दो बहुओं की सच्ची ताकत
सुबह का समय था।
आंगन में धूप धीरे-धीरे फैल रही थी और रसोई से तड़के की खुशबू पूरे घर में आ रही थी।
सरला देवी अपने कमरे के बाहर चारपाई पर बैठी चाय पी रही थीं। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह सख्ती थी। घर में उनके दो बेटे और दो बहुएं रहती थीं—बड़ी बहू कविता और छोटी बहू निशा।
दोनों बहुएं अपने-अपने काम में अच्छी थीं, लेकिन उनके बीच कभी नहीं बनती थी।
और सच कहें तो इसकी वजह भी सरला देवी ही थीं।
सरला देवी को लगता था कि अगर बहुएं आपस में मिल जाएँगी, तो घर में उनकी चलना कम हो जाएगा। इसलिए वो हमेशा दोनों के बीच दूरी बनाए रखती थीं।
कभी वो कविता से कहतीं,
“देखा तुमने निशा को? सारा दिन फोन में लगी रहती है, घर का काम तो जैसे आता ही नहीं।”
और कभी निशा से कहतीं,
“तुम्हारी जेठानी तो बस तुम्हें नीचा दिखाने में लगी रहती है। अपने आप को बहुत समझती है।”
धीरे-धीरे दोनों बहुओं के मन में एक-दूसरे के लिए शक और नाराज़गी भर गई।
घर में अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा हो जाता था।
कभी रसोई को लेकर, कभी बच्चों को लेकर, तो कभी पैसों को लेकर।
सरला देवी दूर बैठकर सब देखतीं और मन ही मन खुश होतीं कि घर की बागडोर अभी भी उन्हीं के हाथ में है।
एक दिन दोपहर के समय अचानक सरला देवी की तबीयत खराब हो गई।
उन्हें तेज चक्कर आने लगे और वो आंगन में ही गिर पड़ीं।
घर में उस समय सिर्फ कविता और निशा थीं।
दोनों दौड़कर उनके पास पहुँचीं।
कविता घबरा गई और बोली,
“निशा जल्दी से पानी लाओ।”
निशा तुरंत दौड़ी और पानी लेकर आई।
दोनों ने मिलकर सरला देवी को संभाला और तुरंत अस्पताल ले गईं।
डॉक्टर ने जांच के बाद बताया कि उनका ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा बढ़ गया था। अगर थोड़ी देर और हो जाती, तो हालत और बिगड़ सकती थी।
यह सुनकर दोनों बहुओं के चेहरे उतर गए।
कविता ने निशा की तरफ देखा और धीरे से बोली,
“अच्छा हुआ हम दोनों घर पर थीं।”
निशा ने भी सिर हिलाया।
उस दिन पहली बार दोनों ने बिना किसी तकरार के मिलकर घर संभाला।
अस्पताल से घर आने के बाद सरला देवी कुछ दिनों तक आराम कर रही थीं।
इस दौरान कविता और निशा ने पूरे घर की जिम्मेदारी मिलकर संभाली।
सुबह का नाश्ता, बच्चों की पढ़ाई, बाजार का काम, दवाइयाँ—सब कुछ दोनों साथ-साथ करतीं।
धीरे-धीरे उनके बीच बातचीत भी बढ़ने लगी।
एक दिन शाम को दोनों रसोई में खाना बना रही थीं।
निशा ने हिचकते हुए कहा,
“दीदी, सच बताऊँ… मुझे हमेशा लगता था कि आप मुझे पसंद नहीं करतीं।”
कविता थोड़ा मुस्कुराई।
“मुझे भी यही लगता था कि तुम मुझे नीचा दिखाना चाहती हो।”
दोनों कुछ पल चुप रहीं… फिर अचानक दोनों हँस पड़ीं।
उन्हें समझ में आ गया कि असली वजह कुछ और थी।
कुछ दिनों बाद सरला देवी पूरी तरह ठीक हो गईं।
एक सुबह उन्होंने देखा कि रसोई में कविता और निशा हँसते-हँसते काम कर रही हैं।
दोनों मिलकर नाश्ता बना रही थीं और बच्चे भी पास में खेल रहे थे।
सरला देवी यह देखकर हैरान रह गईं।
उन्होंने मन ही मन सोचा,
“ये दोनों अचानक इतनी अच्छी दोस्त कैसे बन गईं?”
उन्हें समझ आ गया कि अब उनकी पुरानी चालें काम नहीं करेंगी।
लेकिन इस बार उनके दिल में थोड़ा सा पछतावा भी था।
उन्होंने धीरे से दोनों बहुओं को आवाज दी।
“कविता… निशा… जरा इधर आओ।”
दोनों उनके पास आकर खड़ी हो गईं।
सरला देवी ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
“शायद मुझसे गलती हुई है। मैंने ही तुम दोनों के बीच दूरी बढ़ाई थी। लेकिन आज तुम्हें साथ देखकर मुझे बहुत खुशी हो रही है।”
दोनों बहुओं ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
फिर कविता बोली,
“माँजी, घर तभी अच्छा लगता है जब सब मिलकर रहें।”
निशा ने भी मुस्कुराकर कहा,
“अब हम दोनों मिलकर ही घर संभालेंगे।”
सरला देवी की आँखें भर आईं।
उन्हें पहली बार समझ में आया कि घर की असली ताकत किसी एक के राज करने में नहीं, बल्कि सबके साथ रहने में होती है।
सीख:
घर की शांति इस बात पर निर्भर करती है कि घर के लोग एक-दूसरे को समझें और साथ दें।
अगर घर की महिलाएँ आपस में एक हो जाएँ, तो कोई भी समस्या उस घर को कमजोर नहीं कर सकती।

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