समझ का उजाला

 

Elderly Indian husband helping his wife in the kitchen while their son watches, showing love, respect and family support inside a traditional Indian home.


दिन की शुरुआत हो चुकी थी।

खिड़की से आती धूप कमरे की दीवारों पर फैल रही थी और घर में सुबह की हलचल शुरू हो गई थी।


बरामदे में चारपाई पर बैठे हुए गुप्ता जी अख़बार पढ़ रहे थे। उनकी पत्नी शारदा देवी पास में बैठकर सब्ज़ी काट रही थीं।


थोड़ी देर बाद शारदा देवी ने कमर पकड़ते हुए कहा,

“अरे सुनते हो जी, आज कमर में बहुत दर्द हो रहा है। लगता है काम ही नहीं होगा मुझसे।”


गुप्ता जी तुरंत बोले,

“तो मत करो काम। थोड़ा आराम कर लो। बाकी काम मैं देख लेता हूँ।”


शारदा देवी बोलीं,

“आप क्या-क्या करोगे? उम्र भी तो हो गई है।”


गुप्ता जी हँसते हुए बोले,

“अरे जब शादी की थी तब भी तो साथ निभाने का वादा किया था। अब अगर तुम बीमार हो तो क्या मैं हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहूँ?”


इतना कहकर वह रसोई में चले गए और चाय बनाने लगे।


तभी उनका बेटा रोहित ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था। वह रसोई के पास से गुज़रा तो देखा कि उसके पापा चाय बना रहे हैं।


रोहित ने हैरानी से पूछा,

“पापा, आप रसोई में?”


गुप्ता जी बोले,

“हाँ बेटा, तुम्हारी माँ की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आज मैंने सोचा कि थोड़ा काम मैं कर लूँ।”


रोहित मुस्कुराया और बोला,

“बहुत अच्छा किया आपने।”


कुछ देर बाद तीनों लोग साथ बैठकर चाय पीने लगे।


चाय पीते-पीते शारदा देवी बोलीं,

“देखना बेटा, जब तुम्हारी शादी होगी ना, तब बहू घर के सारे काम संभाल लेगी। हमें भी थोड़ा आराम मिल जाएगा।”


रोहित हल्का सा मुस्कुरा दिया, लेकिन कुछ बोला नहीं।



समय बीतता गया।


कुछ महीनों बाद रोहित की शादी पूजा से हो गई। पूजा पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी। शादी के बाद उसने पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली।


सुबह जल्दी उठना, सबके लिए नाश्ता बनाना, घर की सफाई करना—वह सब कुछ बड़े मन से करती थी।


शुरू-शुरू में सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।


लेकिन धीरे-धीरे शारदा देवी छोटी-छोटी बातों पर पूजा को टोकने लगीं।


एक दिन उन्होंने कहा,

“पूजा, ये दाल इतनी पतली क्यों बनाई है? पहले तो घर में ऐसी दाल कभी नहीं बनती थी।”


पूजा ने धीरे से कहा,

“मम्मी जी, रोहित को ऐसी ही दाल पसंद है।”


शारदा देवी बोलीं,

“अच्छा! अब तुम्हें रोहित की पसंद ज़्यादा पता है?”


पूजा चुप हो गई।



एक दिन रोहित ऑफिस से लौटा तो देखा कि पूजा रसोई में काम कर रही है और उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही।


रोहित ने पूछा,

“क्या हुआ पूजा? तुम ठीक तो हो?”


पूजा बोली,

“थोड़ा बुखार है, लेकिन काम तो करना ही पड़ेगा।”


रोहित ने तुरंत कहा,

“तुम जाओ और आराम करो। बाकी काम मैं कर लूंगा।”


इतना कहकर रोहित रसोई में लग गया।


थोड़ी देर बाद शारदा देवी ने देखा कि रोहित खाना बना रहा है।


वह गुस्से में बोलीं,

“ये क्या कर रहे हो तुम? बहू घर में है और तुम रसोई में?”


