बहू भी इंसान है
सुबह के करीब साढ़े पाँच बजे थे।
घर के आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में सूरज की हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी।
अलार्म की तेज आवाज से सीमा की आंख खुल गई।
उसने धीरे से मोबाइल उठाकर अलार्म बंद किया और फिर थकान भरी आंखों से छत की तरफ देखने लगी।
उसका शरीर बिल्कुल टूट रहा था।
कल रात उसे सोते-सोते करीब दो बजे हो गए थे।
कारण था उसकी ननद पूजा।
पूजा अपने पति और बच्चों के साथ मायके आई हुई थी और उसने अचानक फैसला कर लिया कि आज घर में ही छोटी सी पार्टी होगी।
बस फिर क्या था...
खाने से लेकर मिठाई और स्नैक्स तक की पूरी जिम्मेदारी सीमा के ऊपर आ गई।
सास ने साफ शब्दों में कह दिया था—
“बहू, मेहमान हमारे हैं तो काम भी तुम्हें ही संभालना पड़ेगा।”
सीमा ने बिना कुछ कहे सब काम कर दिया।
रसोई में घंटों खड़े होकर उसने पकौड़े, पुलाव, दाल, सब्जी और बच्चों के लिए पास्ता तक बनाया।
मेहमानों के जाने के बाद भी काम खत्म नहीं हुआ।
रसोई की सफाई, बर्तन जमाना और बिखरा हुआ सामान समेटते-समेटते रात के दो बज गए थे।
सीमा बहुत थक गई थी।
इसीलिए आज सुबह उठने का उसका बिल्कुल मन नहीं कर रहा था।
उसने सोचा—
“थोड़ी देर और सो जाती हूं…”
और वह फिर से सो गई।
कुछ देर बाद जब उसकी आंख खुली तो घड़ी में साढ़े सात बज रहे थे।
यह देखकर सीमा घबरा गई।
“अरे… इतनी देर!”
वह जल्दी से उठी और बाथरूम में चली गई।
तैयार होकर जब वह कमरे से बाहर निकली तो उसके मन में एक ही डर था—
आज सास और ननद के ताने जरूर सुनने पड़ेंगे।
वह धीरे-धीरे रसोई की तरफ बढ़ी।
लेकिन जैसे ही वह रसोई के पास पहुंची, अंदर से अपनी ननद पूजा की आवाज सुनाई दी।
पूजा अपनी मां से कह रही थी—
“मां, आपने अपनी बहू को बहुत ज्यादा छूट दे दी है।”
“देखिए समय क्या हो गया है और महारानी जी अभी तक कमरे से बाहर नहीं आई हैं।”
सास ने भी तुरंत हामी भर दी।
“सच कह रही हो तुम पूजा। आजकल की लड़कियों को कोई शर्म ही नहीं रही।”
“हमारे जमाने में बहुएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती थीं।”
पूजा फिर बोली—
“मां, अगर बहू ही देर से उठेगी तो घर का काम कौन करेगा?”
“क्या हमें चाय बनानी पड़ेगी?”
फिर उसने ताना मारते हुए कहा—
“लगता है इसकी मां ने इसे कोई संस्कार नहीं दिए।”
सीमा दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी।
उसकी आंखें भर आईं।
उसे अपनी शादी का पहला दिन याद आ गया।
जब से वह इस घर में आई थी, वह रोज सुबह पांच बजे उठती थी।
पूरा घर अकेले संभालती थी।
सास ने तो उसके आने के बाद घर की कामवाली भी हटा दी थी।
बस एक बूढ़ी कमला काकी थीं जो केवल बर्तन धो देती थीं।
बाकी सब काम सीमा ही करती थी।
लेकिन आज सिर्फ एक दिन देर से उठने पर उसके संस्कारों पर सवाल उठाए जा रहे थे।
सीमा के अंदर गुस्सा भी था और दुख भी।
लेकिन उसने खुद को संभाला और रसोई में चली गई।
उसे अचानक देखकर पूजा थोड़ी घबरा गई।
लेकिन सीमा ने उनकी तरफ देखा तक नहीं।
उसने अपने लिए एक कप चाय बनाई और वहां से जाने लगी।
तभी उसकी सास ने तेज आवाज में कहा—
“कहां जा रही हो बहू?”
