जहाँ औरत नहीं थी… वहाँ सबसे ज़्यादा अपनापन मिला
“पंडित जी, आप कैसी बातें कर रहे हैं? जिस घर में एक भी औरत नहीं है, वहाँ मैं अपनी बेटी को कैसे भेज दूँ?”
ममता की आवाज़ गुस्से और चिंता से काँप रही थी।
पंडित जी ने धीरे से समझाने की कोशिश की —
“ममता जी, लड़का बहुत अच्छा है, घर अच्छा है, लोग भी बहुत अच्छे हैं। बस उसकी माँ कुछ साल पहले गुजर गई। इसलिए घर में औरत नहीं है।”
तभी पीछे से कठोर आवाज़ आई।
“तो क्या हुआ? दहेज तो नहीं मांग रहे न।”
ये आवाज़ थी ममता के पति रघुवीर की, जो सुधा के सौतेले पिता थे।
“अगर इतना ही डर है तो किसी और घर में शादी कर दो। लेकिन याद रखना… मैं एक पैसा भी खर्च नहीं करूँगा।”
ममता चुप हो गई।
वह जानती थी कि रघुवीर से बहस करना बेकार है।
सुधा दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
उसे सबसे ज़्यादा डर उसी बात का था —
“जिस घर में एक भी औरत नहीं होगी… वहाँ मैं कैसे रहूँगी?”
रसोई में सुधा चुपचाप काम कर रही थी।
तभी उसकी सौतेली बहन पूनम वहाँ आई।
वह मुस्कुराते हुए बोली —
“सुना है तेरी शादी उस घर में हो रही है जहाँ चार-चार मर्द रहते हैं।”
फिर हँसते हुए बोली —
“सोच… पूरा घर मर्दों से भरा होगा और काम करने वाली तू अकेली।”
सुधा चुप रही।
पूनम को ताने मारने की आदत थी।
कुछ दिनों बाद सुधा की शादी हो गई।
विदाई के बाद वह अपने ससुराल पहुँची।
दरवाज़े पर जो दृश्य उसने देखा… वह उसकी कल्पना से बिल्कुल अलग था।
दरवाज़े पर उसके ससुर मिथिलेश और दोनों देवर हाथ में पूजा की थाली लिए खड़े थे।
सब थोड़े घबराए हुए भी थे।
मिथिलेश ने हिचकते हुए कहा —
“बहू… हमें ये रस्में ठीक से नहीं आतीं। लेकिन शायद चावल का कलश पैर से गिराकर अंदर आते हैं।”
सुधा ने हल्की मुस्कान के साथ कलश को पैर से गिराया और अंदर कदम रखा।
दोनों देवर खुशी से बोले —
“वेलकम भाभी!”
घर फूलों से सजा हुआ था।
कार्तिक ने गर्व से कहा —
“भाभी, ये सारी डेकोरेशन हमने खुद की है।”
अंकुर तुरंत बोला —
“और अब से आप मेरी वीडियो गेम पार्टनर हो।”
कार्तिक बोला —
“नहीं भाभी मेरे साथ बाइक राइड पर चलेंगी।”
सुधा थोड़ा असहज हो गई।
वह बोली —
“मुझे थोड़ा आराम करना है।”
और कमरे में चली गई।
अगले दिन सुधा जल्दी उठ गई।
वह सीधे रसोई में चली गई।
उसने सोचा —
“चार-चार मर्द हैं… कम से कम 50 पूरियाँ तो बनानी पड़ेंगी।”
वह काम शुरू ही कर रही थी कि पीछे से आवाज़ आई —
“भाभी, हम मदद करने आए हैं।”
सुधा ने मुड़कर देखा।
दोनों देवर खड़े थे।
वह चौंक गई।
“तुम लोगों को खाना बनाना आता है?”