रोहित बोला,

“माँ, पूजा की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए मैंने सोचा कि आज मैं काम कर लूँ।”


शारदा देवी बोलीं,

“बहू अगर थोड़ा बीमार हो गई तो क्या काम बंद हो जाएगा? हमारे ज़माने में तो बुखार में भी काम करना पड़ता था।”


रोहित चुप रहा।


लेकिन उसके मन में कई बातें चलने लगीं।



उस रात रोहित को बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी।

वह बिस्तर पर लेटा छत को देख रहा था और उसके मन में कई तरह के विचार चल रहे थे।


अचानक उसे सुबह की वह बात याद आ गई, जब उसने अपने पापा को माँ की मदद करते हुए देखा था। उस समय पापा ने मुस्कुराते हुए कहा था—


“जब पत्नी जीवन की साथी होती है, तो उसे तकलीफ़ में अकेला कैसे छोड़ सकते हैं?”


पापा की वही बात बार-बार रोहित के मन में गूंज रही थी।

वह देर तक इन्हीं खयालों में खोया रहा और सोचता रहा कि एक सच्चा जीवनसाथी वही होता है जो मुश्किल समय में अपने साथी का साथ दे।



अगले दिन सुबह पूजा की तबियत और खराब हो गई।


रोहित ने तुरंत डॉक्टर को बुलाया।


डॉक्टर ने कहा,

“इन्हें आराम की बहुत ज़रूरत है।”


रोहित ने फैसला किया कि कुछ दिनों के लिए पूजा को उसके मायके भेज देगा ताकि वह ठीक से आराम कर सके।


जब शारदा देवी को ये बात पता चली तो वह नाराज हो गईं।


उन्होंने कहा,

“अरे वाह! अभी तो शादी को कुछ ही महीने हुए हैं और बहू मायके चली जाएगी?”


रोहित शांत स्वर में बोला,

“माँ, उसकी तबियत ज़्यादा खराब है। उसे आराम की जरूरत है।”



कुछ दिनों बाद पूजा की तबीयत पूरी तरह ठीक हो गई।


एक दिन रोहित खुद उसे लेने उसके मायके गया और प्यार से उसे वापस अपने घर ले आया।


जब रोहित और पूजा घर के दरवाज़े पर पहुँचे, तो शारदा देवी और गुप्ता जी दोनों उन्हें देखकर कुछ पल के लिए चुप हो गए। घर में एक अजीब सी खामोशी फैल गई।


तभी रोहित ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,

“माँ, पापा… पूजा मेरी पत्नी है। जैसे पापा ने हमेशा माँ का साथ निभाया है, वैसे ही मेरा भी फर्ज़ है कि मैं अपनी पत्नी का साथ दूँ। जब जीवन साथ बिताना है, तो सुख-दुख में साथ खड़ा रहना भी जरूरी है।”


रोहित की बात सुनकर कुछ देर तक घर में सन्नाटा छाया रहा।


फिर गुप्ता जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा,

“बेटा, तुम बिल्कुल सही कह रहे हो। पति-पत्नी का रिश्ता ही ऐसा होता है, जिसमें एक-दूसरे का साथ सबसे ज्यादा जरूरी होता है।”


यह सुनकर शारदा देवी भी धीरे-धीरे शांत हो गईं। अब उन्हें भी महसूस होने लगा था कि रोहित की बात गलत नहीं है। समय के साथ वह भी समझने लगीं कि घर की खुशियाँ तभी बनी रहती हैं, जब परिवार के लोग एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और सम्मान दें।



समय बीतता गया।


अब घर का माहौल पहले से बेहतर हो गया था।


पूजा भी सबका ध्यान रखती थी और रोहित भी हर काम में उसका साथ देता था।


एक दिन शाम को सब लोग आँगन में बैठे थे।


शारदा देवी ने मुस्कुराते हुए कहा,

“सच कहूँ तो रोहित, अब समझ में आया कि घर तभी खुश रहता है जब सब एक-दूसरे का साथ दें।”


रोहित और पूजा एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।


आँगन में ठंडी हवा चल रही थी और घर में एक नई समझ और प्यार की शुरुआत हो चुकी थी।




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