दीवार नहीं, पुल बनो

Indian family emotional bonding scene with mother-in-law blessing daughter-in-law, showing love, unity, and strong relationships in a traditional home


“घर में रहने वाले अगर दीवारें खड़ी करने लगें, तो फिर छत भी साथ नहीं देती… इसलिए दीवार नहीं, पुल बनना सीखो।”

सासु माँ की ये बात उस दिन किसी को खास समझ नहीं आई थी… लेकिन आज सोनाली के दिल में गूंज रही थी।


घर में खुशी का माहौल था। बड़े भैया-भाभी की शादी की सालगिरह थी। रिश्तेदार आए हुए थे, हंसी-मज़ाक चल रहा था।


तभी भाभी की मम्मी ने सबके सामने कहा—

“हमारी बेटी तो अपनी देवरानी की बहुत तारीफ करती है। कहती है—‘मेरी देवरानी सोनाली तो इस घर की सबसे बड़ी ताकत है… सबको जोड़कर रखती है।’”


सबकी नजरें सोनाली पर टिक गईं।


सोनाली मुस्कुराई जरूर… लेकिन उसके मन में एक पुरानी याद उभर आई—


वह इस घर में नई-नई आई थी, इसलिए हर चीज़ उसे अनजानी और थोड़ी अलग लगती थी—घर के रिवाज़, लोगों का स्वभाव, और उनकी आदतें… सब कुछ उसके लिए नया था।


घर की बड़ी बहू, अंजली, पूरे घर की ज़िम्मेदारियाँ संभालती थीं। हर छोटा-बड़ा फैसला उन्हीं से पूछकर लिया जाता था, और सब लोग उनकी राय को महत्व देते थे।


सोनाली यह सब चुपचाप देखती रहती। उसे महसूस होने लगा कि उसकी बातों की उतनी अहमियत नहीं है, जितनी अंजली की है।

धीरे-धीरे यही एहसास उसके मन में एक हल्की सी दूरी में बदलने लगा।



एक दिन की बात है…


घर में मेहमान आने वाले थे। अंजली ने सोनाली से कहा—

“सोनाली, आज तुम मिठाई बना लेना… तुम्हारे हाथ की खीर सबको बहुत पसंद आएगी।”


सोनाली ने हल्का सा सिर हिलाया, लेकिन मन में सोचा—

“सारा काम मुझसे ही करवाना है… खुद तो बस सबकी तारीफ लूटती रहती हैं।”


उसने खीर तो बना दी, लेकिन मन से नहीं।


जब मेहमान आए, तो खीर सबको बहुत पसंद आई।


सबने अंजली की तारीफ की—

“वाह, क्या स्वाद है!”


अंजली ने तुरंत कहा—

“अरे, ये मैंने नहीं… सोनाली ने बनाई है।”


सोनाली को थोड़ी खुशी हुई, लेकिन उसने उसे जाहिर नहीं किया।



कुछ दिन बाद…


घर में एक छोटी सी बात को लेकर सोनाली ने अंजली के बारे में सासु माँ से शिकायत कर दी—


“माँ, भाभी हर काम में मुझे आगे कर देती हैं… खुद पीछे रहती हैं।”


सासु माँ ने शांत होकर सुना।


फिर उन्होंने सोनाली को आंगन में ले जाकर एक कोना दिखाया—

वहाँ दो दीवारों के बीच एक छोटी सी दरार थी।


सासु माँ बोलीं—

“देखो, ये दरार… छोटी है, लेकिन अगर इसे अभी नहीं भरा, तो एक दिन ये पूरी दीवार को कमजोर कर देगी।”


सोनाली चुप रही।


सासु माँ ने आगे कहा—

“घर में भी अगर छोटी-छोटी बातें दिल में रखी जाएं, तो वो दरार बन जाती हैं… और फिर रिश्ते कमजोर होने लगते हैं।”


सोनाली की आँखें झुक गईं।


“अगर तुम्हें लगता है कि कोई तुम्हें समझ नहीं रहा, तो दीवार मत बनाओ… पुल बनो। बात करो, जोड़ो।”



उस दिन सोनाली को अपनी गलती का एहसास हुआ।


उसे समझ आया कि अंजली उसे आगे इसलिए करती हैं, ताकि वह भी घर का हिस्सा महसूस करे… न कि बोझ।



अगले दिन…


सोनाली खुद अंजली के पास गई—


“भाभी, कल मैंने जो कहा… वो गलत था। आप हमेशा मुझे आगे बढ़ाती हैं… और मैं ही आपको गलत समझ बैठी।”


अंजली मुस्कुरा दीं—

“अरे पगली, हम तो एक ही टीम हैं… तुम आगे बढ़ोगी, तो घर ही आगे बढ़ेगा।”


सोनाली की आँखें नम हो गईं।



उस दिन के बाद…


सोनाली ने कभी दिल में बात रखना छोड़ दिया।


वह हर छोटी बात को प्यार से सुलझाने लगी।


धीरे-धीरे घर में उसका स्थान खुद-ब-खुद मजबूत हो गया।



और आज…


जब सब उसकी तारीफ कर रहे थे, सोनाली को सासु माँ की वही बात याद आ रही थी—


“दीवार नहीं, पुल बनो…”


सासु माँ उसके पास आईं, उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं—

“अब तुमने सही रास्ता चुन लिया है।”


सोनाली मुस्कुराई—

“जी माँ… अब मैं इस घर में कभी दरार नहीं आने दूंगी।”



उसने मन ही मन सोचा—


रिश्ते अपने आप नहीं टूटते…

हमारी चुप्पी, गलतफहमियाँ और अहंकार उन्हें तोड़ देते हैं।


लेकिन अगर हम समय रहते पुल बन जाएं—

तो हर दूरी मिट सकती है,

और घर सच में घर बन सकता है।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.