मायके का सामान

 

Indian daughter-in-law choosing a saree while her mother-in-law stands nearby in a traditional home setting


सुबह का समय था।

घर के आंगन में हल्की-हल्की धूप फैल रही थी और रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।


नेहा रसोई में खड़ी नाश्ता बना रही थी। गैस पर चाय चढ़ी हुई थी और साथ में पराठे भी बन रहे थे।


तभी उसकी सास, शांति देवी रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गईं।


“बहू, आज ज़रा अच्छे से तैयार हो जाना।”


नेहा ने चौंककर पूछा, “क्यों मम्मी जी?”


“अरे आज तेरी बुआ सास के यहाँ पूजा है। पूरा परिवार आएगा। तू इस घर की बहू है, इसलिए अच्छे से तैयार होकर चलना।”


“जी मम्मी जी,” नेहा ने मुस्कराते हुए कहा।


नेहा की शादी राजेश के साथ अभी आठ महीने पहले ही हुई थी। वह इस घर की इकलौती बहू थी। राजेश का एक छोटा भाई और एक बहन थी। बहन की शादी हो चुकी थी और वह दूसरे शहर में रहती थी।


नेहा जल्दी-जल्दी घर का काम खत्म करने लगी ताकि समय पर तैयार हो सके।


कुछ देर बाद वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोलकर साड़ियां देखने लगी।


उसने अपने मायके से आई हुई एक बहुत सुंदर साड़ी निकाली। हल्के गुलाबी रंग की साड़ी थी, जिस पर बहुत ही सुंदर कढ़ाई का काम था।


उसे देखकर नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।


“ये साड़ी तो मुझे मम्मी ने अपने हाथों से पसंद करके दिलाई थी,” उसने मन ही मन सोचा।


तभी शांति देवी कमरे में आ गईं।


“क्या कर रही हो बहू?”


“मम्मी जी, साड़ी देख रही हूँ। ये वाली पहनने की सोच रही हूँ,” नेहा ने साड़ी दिखाते हुए कहा।


शांति देवी ने साड़ी हाथ में ली, थोड़ा देखा और फिर मुँह बनाकर बोलीं—


“अरे ये कैसी साड़ी है? इतनी हल्की-फुल्की?”


नेहा थोड़ा असहज हो गई।


“मम्मी जी… ये बहुत अच्छी है। मम्मी मेरे साथ बाजार से लाई थीं।”


“अच्छी होगी तुम्हारे मायके में,” शांति देवी बोलीं,

“लेकिन हमारे यहाँ ऐसे प्रोग्राम में ऐसी साड़ियाँ नहीं पहनी जातीं।”


फिर अलमारी की तरफ इशारा करते हुए बोलीं—


“तुम वो साड़ियाँ पहन लो जो हमने तुम्हें दी थीं। वो सब बहुत महंगी हैं और देखने में भी भारी लगती हैं।”


नेहा ने धीरे से कहा, “ठीक है मम्मी जी।”


उसने ससुराल से आई हुई साड़ियों में से एक साड़ी निकाल ली।


शाम को जब सब लोग पूजा में गए तो वहाँ कई लोगों ने नेहा की तारीफ की।


“बहू तो बहुत सुंदर लग रही है।”


“बहुत अच्छी साड़ी पहनी है।”


ये सुनकर शांति देवी बहुत खुश हो रही थीं।


घर लौटते समय भी वह रास्ते भर कहती रहीं—


“देखा बहू, मैंने कहा था ना कि हमारे घर की साड़ियाँ ही अच्छी लगती हैं।”


नेहा बस मुस्कराकर रह गई।


उसे थोड़ा बुरा जरूर लगा, लेकिन उसने कुछ कहा नहीं।



कुछ दिनों बाद राजेश की बहन पूजा अपने मायके आई।


घर में रौनक हो गई।


पूजा दो दिन रुककर वापस अपने ससुराल जाने वाली थी।


जिस दिन वह जाने लगी, शांति देवी ने नेहा को कमरे में बुलाया।


“बहू, एक काम करो।”


“जी मम्मी जी?”


“तुम अपने मायके की कोई अच्छी साड़ी पूजा को दे दो विदाई में। उसकी सास भी खुश हो जाएगी।”


नेहा एक पल के लिए चुप रह गई।


उसे वही गुलाबी साड़ी याद आ गई जिसे मम्मी जी ने “हल्की-फुल्की” कहा था।


लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।


वह अपने कमरे में गई और अलमारी खोलकर थोड़ी देर तक सोचती रही।


फिर उसने ससुराल से मिली एक नई साड़ी निकाली और पूजा को दे दी।


पूजा बहुत खुश हो गई।


“भाभी, ये साड़ी तो बहुत सुंदर है।”


“तुम्हें पसंद आई तो मुझे खुशी है,” नेहा मुस्कराकर बोली।



जब पूजा चली गई तो शांति देवी ने नेहा से पूछा—


“अरे बहू, मैंने तो तुम्हें मायके वाली साड़ी देने के लिए कहा था। तुमने ये दूसरी साड़ी क्यों दे दी?”


नेहा ने बहुत शांत आवाज़ में कहा—


“मम्मी जी, वो मायके वाली साड़ी तो आपको बहुत हल्की-फुल्की लगी थी ना…”


शांति देवी चुप हो गईं।


नेहा आगे बोली—


“मैं नहीं चाहती थी कि दीदी के ससुराल में किसी को लगे कि हमने उन्हें हल्की साड़ी दी है। इसलिए मैंने सोचा कि ससुराल की ही साड़ी दे दूँ।”


शांति देवी के पास अब कोई जवाब नहीं था।


नेहा धीरे से बोली—


“वैसे भी मम्मी जी… मायके का सामान तो हमेशा हल्का ही लगता है ना।”


इतना कहकर वह मुस्कराते हुए रसोई में चली गई।


और शांति देवी पहली बार अपनी ही बातों के बारे में सोचने लगीं।




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