा को कैसे संभाल पाऊँगा?"
उसकी नौकरी भी नई थी।
घर का खर्च, बहन की देखभाल, और माँ की याद—सब मिलकर उसके मन को भारी कर देते थे।
एक दिन राहुल जल्दी-जल्दी ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था।
मीरा कमरे के कोने में बैठी अपनी गुड़िया से खेल रही थी।
राहुल ने घड़ी देखी और जल्दी से बैग उठाया।
दरवाज़े तक पहुँचा ही था कि अचानक नज़र रसोई की तरफ चली गई।
रसोई देखकर उसकी आँखें नम हो गईं।
यहीं तो माँ खड़ी होती थी हर दिन।
राहुल जैसे ही घर से निकलने लगता, माँ आवाज़ लगाती—
"राहुल... ज़रा रुक तो!"
और फिर कटोरे में थोड़ा दही और गुड़ लेकर आ जाती।
राहुल अक्सर जल्दी में होता और कह देता—
"माँ रहने दो, देर हो रही है।"
लेकिन माँ हँसकर कहती—
"दो मिनट लगते हैं बस।
दही-गुड़ खाकर जाओगे तो दिन अच्छा जाएगा।"
और फिर जबरदस्ती उसे खिलाकर ही भेजती।
राहुल कभी-कभी झुंझला भी जाता था।
"माँ ये सब ज़रूरी है क्या रोज-रोज?"
माँ मुस्कुराकर कहती—
"मुझे अच्छा लगता है बेटा।
तुझे ऐसे भेजती हूँ तो लगता है भगवान को सौंप कर भेज रही हूँ।"
आज वही दरवाज़ा था, वही घर था…
बस माँ नहीं थी।
राहुल ने गहरी साँस ली और दरवाज़ा खोलने लगा।
तभी पीछे से हल्की-सी आवाज आई—
"भैया…"
राहुल ने मुड़कर देखा।
मीरा खड़ी थी।
उसके हाथ में वही पुराना कटोरा था।
कटोरे में थोड़ा दही और गुड़ रखा हुआ था।
राहुल कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप रह गया।
मीरा धीरे-धीरे उसके पास आई।
और बिल्कुल माँ की तरह बोली—
"पहले ये खा लो… फिर जाना।"
राहुल की आँखें भर आईं।
उसने हैरानी से पूछा—
"मीरा… तुम्हें ये सब किसने सिखाया?"
मीरा ने सीधे उसकी तरफ देखा।
उसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था,
लेकिन आँखों के किनारों पर हल्की नमी थी।
वह बोली—
"माँ रोज करती थी ना…
मैं देखती थी।"
राहुल के हाथ काँपने लगे।
मीरा ने अपनी उँगलियों से थोड़ा दही-गुड़ उठाया और राहुल को खिलाया।
फिर बिल्कुल माँ की तरह बोली—
"ध्यान से जाना भैया…
और जल्दी घर आ जाना।"
राहुल अब खुद को रोक नहीं पाया।
वह झुककर मीरा को कसकर गले लगा लिया और फूट-फूट कर रो पड़ा।
मीरा चुपचाप खड़ी रही।
उसने धीरे से राहुल की पीठ थपथपाई।
जैसे माँ थपथपाया करती थी।
उस दिन राहुल को पहली बार महसूस हुआ—
माँ सिर्फ शरीर से जाती है,
लेकिन उसकी सीख, आदतें और प्यार घर के लोगों में कहीं न कहीं ज़िंदा रह जाते हैं।
राहुल ने मीरा का हाथ पकड़ा और मन ही मन कहा—
"माँ…
अब समझ गया हूँ।
तुम कहीं गई नहीं हो…
बस हमारे अंदर बस गई हो।"
दीवार पर लगी माँ की तस्वीर जैसे मुस्कुरा रही थी।
और उस घर की खामोशी में
पहली बार थोड़ी-सी ममता फिर से लौट आई थी।

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