बहू की चुप्पी

 

Mother-in-law criticizing her daughter-in-law while talking to a friend in the living room as the daughter-in-law stands quietly with a tea tray.


सुबह के करीब छह बजे थे।

आंगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी और रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।


रसोई में खड़ी रीना जल्दी-जल्दी काम कर रही थी।

चूल्हे पर चाय चढ़ी थी, दूसरी तरफ नाश्ता बन रहा था और साथ ही वह टिफिन भी तैयार कर रही थी।


इतने में सास कमला देवी की तेज आवाज आई—


“रीना… चाय बनी कि नहीं? मुझे मंदिर भी जाना है।”


रीना ने जल्दी से जवाब दिया—


“बस मम्मी जी, अभी लेकर आती हूँ।”


रीना की शादी को डेढ़ साल हुआ था।

वह सुबह से रात तक घर का सारा काम करती थी, लेकिन फिर भी सासू मां को उससे कभी संतोष नहीं होता था।


कुछ देर बाद वह ट्रे में चाय लेकर हॉल में आई।


कमला देवी ने कप उठाते ही कहा—


“इतनी देर क्यों लगा दी? क्या सो रही थी अंदर?”


रीना चुपचाप खड़ी रही।


तभी उसका पति अमित भी ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर बाहर आया।


कमला देवी ने तुरंत शिकायत शुरू कर दी—


“देखो बेटा, तुम्हारी बीवी को जरा भी जिम्मेदारी नहीं है। एक चाय बनाने में भी आधा घंटा लगा देती है।”


अमित ने बिना कुछ पूछे ही कहा—


“रीना, थोड़ा जल्दी काम किया करो।”


रीना ने धीरे से कहा—


“मैं सुबह से सब काम कर रही हूँ अमित जी… नाश्ता भी बन रहा है, टिफिन भी।”


लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी।



दोपहर का समय...


दोपहर का समय था।

कमला देवी की एक पुरानी सहेली उनसे मिलने घर आई थी।


कमला देवी सोफे पर बैठकर उनसे बातें कर रही थीं। तभी उन्होंने जोर से आवाज लगाई—


“रीना… ज़रा जल्दी से चाय बना ला और साथ में पकौड़े भी बना देना।”


रीना तुरंत रसोई में चली गई।


कुछ ही देर में उसने गरम-गरम पकौड़े तल लिए और चाय बनाकर एक ट्रे में सजा दी। फिर वह ट्रे लेकर ड्रॉइंग रूम में आई और दोनों के सामने रख दी।


कमला देवी की सहेली ने मुस्कराते हुए कहा—


“कमला, तुम्हारी बहू तो बहुत मेहनती और कामकाजी लगती है।”


यह सुनते ही कमला देवी ने तुरंत कहा—


“अरे कहाँ बहन… ये तो बस सामने दिखावा करती है। असली काम तो मुझे ही करना पड़ता है।”


सास की ये बात सुनकर रीना का दिल अंदर से टूट गया।


वह कुछ नहीं बोली। बस चुपचाप ट्रे उठाकर वापस रसोई में चली गई।


रसोई में पहुंचते ही उसकी आँखें नम हो गईं।

उसे बहुत बुरा लगा कि इतना काम करने के बाद भी उसकी मेहनत की कोई कदर नहीं है।



शाम का समय...


शाम को अमित ऑफिस से घर लौटा।

जैसे ही उसने दरवाज़े के अंदर कदम रखा, कमला देवी ने शिकायतों की झड़ी लगा दी।


“देखो अमित, आज तुम्हारी बीवी ने पूरे घर का माहौल ही खराब कर दिया।”


अमित ने हैरानी से पूछा,

“क्या हुआ माँ?”


कमला देवी नाराज़ होकर बोलीं,

“मेरी सहेली आई हुई थी। उसके सामने मुझे ही गलत साबित करने लगी। जैसे सारी गलती मेरी ही हो।”


इतना सुनते ही रीना घबरा गई।

वह जल्दी से बोली,


“नहीं मम्मी जी, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। मैं तो बस—”


लेकिन उसकी बात पूरी होने से पहले ही अमित गुस्से में बोल पड़ा,


“बस रीना! हर बार तुम्हारी ही शिकायत क्यों आती है? थोड़ा संभलकर नहीं रह सकती क्या?”


अमित की यह बात सुनकर रीना चुप हो गई।

उसने धीरे से अपनी नज़रें झुका लीं।


उसके मन में बहुत कुछ कहने को था, लेकिन उस समय उसे लगा कि उसकी बात सुनने वाला यहाँ कोई नहीं है।



उस रात रीना देर तक बिस्तर पर जागती रही।

नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।


वह छत की तरफ देखते हुए सोच रही थी—


“मैं सुबह से रात तक इस घर के लिए काम करती हूँ… फिर भी सबको यही लगता है कि गलती मेरी ही है। आखिर मेरी मेहनत किसी को क्यों नहीं दिखती?”


