सास की अग्नि परीक्षा
शाम का समय था।
शहर के पॉश इलाके में बने रूपकिशोर जी के बड़े से बंगले में आज माहौल थोड़ा तनाव भरा था।
ड्रॉइंग रूम में रूपकिशोर जी सोफे पर बैठे अख़बार पढ़ रहे थे, लेकिन उनका ध्यान बार-बार सामने खड़े अपने बेटे संदीप पर जा रहा था।
संदीप के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उसी समय रसोई से तेज़ कदमों से रोशनी जी बाहर आईं।
“क्या है संदीप? तुम्हें समझ में नहीं आता कि हम तुम्हारे लिए कितने अच्छे रिश्ते देख रहे हैं?”
संदीप ने धीरे से कहा—
“माँ… मैं किसी और से शादी नहीं कर सकता।”
“तो किससे करेगा?” रोशनी जी ने गुस्से में पूछा।
संदीप ने हिम्मत जुटाकर कहा—
“मैं शिप्रा से शादी करना चाहता हूँ।”
“कौन शिप्रा?”
“वही… जो कॉलेज के पास चाय की छोटी सी दुकान चलाती है।”
इतना सुनते ही रोशनी जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“क्या कहा तुमने? एक चाय बेचने वाली लड़की हमारे घर की बहू बनेगी?”
संदीप चुप खड़ा रहा।
पिता का साथ...
रूपकिशोर जी ने अख़बार नीचे रख दिया।
“रोशनी, पहले बेटे की बात तो सुन लो।”
रोशनी जी बोलीं—
“सुनने के लिए बचा ही क्या है? इतनी बड़ी बिज़नेस फैमिली का लड़का और शादी करेगा एक चाय बेचने वाली लड़की से!”
रूपकिशोर जी मुस्कुराकर बोले—
“तुम्हें याद है हमारी शादी?”
रोशनी जी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
रूपकिशोर जी ने कहा—
“तुम्हारी और मेरी जात अलग थी। मेरी माँ इस शादी के खिलाफ थीं… लेकिन फिर भी हमने शादी की थी।”
रोशनी जी बोलीं—
“लेकिन मेरी औकात तुम्हारी बराबर थी। मेरे पिता शहर के बड़े बिज़नेसमैन थे। यहाँ तो जात ही नहीं, औकात भी अलग है।”
रूपकिशोर जी शांत स्वर में बोले—
“अगर हम आज भी अमीर-गरीब का फर्क देखेंगे तो अपने बेटे को खो देंगे।”
फिर उन्होंने धीरे से कहा—
“तुम्हें पता है, संदीप ने दो दिन से कुछ नहीं खाया।”
रोशनी जी चौंक गईं।
“क्या?”
“हाँ… वो ऑफिस में भी बेहोश हो गया था।”
यह सुनकर रोशनी जी का दिल पिघल गया।
कुछ देर चुप रहने के बाद रोशनी जी बोलीं—
“ठीक है… अगर तुम्हें उस लड़की से शादी करनी है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं।”
संदीप का चेहरा खुशी से चमक उठा।
लेकिन रोशनी जी ने आगे कहा—
“लेकिन मेरी एक शर्त है।”
“क्या माँ?”
“जिस तरह मुझे अपनी सास की अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी… उसी तरह उस लड़की को भी मेरी अग्नि परीक्षा देनी होगी।”
उसी समय पीछे से एक आवाज आई—
“मैं तैयार हूँ।”
सबने मुड़कर देखा।
दरवाज़े पर शिप्रा खड़ी थी।
वह धीरे से बोली—
“अगर आपकी परीक्षा पास करने से मुझे संदीप जी का साथ मिल सकता है… तो मैं हर परीक्षा देने के लिए तैयार हूँ।”
शिप्रा का घर...
अगले दिन रोशनी जी, रूपकिशोर जी और संदीप शिप्रा के घर गए।
वह शहर की एक छोटी सी बस्ती थी।
तंग गलियाँ, छोटे-छोटे घर और चारों तरफ हलचल।
रोशनी जी ने चारों तरफ देखा और मन ही मन बोलीं—
“हे भगवान… मेरे बेटे का ससुराल यहाँ होगा?”
शिप्रा के घर पहुँचते ही उसकी माँ ने नमस्ते की।
“आइए… बैठिए।”
शिप्रा के पिता बोले—
“भाई साहब, आपका बेटा और हमारी बेटी… इनका तो कोई मुकाबला ही नहीं है।”
संदीप तुरंत बोला—
“अंकल, मैं शिप्रा से बहुत प्यार करता हूँ।”
रूपकिशोर जी हँसकर बोले—
“जब लड़का-लड़की दोनों राज़ी हैं तो हमें भी राज़ी होना चाहिए।”
इस तरह दोनों परिवारों ने शादी की बात पक्की कर दी।
शादी...
