पुराना पेड़ और घर की छांव
“हर चीज़ की कीमत उसकी उपयोगिता से नहीं, उसके होने से भी होती है… बस समझने वाली नज़र चाहिए।”
नीलम ने यह बात यूँ ही कह दी थी, लेकिन उस समय किसी ने खास ध्यान नहीं दिया।
घर में पिछले कुछ महीनों से एक ही चर्चा चल रही थी—दादी को गांव वापस भेज दिया जाए या नहीं।
नीलम को लगता था कि अब दादी का यहां रहना बेकार है।
“ना कुछ काम करती हैं, ना किसी चीज़ में मदद… उल्टा ध्यान रखना पड़ता है,” वह अक्सर अपने पति अमित से कहती।
अमित हर बार बात टाल देता,
“नीलम, वो हमारी जिम्मेदारी हैं… और फिर गांव में अकेली कैसे रहेंगी?”
लेकिन नीलम के मन में यह बात धीरे-धीरे चुभती जा रही थी।
दादी जब गांव से आई थीं, तब हालात अलग थे।
नीलम की तबीयत खराब रहती थी, छोटा बेटा आरव भी बहुत छोटा था। दादी ने ही घर संभाला था।
रात-रात भर जागकर बच्चे को सुलाना, नीलम का ख्याल रखना, घर में एक सुकून बनाए रखना—सब कुछ दादी ने बिना कुछ कहे किया।
लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, नीलम को दादी की मौजूदगी बोझ लगने लगी।
एक दिन रविवार को अमित ऑफिस के काम से बाहर गया हुआ था।
नीलम घर की सफाई में लगी थी और आरव दादी के पास खेल रहा था।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
“मालकिन, मैं सुरेश… माली,” बाहर से आवाज़ आई।
“अरे हाँ, आओ सुरेश! काफी दिनों बाद आए हो।”
“क्या करें मालकिन, थोड़ा काम ज्यादा था… आज सोचा आपका बगीचा भी ठीक कर दूं।”
नीलम उसे लेकर पीछे के बगीचे में चली गई।
बगीचे की हालत सच में खराब थी।
कहीं सूखी पत्तियां, कहीं बढ़ी हुई घास, कहीं उलझी हुई बेलें।
सुरेश चुपचाप काम में लग गया।
घंटों मेहनत करने के बाद जब नीलम बाहर आई, तो बगीचा बिल्कुल बदला हुआ लग रहा था।
“वाह! तुमने तो कमाल कर दिया सुरेश,” नीलम खुश हो गई।
तभी उसकी नज़र कोने में खड़े एक पुराने नीम के पेड़ पर पड़ी।
“ये पेड़ अभी तक क्यों खड़ा है?” उसने थोड़ा नाराज़ होकर कहा।
“मैंने पिछली बार भी कहा था इसे काट देना… ना फल देता है, ना फूल… बस जगह घेर रखी है।”
सुरेश कुछ पल चुप रहा।
फिर धीरे से बोला,
“काट तो देता मालकिन… लेकिन मन नहीं माना।”
“मन नहीं माना? क्यों?” नीलम चिढ़ गई।
सुरेश ने पेड़ की तरफ देखते हुए कहा,
“मालकिन, ये पेड़ भले फल ना देता हो, लेकिन पूरे बगीचे को धूप से बचाता है।”
“जब तेज़ गर्मी पड़ती है ना… तो यही पेड़ बाकी छोटे पौधों को बचाता है।”
“और…” उसने थोड़ा रुककर कहा,
“कभी-कभी जो दिखता नहीं, वही सबसे ज़रूरी होता है।”
नीलम कुछ बोलती, उससे पहले ही एक पत्थर आकर उसी पेड़ में अटक गया।
पास के बच्चे आम तोड़ने के लिए पत्थर फेंक रहे थे।
“अरे! ध्यान से…” सुरेश भागा, लेकिन बच्चे भाग चुके थे।
वह वापस आया और बोला,
“देखा मालकिन? अगर ये पेड़ ना होता, तो पत्थर सीधे आप पर लगता।”
नीलम चुप हो गई।
उसने पेड़ को ध्यान से देखा…
पहली बार।
वो पेड़ सच में पूरे बगीचे को ढके हुए था।
नीचे छोटे-छोटे पौधे सुरक्षित थे।
रात को अमित वापस आया।
खाना खाने के बाद उसने कहा,
“नीलम, मैंने सोच लिया है… अगले हफ्ते गांव जाकर मां को छोड़ आऊंगा।”
नीलम कुछ पल चुप रही।
फिर धीरे से बोली,
“नहीं… उनकी ज़रूरत है यहां।”
अमित हैरान रह गया,
“अचानक क्या बदल गया?”
नीलम मुस्कुराई और बोली,
“कुछ चीज़ें समझने में समय लगता है… जैसे उस पुराने पेड़ की अहमियत।”
“जो दिखता नहीं, वही सबसे ज्यादा संभालता है।”
उसकी नज़र खिड़की से बाहर उसी पेड़ पर टिक गई थी…
और शायद इस बार उसने सिर्फ पेड़ नहीं, रिश्तों की असली छांव देख ली थी।

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