अंकुर हँस पड़ा।
“मा के जाने के बाद सब सीखना पड़ा भाभी।”
कार्तिक बोला —
“पापा ने भेजा है हमें।”
तीनों मिलकर खाना बनाने लगे।
जो काम 3 घंटे में होता… वह 1 घंटे में हो गया।
नाश्ते के बाद मिथिलेश ने एक छोटा डिब्बा सुधा के हाथ में दिया।
“बहू, ये तुम्हारी सास के कंगन हैं।”
सुधा चौंक गई।
“वो चाहती थीं कि ये अपनी बहू को खुद पहनाएँ… लेकिन वो नहीं रहीं। इसलिए आज मैं उनकी तरफ से ये तुम्हें दे रहा हूँ।”
सुधा की आँखें भर आईं।
दिन धीरे-धीरे बीतने लगे और समय के साथ सुधा भी इस घर के लोगों को समझने लगी। पहले जहाँ वह सबसे थोड़ा दूरी बनाकर रहती थी, अब धीरे-धीरे उसके मन का डर कम होने लगा था।
एक दिन वह रसोई में खड़ी बर्तन धो रही थी। सर्दी का मौसम था और नल से बेहद ठंडा पानी आ रहा था। ठंडे पानी से उसके हाथ लाल पड़ गए थे और हल्की-हल्की ठिठुरन भी हो रही थी, लेकिन वह चुपचाप अपना काम करती जा रही थी।
तभी मिथिलेश जी रसोई में आए। उन्होंने देखा कि सुधा ठंडे पानी में बर्तन धो रही है और उसके हाथ काँप रहे हैं।
वे तुरंत बोले,
“अरे बहू, ये क्या कर रही हो? इतने ठंडे पानी में बर्तन क्यों धो रही हो?”
सुधा हल्की सी मुस्कान के साथ बोली,
“कुछ नहीं पापा जी… मुझे आदत है।”
मिथिलेश जी ने प्यार से कहा,
“नहीं बहू, अब ये आदत बदल जाएगी। तुम्हें इस तरह ठंडे पानी में काम करने की जरूरत नहीं है।”
सुधा कुछ समझ पाती, उससे पहले ही उन्होंने उसके हाथ से बर्तन ले लिए और बोले,
“तुम जाओ और आराम करो। बर्तन मैं धो देता हूँ।”
सुधा हैरान होकर उन्हें देखती रह गई।
और सचमुच अगले ही दिन घर में गीजर लगवा दिया गया, ताकि उसकी बहू को ठंडे पानी में काम न करना पड़े।
एक दिन कार्तिक ज़बरदस्ती उसे बाइक पर बैठाकर शहर घुमाने ले गया।
“भाभी, अब तो आप हमारी फैमिली का हिस्सा हो।”
सुधा मुस्कुरा दी।
उसे पहली बार लगा —
शायद उसका डर गलत था।
कुछ समय बाद सुधा के मायके से उसके भाई की शादी का कार्ड आया।
एक दिन अंकुर के साथ घर का कुछ सामान लेने के लिए सुधा मॉल गई। अंकुर थोड़ी देर के लिए किताबों की दुकान की तरफ चला गया और सुधा वहीं एक दुकान के सामने खड़ी चीज़ें देखने लगी।
उसी समय सामने से उसकी सौतेली बहन पूनम आ गई।
पूनम ने उसे सिर से पैर तक देखा। उसकी नजरों में हमेशा की तरह तिरस्कार था।
वह हल्की सी हँसी के साथ बोली—
“अरे वाह… शादी के बाद भी तुम बिल्कुल नहीं बदली। अभी भी वही सिंपल सी साड़ी?”