कुछ ही दिनों बाद संदीप और शिप्रा की शादी हो गई।
शादी बहुत सादगी से हुई, लेकिन खुशी बहुत थी।
शिप्रा जब दुल्हन बनकर पहली बार अपने ससुराल पहुँची तो उसके दिल में थोड़ा डर भी था।
गृहप्रवेश के समय रोशनी जी ने धीरे से उसके कान में कहा—
“तुम इस घर की बहू तो बन गई हो… लेकिन अभी मेरी बहू नहीं बनी हो।”
शिप्रा घबरा गई।
रोशनी जी बोलीं—
“अब शुरू होंगी तुम्हारी अग्नि परीक्षाएँ।”
शिप्रा ने सिर झुका लिया।
अगली सुबह सूरज की हल्की रोशनी खिड़कियों से घर के अंदर आ रही थी।
शिप्रा की शादी को अभी एक ही दिन हुआ था और आज उसकी पहली रसोई थी।
शिप्रा जल्दी उठकर नहा-धोकर तैयार हुई और सिर पर पल्लू रखकर रसोई में जाने ही वाली थी कि तभी रोशनी जी की आवाज आई—
“सुनो शिप्रा।”
“जी मम्मी जी,” शिप्रा तुरंत उनके सामने आकर खड़ी हो गई।
रोशनी जी ने गंभीर आवाज में कहा—
“आज तुम्हारी पहली रसोई है और हमारे घर की परंपरा है कि बहू पहली रसोई में भगवान के लिए छप्पन भोग बनाती है।”
शिप्रा थोड़ा चौंक गई।
रोशनी जी ने आगे कहा—
“और ये सब तुम्हें सिर्फ दो घंटे में बनाना होगा। मैंने आज सारे नौकरों की छुट्टी कर दी है।”
इतना कहकर वह चली गईं।
शिप्रा कुछ पल के लिए वहीं खड़ी रह गई।
“हे भगवान… दो घंटे में छप्पन भोग?”
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाला।
“अगर मुझे इस घर में अपनी जगह बनानी है तो मुझे ये परीक्षा पास करनी ही होगी।”
पहली परीक्षा...
शिप्रा तेजी से काम में जुट गई।
उसने सबसे पहले मिठाइयाँ बनानी शुरू कीं—हलवा, खीर, लड्डू।
फिर जल्दी-जल्दी सब्ज़ियाँ, पूड़ी, कचौड़ी, रायता, चटनी और कई तरह के पकवान बनाने लगी।
रसोई में बर्तनों की आवाज गूंज रही थी।
उधर रोशनी जी मंदिर चली गईं और रास्ते में सोच रही थीं—
“दो घंटे में छप्पन भोग बनाना नामुमकिन है। आज यह लड़की पहली ही परीक्षा में हार जाएगी।”
करीब दो घंटे बाद जब रोशनी जी घर लौटीं तो उन्होंने पहले आंगन में रूपकिशोर जी को देखा।
वह थोड़ा नाराज़ लग रहे थे।
“रोशनी, तुम्हें शर्म आनी चाहिए,” उन्होंने कहा।
“तुमने नई बहू को इतना मुश्किल काम दे दिया।”
रोशनी जी बोलीं—
“मैंने पहले ही कहा था कि उसे मेरी अग्नि परीक्षा देनी होगी।”
तभी पीछे से संदीप की आवाज आई—
“मम्मी… शिप्रा आपकी पहली परीक्षा में पास हो गई है।”
“क्या?”
“हाँ… आप खुद जाकर रसोई में देख लीजिए।”
रोशनी जी तेजी से रसोई में गईं।
और वहाँ जो उन्होंने देखा, उसे देखकर वह हैरान रह गईं।
रसोई में सचमुच छप्पन भोग तैयार रखे थे।
शिप्रा मंदिर में पूजा कर रही थी।
उस दिन घर में सभी ने शिप्रा के हाथ का खाना खाया और उसकी बहुत तारीफ की।
लेकिन रोशनी जी का दिल अभी भी पूरी तरह नहीं पिघला था।
दूसरी परीक्षा...
