रिश्तों की असली गर्माहट
रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी बार-बार बज रही थी और गैस पर रखी कढ़ाई में सब्ज़ी की खुशबू फैल रही थी।
घर के हॉल में टीवी चल रहा था, लेकिन किसी का ध्यान उस पर नहीं था।
सीमा रसोई में खड़ी जल्दी-जल्दी काम निपटा रही थी। तभी हॉल से उसकी सास कमला जी की आवाज़ आई—
“बहू, चाय बनी क्या? कब से इंतज़ार कर रही हूँ।”
सीमा ने जल्दी से कप में चाय डाली और ट्रे लेकर हॉल में पहुँची।
कमला जी ने कप उठाते हुए कहा—
“इतनी देर क्यों लग जाती है तुम्हें हर काम में? हमारे ज़माने में तो इतने काम पलभर में हो जाते थे।”
सीमा कुछ नहीं बोली। वह चुपचाप वापस रसोई में चली गई।
यह कोई नई बात नहीं थी।
कमला जी को सीमा के हर काम में कोई न कोई कमी नज़र आ ही जाती थी।
कभी खाना फीका, कभी ज्यादा नमक, कभी घर ठीक से साफ नहीं…
और सबसे बड़ी शिकायत — सीमा के मायके वाले।
कमला जी को लगता था कि सीमा के मायके वाले बार-बार आकर घर का माहौल खराब कर देते हैं।
इसी बीच दरवाज़े की घंटी बजी।
सीमा हाथ पोंछते हुए दरवाज़ा खोलने गई।
दरवाज़ा खोलते ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
सामने उसके मौसा-मौसी खड़े थे।
“अरे सीमा बेटा!”
मौसी ने उसे गले लगाते हुए कहा।
सीमा बोली, “अरे आप लोग! आइए-आइए अंदर आइए।”
दोनों अंदर आ गए।
हॉल में बैठी कमला जी ने जब उन्हें देखा तो उनके चेहरे पर हल्की नाराज़गी आ गई।
फिर भी औपचारिकता निभाते हुए बोलीं—
“नमस्ते… आइए बैठिए।”
मौसा जी ने मुस्कुराकर कहा—
“नमस्ते बहन जी, बस ऐसे ही मिलने चले आए थे। सोचा बेटी से भी मिल लेंगे।”
कमला जी हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“अच्छा है… पर आजकल तो आपके घर से कोई न कोई आता ही रहता है।”
सीमा को बात समझ आ गई।
उसने जल्दी से कहा—
“आप लोग बैठिए, मैं चाय लेकर आती हूँ।”
मौसी बोलीं—
“अरे रहने दो बेटा, हम ज़्यादा देर नहीं रुकेंगे।”
लेकिन सीमा चाय बनाने चली गई।
कमला जी धीरे से बुदबुदाईं—
“जब देखो तब मायके वाले आ जाते हैं…”
मौसा-मौसी ने सुन तो लिया, पर कुछ नहीं बोले।
थोड़ी देर बाद सीमा चाय लेकर आई।
सब लोग बैठकर बातें करने लगे।
मौसी ने बताया कि उनके घर अगले हफ्ते गृह प्रवेश का कार्यक्रम है।
उन्होंने निमंत्रण कार्ड निकालते हुए कहा—
“सीमा, तुम सबको जरूर आना है।”
सीमा ने खुशी से कार्ड ले लिया।
लेकिन कमला जी ने तुरंत कहा—
“देखिए, हमारा बेटा बहुत बिज़ी रहता है। हर जगह जाना उसके लिए आसान नहीं है।”
मौसा जी मुस्कुराते हुए बोले—
“कोई बात नहीं बहन जी, जितना संभव हो उतना ही सही।”
थोड़ी देर बाद वे लोग चले गए।
दरवाज़ा बंद होते ही कमला जी का गुस्सा बाहर आ गया।
“ये क्या है बहू? हर दूसरे दिन तुम्हारे मायके से कोई न कोई चला आता है।”
सीमा ने शांत स्वर में कहा—
“मम्मी जी, वो लोग बस मिलने आए थे।”
कमला जी बोलीं—
“मिलने आए थे या निमंत्रण देने? हर बार कोई न कोई प्रोग्राम।”
सीमा चुप रही।
तभी उसके पति राहुल ऑफिस से घर आए।
सीमा ने उन्हें कार्ड देते हुए कहा—
“मौसी के घर गृह प्रवेश है।”
राहुल ने कार्ड देखा और बोला—
“अरे अच्छा है, चलेंगे।”
इतना सुनते ही कमला जी बोलीं—
“तुम कहीं नहीं जाओगे।”
राहुल ने आश्चर्य से पूछा—
“क्यों मम्मी?”
कमला जी बोलीं—
“तुम्हें अपने काम से फुर्सत नहीं और ये लोग हर बार बुला लेते हैं। इतना बड़ा परिवार है… हर कार्यक्रम में जाना जरूरी है क्या?”
राहुल ने शांत स्वर में कहा—
“मम्मी, वो हमारे अपने लोग हैं।”
कमला जी बोलीं—
“अपने लोग… अपने लोग… बस यही सुनती रहती हूँ मैं।”
अब तक सीमा चुप थी।
लेकिन आज उसने धीरे से कहा—
“मम्मी जी, शादी के समय आपने ही कहा था कि बड़ा परिवार होना अच्छी बात है।”
कमला जी चुप हो गईं।
सीमा आगे बोली—
“परिवार बड़ा हो तो रिश्ते भी ज्यादा होते हैं… और रिश्तों को निभाना भी पड़ता है।”
कमला जी को यह बात अच्छी नहीं लगी।
वह गुस्से में अपने कमरे में चली गईं।
रात में राहुल के पिता शिवनाथ जी ने कमला जी से कहा—
“तुम्हें अपनी सोच बदलनी होगी।”
कमला जी बोलीं—
“मैंने क्या गलत कहा?”
शिवनाथ जी बोले—
“गलत यह है कि तुम बहू के परिवार को अपना नहीं मानती।”
कमला जी चुप हो गईं।
शिवनाथ जी बोले—
“जब हमारी बेटी अपने ससुराल जाती है, तो हम चाहते हैं कि वहाँ उसे सम्मान मिले।
तो क्या हमारी बहू के मायके वाले यही उम्मीद नहीं रखते होंगे?”
कमला जी के पास कोई जवाब नहीं था।
रात भर उन्हें अपनी बातें याद आती रहीं।
अगले दिन उन्होंने सीमा को बुलाया।
सीमा थोड़ी झिझकते हुए आई।
कमला जी बोलीं—
“बहू… उस दिन मैंने शायद कुछ ज्यादा बोल दिया।”
सीमा चुप रही।
कमला जी बोलीं—
“गृह प्रवेश वाले दिन हम सब चलेंगे।”
सीमा ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
कमला जी बोलीं—
“आखिर वो भी तो हमारा ही परिवार है।”
सीमा की आँखों में हल्की नमी आ गई।
कार्यक्रम वाले दिन पूरा परिवार साथ गया।
मौसी ने जब कमला जी को देखा तो खुशी से बोलीं—
“अरे बहन जी, आप भी आईं!”
कमला जी मुस्कुराईं और बोलीं—
“अब तो हमें आना ही था… आखिर हम भी तो परिवार का हिस्सा हैं।”
उस दिन पहली बार सीमा को लगा कि
रिश्तों में दूरी नहीं… बस समझ की कमी होती है।
और जब समझ आ जाए,
तो घर में शिकायतों की जगह
रिश्तों की गर्माहट भर जाती है।
समाप्त।

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