दाल की चटनी और बहू का दिल
सुबह का समय था, लेकिन आसमान में बादलों की मोटी चादर छाई हुई थी।
हल्की-हल्की ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर आ रही थी और आँगन में लगे तुलसी के पौधे की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
रसोई से मसालों की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
डाइनिंग टेबल पर दिनेश जी अख़बार फैलाकर बैठे थे और उनके सामने उनकी बेटी आरुषि मोबाइल देखते हुए बार-बार रसोई की तरफ झाँक रही थी।
आरुषि ने नाक से खुशबू खींचते हुए कहा,
“पापा, आज तो किचन से बड़ी जबरदस्त खुशबू आ रही है।
लगता है मम्मी ने आज कुछ खास बनाया है।”
दिनेश जी हँसते हुए बोले,
“लगता तो मुझे भी यही है। आज तेरी माँ का मूड अच्छा होगा।”
दोनों बेसब्री से इंतज़ार करने लगे।
करीब दस मिनट बाद भी जब खाना नहीं आया तो दिनेश जी ने जोर से आवाज लगाई —
“अरे शांति ओ शांति!”
कोई जवाब नहीं आया।
उन्होंने फिर आवाज लगाई —
“अरे भाग्यवान! सुनती हो?”
रसोई से खड़खड़ाहट के बीच आवाज आई —
“क्या है? क्यों शोर मचा रखा है?”
दिनेश जी बोले,
“दस बजने वाले हैं। डिनर करवा दो। सुबह पाँच बजे सब्ज़ी मंडी भी जाना है।”
शांति बोली,
“बस दो मिनट। खाना बन चुका है।”
थोड़ी देर बाद शांति गरमागरम खाना लेकर आई और मेज़ पर रख दिया।
“लो, आज चने की दाल और सादे पराठे बनाए हैं।
चख कर बताओ कैसे बने हैं।”
दाल देखते ही आरुषि का चेहरा उतर गया।
“मम्मी! आज फिर दाल बना दी?”
“मुझे दाल बिल्कुल पसंद नहीं है।
मेरे लिए हरी सब्ज़ी बना देतीं… या कम से कम धनिया-मिर्च की चटनी ही पीस देतीं।”
शांति ने भौंहें चढ़ाईं।
“एक बार खाकर तो देख। घी का तड़का लगाया है।”
आरुषि ने मुँह बना लिया।
“नहीं खाना मुझे।”
शांति बोली,
“तो मत खा। भूखी सो जा।
मैं दोबारा सब्ज़ी नहीं बनाने वाली।”
दिनेश जी बीच में बोले —
“अरे भाग्यवान, चटनी पीस दो ना।
खाकर लेगी।”
शांति झुंझलाकर बोली,
“हाँ हाँ, ताकि बेटी के बहाने आपको भी चटनी मिल जाए!”
गुस्से में बुदबुदाती हुई शांति सिलबट्टे पर चटनी पीसने लगी।
उस दिन किसी तरह खाना खत्म हुआ।
लेकिन शायद किस्मत ने आरुषि के लिए कुछ और ही सोच रखा था…
कुछ महीनों बाद...
आरुषि की शादी अमरावती शहर के एक बड़े परिवार में हो गई।
उसके पति का नाम प्रभात था।
घर में दादा-दादी, सास-ससुर, जेठ-जेठानी और कई बच्चे थे।
सबसे खास बात यह थी कि प्रभात के दादा-दादी दक्षिण भारत के थे।
घर में अक्सर इडली, डोसा, सांभर और तरह-तरह की चटनियाँ बनती थीं।
पहले दिन जब आरुषि ने किचन देखा तो उसकी आँखें फटी रह गईं।
चारों तरफ बड़े-बड़े डिब्बों में चावल भरे थे।
दराज़ में अलग-अलग दालें रखी थीं।
कोने में सिलबट्टा, ओखली, और हाथ चक्की भी थी।
आरुषि मन ही मन बोली —
“हे भगवान!
ये तो सचमुच पुराने ज़माने की रसोई लग रही है।”
तभी उसकी जेठानी राशी अंदर आई।
मुस्कुराते हुए बोली —
“तो देवरानी जी… पहली रसोई में क्या बनाने का प्लान है?”
आरुषि ने आत्मविश्वास से कहा —
“मैं सोच रही हूँ शाही पनीर, पुलाव, पूरी, कचौरी और रबड़ी बना लूँ।”
राशी हल्के से हँस पड़ी।
“हमारे घर में पनीर ज़्यादा कोई नहीं खाता।
तुम दाल मखनी बना दो… और साथ में पकौड़े और चटनी।”
आरुषि चौंक गई।
“फिर से चटनी?”
लेकिन वह चुप रही।
कुछ ही देर में उसने पूरा खाना बना लिया।
जब सब लोग खाने बैठे तो पकौड़े और चटनी की खूब तारीफ होने लगी।
छोटी भतीजी पूजा बोली —
“चाची! ये पकौड़े तो बहुत टेस्टी हैं।”
आरुषि मुस्कुरा दी।
उसे लगा शायद अब सब ठीक रहेगा।
मॉनसून का दिन...
कुछ दिन बाद तेज बारिश होने लगी।
बाहर बादल गरज रहे थे।
दादा जी बोले —
“बहु! आज तो बारिश है…
चटनी पकौड़े बना दो।”
आरुषि किचन में गई।
फ्रिज खोला।
ना बेसन… ना सब्ज़ी।
वह परेशान हो गई।
तभी जेठानी बोली —
“चिंता मत करो।
हमारे यहाँ चावल के पकौड़े बनते हैं… और दाल की चटनी।”
आरुषि के चेहरे का रंग उड़ गया।
लेकिन सब इंतज़ार कर रहे थे।
वह मजबूरी में दाल-चावल भिगोने लगी।
कंकड़ चुनते-चुनते दो घंटे लग गए।
फिर उसने सिलबट्टे पर पीसकर घोल बनाया।
जब पकौड़े तलने लगी तो बारिश की बूंद खिड़की से गिरकर कड़ाही में पड़ी।
तेल उछल पड़ा।
आरुषि घबरा गई।
लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।
आखिरकार पकौड़े और चटनी बनाकर मेज़ पर रख दिए।
सब खाने लगे।
दादा जी बोले —
“बहु! आज तो मज़ा आ गया।”
दादी बोली —
“अब तो हमारी बहु असली रसोइया बन गई।”
आरुषि चुपचाप मुस्कुराती रही।
उसने पहली बार महसूस किया कि हर घर की अपनी परंपरा होती है।
धीरे-धीरे वही दाल की चटनी और चावल के पकौड़े उसे भी अच्छे लगने लगे।
और एक दिन उसने माँ को फोन करके कहा —
“मम्मी… आज मैंने खुद दाल की चटनी बनाई है।
अब समझ में आया कि असली स्वाद मेहनत और अपनापन में होता है।”
फोन के उस पार शांति की आँखें भर आईं।
उन्हें लगा —
उनकी जिद्दी बेटी सच में बड़ी हो गई है।
और उस दिन से
दाल की चटनी सिर्फ एक खाना नहीं रही…
बल्कि रिश्तों की मिठास बन गई।

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