शाम को रोशनी जी ने कहा—
“सुनो शिप्रा, हमारे घर में शादी के बाद सत्यनारायण भगवान की कथा होती है।”
“परसों पूर्णिमा है और मैंने करीब 100 मेहमानों को बुलाया है।”
शिप्रा ध्यान से सुन रही थी।
“उन सभी के खाने का इंतज़ाम तुम्हें अकेले करना होगा। राशन लाने से लेकर मसाले पीसने तक… सब काम अपने हाथों से।”
शिप्रा थोड़ी घबराई, लेकिन बोली—
“ठीक है मम्मी जी, मैं पूरी कोशिश करूँगी।”
अगले दिन से ही उसने तैयारी शुरू कर दी।
वह खुद पैदल बाजार गई और राशन लेकर आई।
आंगन में मिट्टी से चार चूल्हे बनाए।
छत पर गेहूं सुखाए।
दाल और मसाले ओखली में पीसे।
पड़ोस की औरतें यह सब देखकर बातें करने लगीं।
“अरे… यह कैसी सास है?”
“नई बहू से इतना काम करवाती है!”
लेकिन शिप्रा किसी की बातों पर ध्यान नहीं दे रही थी।
कथा का दिन...
कथा वाले दिन सुबह से ही शिप्रा काम में लगी रही।
उसने चूल्हों पर बड़े-बड़े बर्तनों में खाना बनाना शुरू किया।
दोपहर तक घर मेहमानों से भर गया।
कथा खत्म हुई और खाने का समय आया।
सभी लोगों ने खाना खाया और हर कोई एक ही बात कह रहा था—
“बहू ने तो कमाल कर दिया!”
“इतना स्वादिष्ट खाना हमने बहुत दिनों बाद खाया है।”
रोशनी जी चुपचाप सब सुन रही थीं।
तीसरी परीक्षा...
कुछ दिन बाद एक रात रोशनी जी ने कहा—
“शिप्रा, अभी तुम्हारी एक और परीक्षा बाकी है।”
संदीप बोला—
“माँ, अब और क्या?”
रोशनी जी बोलीं—
“हमारे घर की बहू को सिर्फ खाना बनाना नहीं, परिवार संभालना भी आना चाहिए।”
“कल मेरे रिश्तेदार एक हफ्ते के लिए आ रहे हैं। पूरा घर तुम्हें संभालना होगा।”
शिप्रा ने सिर झुका कर कहा—
“जी मम्मी जी।”
असली परीक्षा...
उसी दौरान अचानक रूपकिशोर जी की तबीयत खराब हो गई।
उन्हें तेज़ बुखार हो गया।
रोशनी जी घबरा गईं।
लेकिन शिप्रा ने तुरंत डॉक्टर बुलाया, दवा लाई और पूरी रात अपने ससुर की सेवा करती रही।
वह कई रातों तक ठीक से सोई भी नहीं।
एक रात रोशनी जी उठीं तो उन्होंने देखा—
शिप्रा अपने ससुर के सिर पर ठंडी पट्टी रख रही थी।
उसकी आँखों में नींद थी, लेकिन वह फिर भी सेवा कर रही थी।
यह देखकर रोशनी जी की आँखें भर आईं।
सास का दिल बदल गया...
अगली सुबह रोशनी जी ने शिप्रा को अपने पास बुलाया।
“शिप्रा…”
“जी मम्मी जी?”
रोशनी जी ने धीरे से कहा—
“मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया… लेकिन तुमने कभी शिकायत नहीं की।”
शिप्रा मुस्कुराकर बोली—
“आप मेरी माँ जैसी हैं। अगर मैं आपकी परीक्षा में पास हो जाऊँ तो मुझे खुशी होगी।”
यह सुनकर रोशनी जी खुद को रोक नहीं पाईं।
उन्होंने शिप्रा को गले लगा लिया।
“आज से कोई अग्नि परीक्षा नहीं होगी… आज से तुम सिर्फ मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी हो।”
तभी संदीप भी कमरे में आ गया।
“क्या बात है माँ?”
रोशनी जी मुस्कुराईं—
“तुम्हारी पत्नी ने मेरी सारी परीक्षाएँ पास कर ली हैं।”
संदीप खुश हो गया।
उस दिन पहली बार रोशनी जी ने सबके सामने कहा—
“मुझे अपने बेटे की पसंद पर गर्व है।”
उस दिन के बाद उस घर में कभी किसी अग्नि परीक्षा की जरूरत नहीं पड़ी।
क्योंकि उस घर को अब सिर्फ एक बहू नहीं, बल्कि एक सच्ची बेटी मिल चुकी थी।
और सच ही कहा गया है—
प्यार, धैर्य और सम्मान से हर रिश्ता जीत लिया जाता है।

Post a Comment