सोचते-सोचते उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

काफी देर बाद जाकर उसकी आँख लगी।


अगली सुबह जब घर के सभी लोग उठे, तो उन्हें कुछ अजीब सा लगा।


रसोई बिल्कुल शांत थी।

न चाय की खुशबू आ रही थी…

न बर्तनों की आवाज।


कमला देवी ने इधर-उधर देखा और गुस्से में बोली—


“आज क्या बात है? अभी तक चाय भी नहीं बनी। ये बहू कहाँ चली गई?”


इतना कहकर वह गुस्से में रीना के कमरे की तरफ बढ़ीं।


तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और रीना बाहर आई।


वह तैयार होकर खड़ी थी और उसके हाथ में एक छोटा सा बैग था।


उसे इस तरह देखकर कमला देवी ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा—


“ये सुबह-सुबह कहाँ जाने की तैयारी है? और घर का काम कौन करेगा?”


रीना ने शांत लेकिन ठहरी हुई आवाज में कहा—


“मम्मी जी… मैं अपने मायके जा रही हूँ।”


यह सुनकर पास खड़ा अमित चौंक गया।


“अचानक? मायके क्यों जा रही हो?” उसने हैरानी से पूछा।


रीना ने धीरे से जवाब दिया—


“क्योंकि शायद इस घर में मेरी कोई जरूरत नहीं है।”


उसकी बात सुनते ही घर में एकदम सन्नाटा छा गया।


रीना की आँखें हल्की-सी नम थीं, लेकिन उसकी आवाज अब भी शांत थी।


वह आगे बोली—


“मैं सुबह से रात तक इस घर के लिए काम करती हूँ… लेकिन फिर भी हर बार गलती मेरी ही निकाली जाती है। मेरी मेहनत किसी को दिखाई ही नहीं देती।”


अमित पहली बार चुप खड़ा रह गया।


रीना ने बैग उठाते हुए कहा—


“अगर मैं सच में इतनी बेकार हूँ… तो कुछ दिन मायके रहकर ही सही। शायद तब आपको मेरी कीमत समझ आए।”


इतना कहकर वह दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी।



तभी अमित ने पीछे से आवाज दी —


“रीना… रुको।”


रीना के कदम वहीं रुक गए।

वह धीरे-धीरे पलटी और अमित की तरफ देखने लगी।


अमित कुछ पल तक चुप खड़ा रहा, जैसे सही शब्द ढूँढ रहा हो। फिर वह धीरे-धीरे रीना के पास आया और शांत आवाज में बोला —


“शायद गलती मेरी ही है। मैंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि तुम पूरे दिन कितना काम करती हो और कितनी मेहनत करती हो।”


अमित की यह बात सुनकर कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।


कमला देवी भी पास ही खड़ी थीं। उनके चेहरे पर पहली बार थोड़ी झिझक दिखाई दे रही थी।


अमित ने अपनी माँ की तरफ देखते हुए कहा —


“माँ, आज तक मैं यही सोचता रहा कि घर का सारा काम सिर्फ बहू की जिम्मेदारी है। लेकिन अब मुझे समझ में आ गया है कि घर चलाना सिर्फ एक इंसान का काम नहीं होता। हमें भी रीना की मदद करनी चाहिए।”


फिर वह रीना की तरफ मुड़ा और बोला —


“आज से इस घर की जिम्मेदारी सिर्फ तुम्हारी नहीं होगी। मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा। और माँ… आपको भी रीना को थोड़ा समझना होगा।”


अमित की बात सुनकर कमला देवी कुछ पल तक चुप रहीं।

फिर उन्होंने धीरे से कहा —


“ठीक है बहू… शायद हमसे भी कहीं न कहीं गलती हो गई।”


यह सुनते ही रीना की आँखें भर आईं।


वह कुछ बोल नहीं पाई, बस चुपचाप खड़ी रही।


अमित हल्का सा मुस्कुराया और बोला —


“अब कहीं जाने की जरूरत नहीं है। चलो… आज हम तीनों साथ बैठकर चाय पीते हैं।”


रीना के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।


काफी समय बाद उसे ऐसा लगा जैसे इस घर में उसकी मेहनत और उसके मन की बात सच में किसी ने समझी हो।



सीख:

घर में सबसे ज्यादा मेहनत वही करता है जिसकी आवाज सबसे कम सुनी जाती है। इसलिए रिश्तों में शिकायत से ज्यादा समझदारी जरूरी होती है।





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