समझ का असली उपहार
दरवाज़े के बाहर गली में हलचल शुरू हो चुकी थी।
कहीं दूधवाले की आवाज़ आ रही थी, तो कहीं बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे थे।
घर के अंदर रसोई से चाय और ताज़े पराठों की खुशबू फैल रही थी।
नेहा चूल्हे के सामने खड़ी नाश्ता बना रही थी। तभी कमरे से उसके पति रोहन की तेज़ आवाज़ आई—
“नेहा! ज़रा जल्दी करो, आज ऑफिस में बहुत जरूरी मीटिंग है।”
“हाँ, बना रही हूँ,” नेहा ने जवाब दिया।
पर मन ही मन वह सोच रही थी—
“लगता है इन्हें आज का दिन भी याद नहीं… आज हमारी शादी की पाँचवीं सालगिरह है।”
नेहा ने सोचा कि वह खुद से कुछ नहीं कहेगी। अगर रोहन को याद होगा, तो वह जरूर कुछ बोलेगा।
थोड़ी देर बाद रोहन तैयार होकर रसोई में आया।
“वाह! आज तो आलू के पराठे बनाए हैं। मेरा फेवरेट!” वह खुश होकर बोला।
नेहा हल्का सा मुस्कुरा दी।
रोहन जल्दी-जल्दी नाश्ता करने लगा।
“चलता हूँ, देर हो रही है,” इतना कहकर वह ऑफिस के लिए निकल गया।
नेहा दरवाज़े तक उसे छोड़ने आई।
पर रोहन ने सालगिरह का एक शब्द भी नहीं कहा।
रोहन के जाते ही नेहा थोड़ी उदास होकर सोफे पर बैठ गई।
तभी उसकी सास, कमला देवी, कमरे में आईं।
“क्या हुआ बेटा? इतनी चुप क्यों हो?”
नेहा मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली—
“कुछ नहीं माँजी।”
कमला देवी समझ गईं कि कुछ बात जरूर है।
“बताओ भी… क्या हुआ?”
नेहा धीरे से बोली—
“माँजी… आज हमारी शादी की सालगिरह है। लेकिन रोहन को शायद याद ही नहीं।”
कमला देवी हल्का सा हँस दीं।
“बेटा, कभी-कभी आदमी काम की चिंता में बहुत कुछ भूल जाते हैं। हो सकता है, शाम को कोई सरप्राइज हो।”
नेहा ने कहा—
“पता नहीं माँजी।”
कमला देवी प्यार से बोलीं—
“तुम ऐसा करो… शाम को उसकी पसंद का खाना बना लेना। देखना, सब ठीक हो जाएगा।”
नेहा ने सिर हिला दिया।
दिन धीरे-धीरे बीत गया।
शाम होने लगी।
नेहा ने रसोई में रोहन की पसंद का खाना बनाया—
पनीर की सब्ज़ी, पुलाव और खीर।
उसने अलमारी से अपनी शादी वाली गुलाबी साड़ी भी निकाल ली।
तैयार होकर वह आईने के सामने खड़ी हो गई।
तभी ससुर जी, मोहन जी, कमरे में आए।
“अरे वाह! आज तो हमारी बहू बहुत सुंदर लग रही है।”
नेहा मुस्कुराई।
“अरे बहू, आज तो तुम दोनों की शादी की सालगिरह है… भगवान हमेशा खुश रखे।” उन्होंने आशीर्वाद दिया।
नेहा ने उनके पैर छुए।
रात के आठ बज गए…
फिर नौ बज गए…
पर रोहन अभी तक घर नहीं आया था।
नेहा को चिंता होने लगी।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
नेहा जल्दी से दरवाज़ा खोलने गई।
रोहन सामने खड़ा था।
वह थोड़ा थका हुआ लग रहा था।
“आ गए आप?” नेहा बोली।
“हाँ… आज बहुत देर हो गई,” रोहन ने कहा।
नेहा ने देखा कि रोहन के हाथ पीछे छिपे हुए हैं।
“पीछे क्या छिपाया है?” नेहा ने पूछा।
रोहन थोड़ा मुस्कुराया।
“कुछ नहीं…”
नेहा ने उसका हाथ पकड़कर आगे खींच लिया।
उसके हाथ में एक छोटा सा केक और एक गुलाब था।
नेहा हैरान रह गई।
“तुम्हें याद था?” उसने खुशी से पूछा।
रोहन मुस्कुराया।
“कैसे भूल सकता हूँ? आज हमारी शादी की सालगिरह है।”
नेहा की आँखें चमक उठीं।
रोहन धीरे से बोला—
“आज ऑफिस में बहुत काम था। फिर मैं केक लेने गया… इसलिए देर हो गई।”
नेहा भावुक हो गई।
“मुझे लगा था… तुम्हें याद ही नहीं।”
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तुम्हें भूलना मेरे बस में ही नहीं है।”
फिर उसने केक टेबल पर रखा।
दोनों ने साथ मिलकर केक काटा।
कमला देवी और मोहन जी भी कमरे से बाहर आ गए।
सबने मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया।
रोहन ने नेहा से कहा—
“गिफ्ट तो बड़ा नहीं है… पर दिल से है।”
नेहा मुस्कुराकर बोली—
“मुझे किसी महंगे गिफ्ट की जरूरत नहीं। तुम्हारा प्यार ही सबसे बड़ा उपहार है।”
रोहन ने प्यार से कहा—
“सच में?”
नेहा बोली—
“हाँ… क्योंकि रिश्ते गिफ्ट से नहीं, समझ से चलते हैं।”
कमला देवी मुस्कुराते हुए बोलीं—
“बिलकुल सही कहा तुमने।”
उस रात घर में बहुत खुशी का माहौल था।
दोस्तों,
रिश्तों में सबसे जरूरी चीज़ प्यार और समझ होती है।
अगर नेहा बिना सोचे-समझे रोहन से नाराज़ हो जाती, तो शायद उनका खूबसूरत दिन खराब हो जाता।
लेकिन उसने धैर्य और भरोसा रखा।
और यही भरोसा उनके रिश्ते को और मजबूत बना गया।
क्योंकि सच्चे रिश्तों में सबसे बड़ा उपहार होता है — एक-दूसरे को समझना।

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