सुधा ने कुछ नहीं कहा। वह बस चुपचाप खड़ी रही।
पूनम फिर ताना मारते हुए बोली—
“वैसे तुम शादी में तो आओगी ना? पता है, भईया ने मुझे शॉपिंग के लिए पूरे पचास हजार रुपये दिए हैं। लेकिन तुम्हारी किस्मत में तो शॉपिंग कहाँ…”
वह हँसते हुए आगे बोली—
“और हाँ, अगर पहनने के लिए कुछ ढंग का ना हो तो बता देना। हमेशा की तरह मैं तुम्हें अपने पुराने कपड़ों में से कुछ दे दूँगी।”
पूनम की ये बातें सुनकर सुधा का दिल दुख से भर गया।
वह कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन शब्द उसके गले में ही अटक गए।
उसे अपने बचपन के वही दिन याद आने लगे, जब घर में हर नई चीज़ पहले पूनम को मिलती थी और उसके बाद जो बचता… वही सुधा के हिस्से आता था।
लेकिन पूनम को यह नहीं पता था कि थोड़ी दूरी पर खड़ा अंकुर उसकी हर बात सुन चुका था।
अंकुर के चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।
वह जानता था कि सही जवाब देने का समय अभी नहीं… बल्कि बाद में आएगा।
अगले दिन नाश्ता करते समय मिथिलेश जी ने सुधा की तरफ देखते हुए कहा—
“बहू, आज शाम पाँच बजे तैयार रहना। हमें तुम्हारे साथ शॉपिंग के लिए जाना है।”
सुधा थोड़ा चौंक गई और धीरे से बोली—
“लेकिन पापा जी, मेरे पास तो पहले से ही कपड़े हैं। मैं उन्हीं में से कुछ पहन लूँगी।”
मिथिलेश जी ने मुस्कुराते हुए उसकी बात काट दी—
“नहीं बहू, ऐसा कैसे हो सकता है? तुम्हारे भाई की शादी है और तुम उसकी बड़ी बहन हो। ऐसे मौके पर नई ड्रेस लेना तो बनता है। इसलिए शाम को तैयार रहना, आज तुम्हारी अच्छी-खासी शॉपिंग होने वाली है।”
शाम को सब उसे एक बड़े मॉल ले गए।
वहाँ जाकर उन्होंने सुधा के लिए 80,000 का लहंगा खरीदा।
संदीप और अंकुर ने ढेर सारे सूट और साड़ियाँ दिलवाईं।
कार्तिक ने कई सैंडल दिलवा दीं।
फिर मिथिलेश उसे जूलरी शॉप ले गए।
गोल्ड और डायमंड सेट खरीद दिए।
सुधा घबरा गई।
“पापा जी… ये सब क्यों?”
मिथिलेश मुस्कुराए —
“अगर तुम्हारी सास होती… तो वो तुम्हें इससे भी ज्यादा देती।”
घर आकर अंकुर बोला —
“भाभी, उस दिन मॉल में आपकी बहन आपको ताने दे रही थी। मैंने सब सुन लिया था।”
सुधा हैरान रह गई।
“आप लोगों को पता था?”
संदीप धीरे से बोला —
“सुधा, तुम्हें किसी की उतरन पहनने की ज़रूरत नहीं है। तुम इस घर की बहू ही नहीं, हमारी इज़्ज़त भी हो।”
सुधा की आँखों से धीरे-धीरे आँसू बहने लगे।
उसका गला भर आया था।
वह धीमी आवाज़ में बोली —
“पापा जी… मैं हमेशा सोचती थी कि जिस घर में एक भी औरत नहीं होगी, वहाँ मैं बिल्कुल अकेली पड़ जाऊँगी। मुझे लगता था कि मैं उस घर में कभी खुश नहीं रह पाऊँगी।”
मिथिलेश हल्के से मुस्कुराए। उन्होंने प्यार से सुधा के सिर पर हाथ रखा और बोले —
“बहू, घर को घर बनाने के लिए सिर्फ औरत का होना ज़रूरी नहीं होता। घर तब बनता है जब उसमें रहने वाले लोगों के दिल अच्छे हों। और अब तुम आ गई हो… तो यह घर सच में पूरा हो गया है।”
मिथिलेश की बात सुनकर सुधा की आँखों में फिर से आँसू आ गए, लेकिन इस बार उन आँसुओं में दुख नहीं… सुकून और अपनापन था।
उस दिन सुधा को समझ आया —
कभी-कभी जिस चीज़ से हम सबसे ज़्यादा डरते हैं…
वही चीज़ आगे चलकर हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशी बन जाती है।

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