“नाश्ता कौन बनाएगा?”
सीमा रुकी।
उसने शांत लेकिन ठोस आवाज में कहा—
“मां जी, आज मैं आराम करने जा रही हूं।”
सास चौंक गई।
“क्या मतलब?”
सीमा बोली—
“कल रात आपकी बेटी की पार्टी के कारण मुझे दो बजे तक काम करना पड़ा।”
“आज थोड़ा आराम कर लूं तो शायद गलत नहीं होगा।”
पूजा तुरंत गुस्से में बोली—
“अरे वाह! अभी से जवाब देने लगी।”
“यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी मां ने?”
अब सीमा खुद को रोक नहीं पाई।
उसने पहली बार खुलकर कहा—
“दीदी, मेरी मां ने मुझे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं।”
“इसीलिए मैं एक साल से बिना शिकायत के इस घर का हर काम कर रही हूं।”
“लेकिन मैं इंसान हूं… कोई मशीन नहीं।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
सीमा आगे बोली—
“कल आपकी पार्टी थी, लेकिन सारी तैयारी मैंने की।”
“खाना बनाया, केक बनाया, मेहमान संभाले और सफाई भी की।”
“आपने तो बस मजे किए।”
पूजा चुप हो गई।
सीमा बोली—
“आज अगर मुझे थोड़ा आराम चाहिए तो इसमें क्या गलत है?”
इतने में वहां सीमा के ससुर रघुनाथ जी आ गए।
उन्होंने सब कुछ सुन लिया था।
उन्होंने सख्त आवाज में कहा—
“सीमा बिल्कुल सही कह रही है।”
सास और पूजा दोनों चौंक गईं।
रघुनाथ जी बोले—
“तुम दोनों मां-बेटी खुद कोई काम नहीं करतीं और सारा बोझ बहू पर डाल देती हो।”
“बहू इस घर की इज्जत है, नौकरानी नहीं।”
उन्होंने पूजा की तरफ देखकर कहा—
“और तुम्हें तो अपनी भाभी से ऐसे बात करने का कोई अधिकार ही नहीं है।”
“पहले खुद सोचो तुम अपने ससुराल में कितना काम करती हो।”
पूजा का सिर झुक गया।
रघुनाथ जी ने सास की तरफ देखा।
“अगर हमारी बेटी के साथ उसके ससुराल में ऐसा व्यवहार हो तो तुम्हें कैसा लगेगा?”
सास के पास कोई जवाब नहीं था।
इतना कहकर रघुनाथ जी वहां से चले गए।
सीमा भी चुपचाप अपने कमरे में चली गई।
रसोई में सन्नाटा छा गया।
पूजा का चेहरा शर्म से झुक गया था।
वह मन ही मन सोच रही थी—
“आज पापा ने मुझे आईना दिखा दिया।”
अगर वह अब भी नहीं बदली तो सच में उसका मायका उससे दूर हो जाएगा।
थोड़ी देर बाद पूजा अपनी मां से बोली—
“मां… मुझसे गलती हो गई।”
सास ने भी गहरी सांस ली।
“मुझसे भी…”
फिर दोनों सीमा के कमरे की तरफ चल पड़ीं।
दरवाजा खटखटाकर पूजा बोली—
“भाभी… हमें माफ कर दीजिए।”
सीमा ने दरवाजा खोला।
पूजा की आंखों में सच्चा पछतावा था।
उसने कहा—
“अब से मैं कभी आपका अपमान नहीं करूंगी।”
सास ने भी कहा—
“बहू, तुम सच में बहुत अच्छी हो।”
“आज हमें अपनी गलती का एहसास हो गया।”
सीमा हल्का सा मुस्कुराई।
उस दिन के बाद उस घर में एक बात सबको समझ आ गई—
बहू भी इंसान होती है, उसे भी सम्मान और आराम की जरूरत होती है।

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