बेटी का हक और जिम्मेदारी

Woman standing outside a room overhearing family discussion


सुबह का समय था।

खिड़की से हल्की धूप कमरे में आ रही थी और रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।


रश्मि जल्दी-जल्दी रसोई में काम कर रही थी। गैस पर चाय चढ़ी थी और साथ में नाश्ते की तैयारी भी चल रही थी।


तभी उसके पति विकास कमरे से बाहर आए और बोले,

“अरे रश्मि, आज इतनी जल्दी-जल्दी क्या कर रही हो?”


रश्मि बोली,

“विकास, मैं सोच रही थी कि इस बार होली से पहले एक-दो दिन के लिए मायके हो आऊँ। मम्मी की तबीयत भी ठीक नहीं रहती और पापा भी अब पहले जैसे मजबूत नहीं रहे। सोचा थोड़ा उनके पास रह लूँ।”


विकास का चेहरा तुरंत बदल गया।


वह बोला,

“तुम्हें हर वक्त मायके की ही पड़ी रहती है। यहाँ घर में भी तो काम होता है। और फिर होली पर मेरी बहन रचना भी आने वाली है। ऐसे में तुम मायके चली जाओगी तो अच्छा लगेगा क्या?”


रश्मि धीरे से बोली,

“मैं त्योहार पर नहीं जाऊँगी। बस दो दिन पहले हो आऊँगी और वापस आ जाऊँगी। यहाँ का सारा काम करके जाऊँगी।”


विकास गुस्से में बोला,

“मुझे ये सब बातें मत समझाओ। तुम्हारे भाई तो हैं नहीं, तो तुम्हारे माता-पिता का सारा बोझ क्या हम ही उठाएँगे?”


रश्मि चुप हो गई।


असल में रश्मि अपने माता-पिता की इकलौती बेटी थी।

उन्होंने उसे पढ़ा-लिखाकर नौकरी करने लायक बनाया था।


लेकिन शादी के बाद उसे अपने ही माता-पिता के पास जाने के लिए भी कई बार अनुमति लेनी पड़ती थी।



समय बीतता गया...


होली नजदीक आ रही थी।


रश्मि कई बार विकास से मायके जाने की बात करती, लेकिन हर बार विकास कोई न कोई बहाना बना देता।


एक दिन रात को रश्मि रसोई में काम खत्म करके पानी रखने जा रही थी।


तभी उसे ड्राइंग रूम से आवाजें सुनाई दीं।


विकास, उसकी माँ सरला जी और छोटी बहन रचना बात कर रहे थे।


रचना बोली,

“भैया, मैंने सुना है कि भाभी के पापा ने अपना पुराना घर बेच दिया है और नया फ्लैट ले लिया है।”


सरला जी बोलीं,

“हाँ, मैंने भी यही सुना है। और वो घर तो काफी बड़ा था। जरूर अच्छा पैसा मिला होगा।”


विकास बोला,

“लेकिन रश्मि ने मुझे कुछ नहीं बताया।”


रचना हँसते हुए बोली,

“भैया, अगर पैसा आया है तो भाभी को भी हिस्सा मिला होगा। आखिर वो इकलौती बेटी हैं।”


सरला जी बोलीं,

“अरे बेटा, तुम भी कितने भोले हो। ये सब बातें पूछनी पड़ती हैं। ऐसे ही थोड़ी ना कोई बता देता है।”


फिर धीरे से बोलीं,

“देखो, अगर सच में पैसे मिले हैं तो हमें भी तो फायदा होना चाहिए। घर की मरम्मत भी करवानी है और तुम्हें अपना बिजनेस भी शुरू करना है।”


विकास सोच में पड़ गया।


वह बोला,

“सही कह रही हो माँ। मैं रश्मि से बात करता हूँ।”


दरवाजे के पीछे खड़ी रश्मि ये सब सुन रही थी।


उसकी आँखों में आँसू आ गए।


थोड़ी देर बाद...


