लालच की कीमत

 

Family property dispute between two brothers outside an Indian house while sisters try to stop the argument in the evening.


शाम का समय था।

आसमान में हल्का अंधेरा छाने लगा था और मोहल्ले की गलियों में बच्चे खेल रहे थे।


उसी समय शर्मा जी के घर के बाहर जोर-जोर से बहस की आवाजें आ रही थीं।


रमेश गुस्से में अपने छोटे भाई सुरेश पर चिल्ला रहा था।


“सुरेश, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? पिताजी की जायदाद में हम सबका बराबर हक़ है।”


सुरेश भी गुस्से में बोला,

“किस बात का हक़? पिताजी मेरे साथ रहते थे, मैंने उनकी सेवा की है। इसलिए सब कुछ मेरा है।”


पास में खड़ी दोनों बहनें, कविता और सीमा, दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश कर रही थीं।


कविता बोली,

“सुरेश, लालच मत करो। पैसा और ज़मीन से ज्यादा कीमती रिश्ते होते हैं।”


लेकिन सुरेश पर जैसे लालच का भूत सवार था। वह किसी की बात सुनने को तैयार ही नहीं था।


परिवार की कहानी...


शर्मा जी एक ईमानदार और सादगी से जीवन जीने वाले स्कूल शिक्षक थे।

उन्होंने पूरी ज़िंदगी मेहनत और ईमानदारी से काम किया था, इसलिए पूरे मोहल्ले में लोग उनका बहुत सम्मान करते थे।


शर्मा जी के चार बच्चे थे।

सबसे बड़ा बेटा रमेश था। उसके बाद दो बेटियां — कविता और सीमा। सबसे छोटा बेटा सुरेश था।


रमेश बचपन से ही समझदार और जिम्मेदार स्वभाव का था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसे दूसरे शहर में एक अच्छी नौकरी मिल गई थी, इसलिए वह वहीं रहने लगा था।


दोनों बेटियों, कविता और सीमा, की शादी हो चुकी थी। वे अपने-अपने घरों में खुशहाल जीवन बिता रही थीं और समय-समय पर अपने मायके भी आ जाया करती थीं।


सुरेश घर में सबसे छोटा था, इसलिए माता-पिता का सबसे ज्यादा लाड़-प्यार उसी को मिला था। उसकी हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करने की कोशिश की जाती थी।


शर्मा जी के पास शहर में उनका एक बड़ा घर था, जिसमें पूरा परिवार कई सालों तक साथ रहा था। इसके अलावा गांव में थोड़ी सी खेती की जमीन भी थी।


यह सब कुछ शर्मा जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी की मेहनत और ईमानदारी से कमाया था।



पिता की सोच...


शर्मा जी अक्सर अपने बच्चों से कहा करते थे,


“मेरी संपत्ति में मेरे चारों बच्चों का बराबर हक़ है। बेटियां भी मेरी संतान हैं, इसलिए उनका हिस्सा भी उतना ही होगा जितना बेटों का।”


शर्मा जी की यह बात सुनकर सुरेश के मन में हल्की-सी खटक पैदा हो जाती थी।


वह बाहर से तो कुछ नहीं कहता था, लेकिन अंदर ही अंदर उसे यह बात बिल्कुल पसंद नहीं थी।


उसे लगता था कि वह माता-पिता के साथ रहता है, इसलिए पूरी संपत्ति उसी को मिलनी चाहिए।


बीमारी और धोखा...


समय बीतता गया।


एक दिन शर्मा जी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।


अब वे ज्यादा चल-फिर भी नहीं पाते थे।


पिता की इस हालत को देखकर जहाँ बाकी बच्चों को चिंता होती थी, वहीं सुरेश के मन में एक गलत ख्याल पैदा हो गया। उसके मन में लालच घर करने लगा। वह सोचने लगा कि अगर किसी तरह सारी जायदाद उसके नाम हो जाए, तो उसे किसी के साथ कुछ भी बाँटना नहीं पड़ेगा।


इसी लालच में एक दिन वह चुपचाप एक वकील के पास गया और कुछ कागज़ तैयार करवा लाया।


कुछ दिनों बाद वह उन कागज़ों को घर लेकर आया। उस समय शर्मा जी अपने कमरे में बिस्तर पर बैठे थे। सुरेश ने बड़े ही सामान्य अंदाज़ में कागज़ उनके सामने रख दिए और बोला,


“पिताजी, यह बैंक और प्रॉपर्टी से जुड़े कुछ जरूरी कागज़ हैं। बस औपचारिकता के लिए आपके साइन चाहिए।”


शर्मा जी को अपने बेटे पर पूरा भरोसा था। उन्होंने बिना ज्यादा पूछताछ किए ही कागज़ हाथ में लिए और एक-एक करके उन पर साइन कर दिए।


उन्हें बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि जिन कागज़ों पर वे भरोसे से हस्ताक्षर कर रहे हैं, उन्हीं में उनकी सारी संपत्ति सुरेश के नाम कर दी गई है।


सुरेश चुपचाप कागज़ समेटकर कमरे से बाहर निकल आया। उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान थी, लेकिन उसे यह बिल्कुल भी एहसास नहीं था कि यह धोखा एक दिन उसके जीवन में भारी पड़ेगा।



सच्चाई सामने आई...


