रिश्तों की असली कीमत
सुबह का समय था।
आँगन में हल्की-हल्की धूप फैल रही थी। तुलसी के पास रखा दिया अभी भी धीमे-धीमे जल रहा था और रसोई से चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।
सावित्री देवी बरामदे में बैठी थीं। उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी, जिसमें वह शादी के खर्चों का हिसाब लगाते-लगाते बार-बार गहरी सोच में डूब जाती थीं। सामने मेज पर शादी के कार्ड रखे थे।
उनकी बेटी पायल की शादी अगले महीने तय हुई थी।
घर में खुशी का माहौल होना चाहिए था, लेकिन सावित्री देवी के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
तभी उनके पति रामनाथ जी बाहर से सब्ज़ी लेकर घर आए।
उन्होंने सावित्री देवी के चेहरे की ओर देखा और तुरंत समझ गए कि वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई हैं।
रामनाथ जी ने मुस्कुराते हुए पूछा —
“क्या बात है सावित्री? सुबह-सुबह इतनी गहरी सोच में क्यों डूबी हो?”
सावित्री देवी ने धीरे से डायरी बंद की और बोलीं —
“सोच रही हूं पायल की शादी कैसे करेंगे…?
हमारी सारी जमा-पूंजी तो बड़े बेटे रवि की पढ़ाई और उसके शहर में घर बसाने में लग गई। अब हाथ में ज्यादा कुछ बचा ही नहीं है।”
रामनाथ जी ने पास बैठते हुए कहा —
“जब हमने पायल को जन्म दिया था तब क्या यह सोचकर दिया था कि उसकी शादी कैसे होगी? भगवान जब बेटी देता है, तो उसके विवाह की राह भी बना देता है।”
सावित्री देवी ने हल्की सांस लेते हुए कहा —
“मैं यह सब समझती हूं… पर फिर भी चिंता तो होती ही है।
आजकल छोटी सी शादी में भी कितना खर्च हो जाता है।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर सावित्री देवी बोलीं —
“सोच रही हूं रवि को फोन करके बता दूं। आखिर बहन की शादी है… थोड़ा बहुत हाथ बटा देगा तो सहारा मिल जाएगा।”
रामनाथ जी ने धीरे से कहा —
“ठीक है… बता दो। पर उससे उम्मीद ज्यादा मत रखना।”
सावित्री देवी ने फोन उठाया और रवि का नंबर मिलाया।
फोन रवि की पत्नी सोनल ने उठाया।
“नमस्ते मम्मी जी… कैसी हैं आप?”
“मैं ठीक हूं बहू… तुम कैसी हो?”
“हम भी ठीक हैं।”
सावित्री देवी ने खुशी से कहा —
“बहू… पायल की शादी अगले महीने तय हो गई है। सोचा था तुम लोग थोड़ा पहले आ जाओगे तो तैयारी में मदद मिल जाएगी।”
सोनल कुछ पल चुप रही, फिर बोली —
“मम्मी जी… अभी तो यहां बहुत काम है। रवि भी ऑफिस में बहुत व्यस्त रहता है। और यहां खर्च भी बहुत है… देखते हैं, समय मिला तो आ जाएंगे।”
इतना कहकर उसने फोन जल्दी से रख दिया।
सावित्री देवी कुछ देर तक फोन को देखती रहीं।
उनके चेहरे की खुशी धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।
रामनाथ जी सब समझ गए थे।
उन्होंने धीरे से कहा —
“क्या हुआ?”
सावित्री देवी ने धीमे स्वर में कहा —
“कुछ नहीं… बस वही… काम बहुत है।”
रात को रवि का फोन आया।
“मां कैसी हो?”
“ठीक हूं बेटा।”
रवि बोला —
“मां… सोनल ने बताया कि पायल की शादी तय हो गई है। बहुत अच्छा हुआ।”
सावित्री देवी ने हिम्मत करके कहा —
“बेटा… सोचा था तुम लोग थोड़ा पहले आ जाओगे तो मदद हो जाती।”
रवि थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला —
“मां… यहां बहुत खर्च है। घर का लोन भी चल रहा है। शायद हम शादी के एक दिन पहले ही आ पाएंगे।”
सावित्री देवी ने बस इतना कहा —
“ठीक है बेटा।”
फोन कट गया।
उस रात सावित्री देवी देर तक सो नहीं पाईं।
उन्हें बार-बार वही दिन याद आ रहा था जब रवि छोटा था।
कैसे वह उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत पूरी करती थीं।
कभी अपनी साड़ी नहीं खरीदी, लेकिन बेटे की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने दी।
सुबह उन्होंने रामनाथ जी को सारी बात बता दी।
रामनाथ जी ने शांत स्वर में कहा —
“कोई बात नहीं। हम जितना कर सकते हैं, उतना करेंगे। बेटी की शादी दिखावे से नहीं, प्यार से होती है।”
इसके बाद दोनों ने खुद ही सारी तैयारी शुरू कर दी।
पड़ोसियों ने भी खूब मदद की।
कोई कुर्सियाँ लेकर आया।
कोई बर्तन दे गया।
तो किसी ने मिठाई बनाने में हाथ बंटाया।
पायल यह सब देख रही थी।
एक दिन उसने मां से कहा —
“मां… भैया नहीं आएंगे क्या?”
सावित्री देवी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा —
“आएंगे बेटा… क्यों नहीं आएंगे।”
लेकिन उनके दिल में एक डर था।
आखिरकार शादी का दिन आ गया।
पूरा घर रोशनी से जगमगा रहा था।
पायल दुल्हन बनकर बहुत सुंदर लग रही थी।
पर उसकी आंखें बार-बार दरवाजे की ओर उठ जातीं।
शाम हो गई…
रात हो गई…
लेकिन रवि और सोनल नहीं आए।
आखिरकार बिना उनके ही शादी की रस्में शुरू हो गईं।
शादी सादगी से लेकिन बहुत प्यार से संपन्न हो गई।
पूरा मोहल्ला खुश था।
कुछ दिन बाद अचानक रवि का फोन आया।
“मां… कैसी हो?”
सावित्री देवी ने शांत स्वर में कहा —
“मैं ठीक हूं बेटा… तुम बताओ?”
रवि बोला —
“मां… सोनल की तबीयत ठीक नहीं रहती। वह मां बनने वाली है। सोच रहा था आप कुछ दिनों के लिए यहां आ जाओ।”
फोन स्पीकर पर था।
रामनाथ जी ने फोन अपने हाथ में लिया।
उन्होंने धीरे लेकिन दृढ़ आवाज में कहा —
“बेटा… जब तुम्हारी बहन की शादी थी तब तुम्हारे पास समय नहीं था। अब हमें बुला रहे हो?”
रवि चुप हो गया।
रामनाथ जी आगे बोले —
“हमने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा। बस इतना चाहा था कि बहन की खुशी में साथ खड़े रहो।”
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने कहा —
“बेटा… जिंदगी में पैसा जरूरी है, लेकिन रिश्तों से ज्यादा नहीं। जब रिश्ते साथ होते हैं तो मुश्किल भी आसान लगती है।”
इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया।
सावित्री देवी की आंखों में आंसू थे।
रामनाथ जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा —
“दुख मत करो। हमने अपना फर्ज निभाया है। अब भगवान उसे समझ देगा।”
दोस्तों,
आज के समय में लोग पैसों और सुविधाओं में इतने उलझ जाते हैं कि रिश्तों की असली कीमत भूल जाते हैं।
याद रखिए —
पैसा जीवन आसान बना सकता है,
लेकिन रिश्ते ही जीवन को खुशहाल बनाते हैं।

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