रश्मि चुपचाप अपने कमरे में जाकर बैठ गई।


कुछ देर बाद विकास कमरे में आया।


वह अचानक नरमी से बोला,

“रश्मि, तुम कह रही थी ना कि तुम्हें मायके जाना है? चलो, इस बार मैं भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।”


रश्मि ने उसकी तरफ देखा और बोली,

“अचानक इतनी मेहरबानी कैसे हो गई?”


विकास बोला,

“अरे, मैं भी तो देखूँ कि तुम्हारे मम्मी-पापा कैसे हैं। आखिर मैं उनका दामाद हूँ।”


रश्मि समझ गई कि असली बात क्या है।


वह बोली,

“आपको मेरी चिंता नहीं, बल्कि मेरे मायके की संपत्ति की चिंता है।”


विकास झल्लाकर बोला,

“तो क्या गलत है? आखिर तुम उनकी बेटी हो। अगर उन्होंने घर बेचा है तो तुम्हारा भी हिस्सा बनता है।”


रश्मि की आँखों में आँसू आ गए।


वह बोली,

“जब मेरे पापा को पिछले साल स्ट्रोक आया था, तब क्या आपने एक बार भी पूछा था कि इलाज के पैसे कहाँ से आए?”


विकास चुप हो गया।


रश्मि बोली,

“तब मेरे मामा के बेटे अरुण ने सब संभाला था। अस्पताल के चक्कर लगाए, पैसे जुटाए और मम्मी-पापा की देखभाल की।”


विकास बोला,

“तो क्या हुआ? वो तो रिश्तेदार है।”


रश्मि बोली,

“रिश्तेदार नहीं, इंसानियत निभा रहा था। और आप? आप तो बस शाम को थोड़ी देर के लिए आकर चले जाते थे।”



अगले दिन...


सुबह सरला जी ने रश्मि को अपने कमरे में बुलाया।


वह मीठे स्वर में बोलीं,

“बहू, सुना है तुम्हारे पापा ने घर बेच दिया है। अच्छा पैसा मिला होगा।”


रश्मि बोली,

“हाँ मम्मी जी, घर बेच दिया था।”


सरला जी बोलीं,

“तो उन्होंने तुम्हें कितना दिया?”


रश्मि मुस्कुराई।


फिर बोली,

“उन्होंने मुझे कुछ नहीं दिया।”


कमरे में सब लोग चौंक गए।


विकास बोला,

“क्या मतलब? तुम उनकी इकलौती बेटी हो।”


रश्मि बोली,

“पापा ने पहले अस्पताल का कर्ज चुकाया। फिर अपने रहने के लिए एक छोटा सा फ्लैट खरीद लिया।”


विकास बोला,

“और बाकी पैसे?”


रश्मि बोली,

“बाकी पैसे मैंने पापा से कहकर अरुण के नाम करवा दिए।”


सब हैरान रह गए।


सरला जी बोलीं,

“तुम पागल हो गई हो क्या?”


रश्मि शांत स्वर में बोली,


“नहीं मम्मी जी।

जो इंसान मेरे माता-पिता की जिम्मेदारी निभा रहा है, असली हक उसी का बनता है।”


विकास गुस्से में बोला,

“तुमने इतना बड़ा फैसला मुझसे पूछे बिना कैसे कर लिया?”


रश्मि बोली,


“जब जिम्मेदारी निभाने की बात आती है, तब कोई आगे नहीं आता।

लेकिन हक लेने की बात आए, तो सब तैयार हो जाते हैं।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


रश्मि आगे बोली,


“मेरे माता-पिता ने मुझे इतना पढ़ाया-लिखाया है कि मैं अपने दम पर जी सकती हूँ।

मुझे उनकी संपत्ति नहीं चाहिए, बस उनका आशीर्वाद चाहिए।”


इतना कहकर रश्मि वहाँ से चली गई।


पीछे खड़े लालची रिश्तेदारों के सपने उसी पल टूट गए।





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