रिश्तों का सच
शाम का समय था। आसमान में हल्की सुनहरी रोशनी फैली हुई थी, लेकिन रिया के घर के अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी।
रिया सोफे पर चुपचाप बैठी थी और सामने दीवार को देख रही थी। उसके मन में बहुत कुछ चल रहा था। तभी दरवाज़ा खुला और उसके पति अमित अंदर आए।
“क्या हुआ? आज इतनी चुप क्यों हो?” अमित ने बैग रखते हुए पूछा।
रिया ने हल्की मुस्कान देने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखें सब कुछ बयां कर रही थीं।
“आज मम्मी-पापा का फोन आया था…” उसने धीरे से कहा।
अमित समझ गया कि बात कुछ गंभीर है।
“क्या कहा उन्होंने?”
रिया ने गहरी सांस ली—
“भैया ने नया घर खरीदा है… बहुत बड़ा, बहुत सुंदर… और मम्मी-पापा बहुत खुश थे।”
अमित ने मुस्कुराते हुए कहा—
“अरे, ये तो अच्छी बात है। तुम्हें भी खुश होना चाहिए।”
रिया ने उसकी तरफ देखा—
“मैं खुश हूँ… लेकिन एक बात समझ नहीं आती…”
“क्या?” अमित ने पूछा।
रिया की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई—
“जब हमने अपना घर खरीदा था… तब मम्मी-पापा खुश क्यों नहीं हुए थे?”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
तीन साल पहले…
जब रिया और अमित ने अपनी मेहनत से छोटा-सा फ्लैट खरीदा था, उस दिन वो दोनों बहुत खुश थे।
रिया ने सबसे पहले अपने माता-पिता को फोन किया था—
“मम्मी! हमने अपना घर ले लिया!”
उसे उम्मीद थी कि उधर से खुशी की आवाज़ आएगी… लेकिन…
“अच्छा…? इतनी जल्दी क्या थी अलग होने की?” उसकी माँ ने ठंडे स्वर में कहा।
रिया चुप रह गई।
पिता ने भी कहा—
“घर तो हमारा भी था… वहीं रह लेते। अब अलग घर लेकर क्या साबित करना चाहते हो?”
उस दिन रिया बहुत रोई थी।
वर्तमान में…
रिया ने अमित से कहा—
“जब बेटा घर लेता है तो वो ‘काबिल’ होता है… और जब बेटी घर लेती है तो वो ‘अलग होने वाली’ बन जाती है… ऐसा क्यों?”
अमित के पास इसका कोई जवाब नहीं था।
कुछ दिन बाद…
रिया के माता-पिता ने उसे और अमित को घर बुलाया।
भैया के नए घर की खुशी में एक छोटा-सा कार्यक्रम रखा गया था।
रिया और अमित समय पर पहुँच गए।
घर बहुत सुंदर था। सब लोग तारीफ कर रहे थे—
“वाह! कितना शानदार घर है!”
“बेटा हो तो ऐसा हो!”
रिया चुपचाप सब सुन रही थी।
उसकी माँ बार-बार कह रही थीं—
“हमारे बेटे ने अपनी मेहनत से ये सब किया है।”
रिया के दिल में हल्की-सी चुभन हो रही थी… लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद, जब सब लोग जा चुके थे, रिया ने हिम्मत जुटाई।
“मम्मी… मुझे आपसे कुछ पूछना है।”
“क्या?” माँ ने कहा।
रिया ने सीधे उनकी आँखों में देखते हुए कहा—
“क्या मैं आपकी अपनी संतान नहीं हूँ?”
माँ और पापा दोनों चौंक गए।
“ये कैसी बात कर रही हो?” पिता ने कहा।
रिया की आँखों में आँसू आ गए—
“भैया ने घर लिया तो आप गर्व से भर गए… और जब मैंने लिया था, तब आपको लगा कि मैं आपसे दूर हो रही हूँ…”
“क्या बेटा और बेटी के लिए आपके मन में अलग-अलग भाव हैं?”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
जवाब जो किसी के पास नहीं था
माँ कुछ कहना चाहती थीं… लेकिन शब्द नहीं मिले।
पिता ने नजरें झुका लीं।
रिया ने फिर कहा—
“मैंने घर इसलिए नहीं लिया था कि मैं आपसे दूर हो जाऊँ…
मैंने घर इसलिए लिया था ताकि मैं भी अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ…
ताकि आप मुझ पर गर्व कर सकें…”
उसकी आवाज़ काँप रही थी—
“लेकिन आपने तो मुझे ही गलत समझ लिया…”
उस दिन पहली बार रिया के माता-पिता को एहसास हुआ कि उन्होंने अनजाने में कितना बड़ा फर्क किया है।
बेटा और बेटी… दोनों ही उनकी संतान थे…
लेकिन उनके व्यवहार ने दोनों के बीच दीवार खड़ी कर दी थी।
माँ धीरे-धीरे रिया के पास आईं और उसका हाथ पकड़ लिया—
“हमें माफ कर दो… हम सच में समझ नहीं पाए…”
पिता की आँखों में भी नमी थी—
“तुमने जो किया, वो गलत नहीं था… हमें तुम पर गर्व होना चाहिए था…”
रिया ने कुछ नहीं कहा… बस चुपचाप अपनी माँ को गले लगा लिया।
सीख:
कभी-कभी हम अपने ही रिश्तों में फर्क कर देते हैं…
बिना ये समझे कि हमारे छोटे-छोटे शब्द किसी के दिल को कितना चोट पहुँचा सकते हैं।
सच्चा रिश्ता वही होता है, जहाँ बेटा और बेटी में कोई फर्क न हो…
जहाँ प्यार बराबर हो… और सम्मान भी।

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