समझदारी की जीत
दोपहर का समय था।
घर के आँगन में अमरूद के पेड़ की छाया फैली हुई थी और हल्की हवा चल रही थी। बरामदे में रखी कुर्सी पर सुमित्रा जी बैठी ऊन से स्वेटर बुन रही थीं।
उसी समय छोटी बहू पूजा रसोई से चाय बनाकर लाई और बोली,
“मम्मी जी, चाय पी लीजिए।”
सुमित्रा जी ने कप लिया और बोली,
“हाँ रख दो, और सुनो… शाम को कहीं बाहर मत जाना।”
पूजा थोड़ी हैरान होकर बोली,
“क्यों मम्मी जी? आज तो रोहित ने कहा था कि हम दोनों बाजार घूमने जाएंगे।”
सुमित्रा जी तुरंत बोलीं,
“देखो छोटी बहू, तुम्हारी बड़ी भाभी सीमा कभी ऐसे बाहर घूमने नहीं जाती। अगर तुम जाओगी तो उसे बुरा लग सकता है। इसलिए तुम भी घर पर ही रहो।”
पूजा चुप हो गई।
असल में शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे और उसे धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि घर में हर छोटी बात पर सास बड़ी बहू का नाम लेकर उसे रोक देती हैं।
शाम को जब रोहित ऑफिस से घर आया तो उसने पूछा,
“पूजा, चलो तैयार हो जाओ, बाजार चलते हैं।”
पूजा धीरे से बोली,
“नहीं… मम्मी जी ने मना कर दिया।”
रोहित ने हैरानी से पूछा,
“मना क्यों कर दिया?”
तभी सुमित्रा जी वहीं आ गईं और बोलीं,
“क्योंकि सीमा कहीं बाहर नहीं जाती, इसलिए पूजा भी नहीं जाएगी।”
रोहित बोला,
“पर मम्मी, भाभी खुद ही नहीं जातीं। उन्हें भी तो हमने कई बार कहा है।”
तभी सीमा रसोई से बाहर आई और बोली,
“मम्मी जी, मुझे किसी से कोई परेशानी नहीं है। पूजा और रोहित अगर बाहर जाना चाहते हैं तो जाने दीजिए।”
सुमित्रा जी ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उठकर अपने कमरे में चली गईं।
उस दिन के बाद भी अक्सर यही होने लगा।
अगर पूजा कहीं जाने की बात करती, तो सुमित्रा जी कह देतीं—
“सीमा ऐसा नहीं करती, इसलिए तुम भी मत करो।”
धीरे-धीरे पूजा को लगने लगा कि शायद उसकी जेठानी ही उसे रोकती है।
वह सीमा से थोड़ा दूरी बनाने लगी।
एक दिन सीमा ने महसूस किया कि पूजा उससे पहले जैसा खुलकर बात नहीं करती।
वह समझ गई कि जरूर कोई गलतफहमी हो रही है।
उसने अपने पति अमित से कहा,
“मुझे लगता है पूजा मुझसे नाराज़ है, लेकिन वजह समझ नहीं आ रही।”
अमित बोला,
“मुझे लगता है मम्मी के कारण ऐसा हो रहा है। वो हर बात में तुम्हारा नाम लेती हैं।”
सीमा कुछ देर सोचती रही और फिर बोली,
“अगर ऐसा है तो इस गलतफहमी को खत्म करना जरूरी है।”
अगले दिन शाम को जब पूरा परिवार साथ बैठा था, सीमा ने कहा,
“मम्मी जी, मैं सोच रही हूँ कि अगले हफ्ते अपनी सहेली के घर जाऊँ।”
सुमित्रा जी तुरंत बोलीं,
“नहीं बहू, अगर तुम जाओगी तो पूजा भी जाने लगेगी। फिर घर का काम कौन करेगा?”
सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
तभी पूजा ने धीरे से कहा,
“मम्मी जी, अगर दीदी जाएँगी तो मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगेगा।”
अमित भी बोला,
“और अगर पूजा कहीं जाना चाहती है तो सीमा को भी कोई परेशानी नहीं है।”
अब सुमित्रा जी थोड़ी असहज हो गईं।
तभी उनके पति शंकर बाबू बोले,
“सुमित्रा, सच कहूँ तो तुम ही दोनों बहुओं का नाम लेकर उन्हें रोकती रहती हो। अगर मना करना है तो साफ-साफ कहो, पर एक का नाम लेकर दूसरी को मत रोको।”
घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
सुमित्रा जी को भी एहसास हुआ कि उनकी वजह से बहुओं के बीच गलतफहमी पैदा हो रही थी।
उस दिन के बाद सीमा और पूजा ने एक तरीका निकाल लिया।
अगर उन्हें कहीं जाना होता या कोई फैसला लेना होता, तो पहले आपस में बात कर लेतीं और फिर सास से पूछतीं।
अब सुमित्रा जी के पास मना करने का कोई बहाना नहीं रहता था।
धीरे-धीरे घर का माहौल भी बदल गया।
सीमा और पूजा अब पहले से ज्यादा हँसते-बोलते रहने लगीं।
एक दिन सुमित्रा जी ने दोनों को साथ हँसते देखा तो मुस्कुरा कर बोलीं,
“अच्छा है बहुओं, तुम दोनों मिलजुल कर रहती हो।”
पूजा हँसते हुए बोली,
“मम्मी जी, जब समझदारी साथ हो तो रिश्ते अपने आप अच्छे हो जाते हैं।”
सीमा ने भी सिर हिलाते हुए कहा,
“और जब घर में प्यार बना रहे, तो वही सबसे बड़ी खुशी होती है।”
आँगन में उस समय हल्की हवा चल रही थी।
घर के माहौल में भी अब शांति और अपनापन था।
सच ही कहा गया है—
जहाँ समझदारी होती है, वहाँ चालाकी कभी जीत नहीं पाती।

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