झूठ का बोझ
दोपहर का समय था।
घर के आँगन में हल्की धूप फैली हुई थी और रसोई से दाल के छौंक की खुशबू आ रही थी।
नेहा रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी। तभी उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर सास कमला जी का नाम चमक रहा था।
नेहा ने जल्दी से हाथ पोंछे और फोन उठा लिया।
“हां मम्मी जी, नमस्ते।”
उधर से कमला जी की आवाज़ आई,
“नेहा, तुम्हारी ननद राधा की डिलीवरी का समय नज़दीक है। हमने सोचा है कि उसे तुम्हारे पास शहर भेज दें। वहां अस्पताल भी अच्छा है और तुम भी हो, तो देखभाल ठीक से हो जाएगी।”
नेहा कुछ क्षण चुप रही।
उसके मन में तीन साल पुरानी बातें एकदम ताज़ा हो गईं।
उसने धीरे से कहा,
“मम्मी जी… इस बार शायद यह संभव नहीं होगा।”
“क्या मतलब?” कमला जी की आवाज़ अचानक तेज़ हो गई।
“तुम्हारी ननद है वो। उसके लिए इतना भी नहीं कर सकती?”
नेहा ने संयम से जवाब दिया,
“मम्मी जी, पिछली बार जो हुआ था… उसके बाद मुझसे यह सब नहीं हो पाएगा।”
इतना कहकर नेहा ने फोन रख दिया।
उधर गांव में बैठी कमला जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
उन्होंने तुरंत अपने बेटे रोहित को फोन लगाया।
“रोहित! तुम्हारी पत्नी ने तो हद कर दी। अपनी ही ननद की डिलीवरी के लिए मना कर दिया।”
रोहित ऑफिस में बैठा था।
मां की बात सुनकर वह भी नाराज़ हो गया।
“क्या? उसने ऐसा कहा?”
“हां, साफ मना कर दिया। कहती है कि राधा यहां ना आए।”
रोहित का माथा गर्म हो गया।
उसने मन ही मन तय कर लिया कि शाम को घर जाकर नेहा से बात करेगा।
शाम को जैसे ही रोहित घर पहुंचा, उसका गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था।
नेहा ने दरवाजा खोला ही था कि रोहित बोल पड़ा,
“तुमने मम्मी को फोन पर मना कैसे कर दिया? राधा मेरी बहन है। उसका भी इस घर पर उतना ही हक है।”
नेहा शांत खड़ी रही।
“अंदर आ जाओ पहले,” उसने धीरे से कहा।
दोनों ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गए।
रोहित फिर बोला,
“बताओ, आखिर तुमने ऐसा क्यों किया?”
नेहा ने उसकी ओर देखा और बोली,
“सच सुनना चाहते हो?”
“हां।”
“तो याद है तीन साल पहले राधा की पहली डिलीवरी?”
रोहित थोड़ा असहज हो गया।
नेहा ने कहना शुरू किया —
“जब राधा यहां आई थी, तब मम्मी जी दो दिन बाद ही गांव लौट गई थीं। उस पूरे डेढ़ महीने में मैंने ही सब कुछ संभाला था।
रात को बच्चे को उठाना, कपड़े बदलना, खाना बनाना… सब कुछ।”
रोहित चुप सुन रहा था।
“लेकिन जब राधा गांव वापस गई तो उसने मम्मी से क्या कहा था, याद है?”
रोहित ने नजरें झुका लीं।
नेहा ने खुद ही जवाब दिया,
“उसने कहा था कि मैंने उसका ठीक से ध्यान नहीं रखा।
उसके लिए रखा हुआ घी और मेवे भी मैंने खा लिए।”
रोहित के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे।
नेहा की आवाज़ अब थोड़ी भारी हो गई थी।
“और उस दिन जब मम्मी जी ने मुझसे सवाल किए थे… तब आपने क्या कहा था?”
रोहित को सब याद था।
उसने कहा था —
“मैं तो ऑफिस चला जाता हूं, मुझे क्या पता घर में क्या होता है।”
नेहा बोली,
“उस दिन आपने मेरा साथ नहीं दिया।
मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी पूरे परिवार के सामने मुझे दोषी बना दिया गया।”
कमरे में कुछ देर सन्नाटा छाया रहा।
नेहा ने आगे कहा,
“उसके बाद रिश्तेदारों में भी मेरी बहुत बदनामी हुई। हर जगह यही बात कही गई कि बहू ने ननद का घी खा लिया।”
रोहित को अब शर्म महसूस हो रही थी।
नेहा धीरे से बोली,
“इसलिए इस बार मैंने मना कर दिया।
क्योंकि सेवा करने के बाद भी अगर इल्जाम ही मिलना है, तो बेहतर है पहले ही मना कर दिया जाए।”
यह कहकर नेहा उठकर अपने कमरे में चली गई।
उस रात रोहित देर तक सो नहीं पाया।
उसे एहसास हो रहा था कि उस दिन उसने अपनी पत्नी के साथ गलत किया था।
कुछ दिन बाद कमला जी ने राधा को गांव ही बुला लिया।
वहीं उसकी डिलीवरी हुई।
गांव में अस्पताल छोटा था और सुविधाएं भी कम थीं।
घर का काम, बच्चे की देखभाल और अपनी तबीयत — सब कुछ राधा को खुद संभालना पड़ रहा था।
रात को कई बार उसे खुद ही उठकर बच्चे को संभालना पड़ता था।
ऐसे ही एक रात जब वह थकी हुई बैठी थी, तब उसे अचानक नेहा की याद आई।
उसे याद आया कि पिछली बार नेहा रात-रात भर जागकर उसके बच्चे को संभालती थी।
और उसने बदले में क्या किया?
झूठ बोलकर उसी की बदनामी कर दी।
राधा की आंखों में पछतावे के आंसू आ गए।
अब उसे समझ में आ गया था कि
झूठ बोलकर इंसान दूसरों से पहले खुद को नुकसान पहुंचाता है।
लेकिन अब पछताने से क्या फायदा।
क्योंकि सच ही है —
“जब चिड़िया खेत चुग जाती है, तब पछताने से कुछ नहीं मिलता।”

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