कुछ महीनों बाद शर्मा जी की मृत्यु हो गई।


उनके जाने की खबर सुनते ही सभी भाई-बहन अपने-अपने घरों से आकर इकट्ठा हो गए। घर में शोक का माहौल था। हर कोई दुखी था और पिता की याद में चुपचाप बैठा था।


कुछ दिन बाद जब अंतिम क्रिया-कर्म पूरे हो गए, तब बड़े बेटे रमेश ने सबके सामने बात शुरू की। उसने शांत स्वर में कहा,


“पिताजी हमेशा कहा करते थे कि उनकी संपत्ति में हम चारों भाई-बहनों का बराबर हिस्सा होगा। इसलिए अब हमें मिलकर बैठकर सब कुछ बराबर बाँट लेना चाहिए।”


रमेश की बात सुनकर सुरेश कुछ देर चुप रहा। फिर वह अंदर कमरे में गया और एक फाइल लेकर वापस आया।


उसने वह फाइल सबके सामने टेबल पर रख दी और बोला,

“पहले यह कागज़ देख लो, फिर बात करना।”


रमेश ने जैसे ही कागज़ उठाकर पढ़ना शुरू किया, उसके चेहरे का रंग बदल गया। पढ़ते-पढ़ते वह एकदम सन्न रह गया।


उसके पैरों तले मानो जमीन खिसक गई थी।


कागज़ में साफ लिखा था कि शर्मा जी ने अपनी सारी संपत्ति छोटे बेटे सुरेश के नाम कर दी है।


रमेश गुस्से और हैरानी से भर उठा। उसने तेज आवाज में कहा,


“यह कैसे हो सकता है? यह बिल्कुल झूठ है। पिताजी ऐसा कभी नहीं कर सकते थे।”


सुरेश ने ठंडे स्वर में जवाब दिया,


“जो कागज़ में लिखा है वही सच है। पिताजी ने अपनी मर्जी से सब कुछ मेरे नाम किया है।”


यह सुनते ही घर का माहौल अचानक बदल गया।


अभी तक जो घर शोक में डूबा हुआ था, वहाँ अब बहस और तकरार शुरू हो गई।


दोनों बहनें भी हैरान थीं। वे बार-बार कह रही थीं कि पिताजी ऐसा कभी नहीं कर सकते।


लेकिन सुरेश अपनी बात पर अड़ा रहा।


धीरे-धीरे बात इतनी बढ़ गई कि घर में जोर-जोर से झगड़ा होने लगा।


उस दिन पहली बार भाई-बहनों के बीच इतना बड़ा विवाद हुआ था।


और उसी दिन से उनके रिश्तों में दरार पड़ गई।


लालच का अंजाम...


संपत्ति मिलने के बाद सुरेश का स्वभाव धीरे-धीरे बदलने लगा।


अब उसे न घर की चिंता थी और न ही रिश्तों की। वह ज्यादातर समय अपने दोस्तों के साथ बाहर घूमता रहता। शराब पीना उसकी आदत बन गई थी और वह पैसों को बिना सोचे-समझे खर्च करने लगा था।


कुछ ही समय में उसका शरीर कमजोर होने लगा। उसे अक्सर थकान महसूस होती, भूख कम लगने लगी और चेहरा भी पीला पड़ने लगा।


एक दिन अचानक उसे तेज बुखार आ गया और पूरे शरीर में बहुत कमजोरी महसूस होने लगी। परिवार वाले उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए।


जांच कराने पर डॉक्टरों ने बताया कि उसका लीवर काफी खराब हो चुका है। यह सुनकर घर वालों के होश उड़ गए।


डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए उसे बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह दी। परिवार वाले उसे तुरंत शहर के बड़े अस्पताल ले गए और इलाज शुरू कराया।


लेकिन तब तक बीमारी बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, पर सुरेश की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।


आखिर कुछ ही महीनों के अंदर सुरेश ने दम तोड़ दिया।



अब उस बड़े घर में सिर्फ उसकी पत्नी और बच्चे रह गए थे।


लोग आपस में यही कहते थे,


“जिसने अपने भाई-बहनों का हक़ मारा, वह खुद भी उस दौलत का सुख नहीं देख पाया।”


रमेश ने एक दिन अपने बच्चों से कहा,


“बेटा, पैसा जरूरी है, लेकिन रिश्तों से ज्यादा नहीं।

अगर इंसान लालच में अंधा हो जाए, तो उसका अंत अच्छा नहीं होता।”




सीख:

दूसरों का हक़ मारकर कमाया गया धन कभी सुख नहीं देता।

लालच इंसान से उसके अपने ही छीन लेता है।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.