दिल का बोझ
आँगन में रखे पुराने नीम के पेड़ की छाया तले चारपाई पड़ी थी। उसी पर लेटी थीं रुक्मिणी देवी। चेहरे पर थकान और आँखों में एक अजीब-सी बेचैनी थी। पास ही बैठी उनकी पोती आर्या बार-बार उनका माथा छूकर देख रही थी।
“दादी, आपको फिर से बुखार लग रहा है,” आर्या चिंतित होकर बोली।
रुक्मिणी देवी ने धीरे से आँखें खोलीं और बोलीं,
“बुखार तो ठीक हो जाएगा बेटा… पर दिल का बोझ कैसे उतरेगा?”
आर्या को कुछ समझ नहीं आया। तभी दरवाज़े पर आहट हुई। उसकी माँ रीमा अंदर आई। हाथ में दवा और गर्म पानी का गिलास था।
रीमा ने बिना कुछ कहे दवा आगे बढ़ाई।
“माँ जी, ये दवा ले लीजिए।”
रुक्मिणी देवी ने मुँह फेर लिया।
“रहने दे… मुझे तेरे हाथ से कुछ नहीं लेना।”
आर्या को ये बात बहुत बुरी लगी। वह बोली,
“दादी, माँ आपका इतना ख्याल रखती हैं। फिर आप ऐसा क्यों बोलती हैं?”
रुक्मिणी देवी चुप रहीं। कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
रीमा ने शांत स्वर में कहा,
“ठीक है माँ जी, जब मन करे तब दवा ले लेना।”
इतना कहकर वह बाहर चली गई।
आर्या भी पीछे-पीछे आँगन में आई और बोली,
“माँ, दादी आपके साथ ऐसा क्यों करती हैं? आप फिर भी उनका ध्यान क्यों रखती हैं?”
रीमा कुछ देर तक नीम के पेड़ को देखती रही। फिर बोली,
“हर रिश्ते के पीछे एक कहानी होती है बेटा… और कभी-कभी वो कहानी बहुत दर्द देती है।”
आर्या ने उत्सुक होकर पूछा,
“कैसी कहानी?”
रीमा धीरे-धीरे पुरानी बातों में खोने लगी।
“जब मेरी शादी इस घर में हुई थी, तब सब कुछ ठीक था। तुम्हारे पापा अमित बहुत अच्छे इंसान थे। लेकिन तुम्हारी बुआ सीमा को ये पसंद नहीं था कि माँ जी मुझे ज्यादा मान दें।
धीरे-धीरे उसने माँ जी के कान भरने शुरू कर दिए।”
आर्या ध्यान से सुन रही थी।
रीमा बोली,
“जब तुम पैदा हुई थीं, तब सीमा ने सबसे पहले यही कहा था—
‘अरे माँ, पहली संतान ही लड़की हो गई। अब तो इस घर की किस्मत ही खराब है।’”
आर्या को सुनकर गुस्सा आया।
“इतनी बुरी बात!”
रीमा मुस्कुरा दी।
“माँ जी भी उस समय पुराने विचारों में थीं। उन्होंने भी मुझे बहुत ताने दिए। लेकिन तुम्हारे पापा हमेशा मेरे साथ खड़े रहे।”
कुछ साल बीत गए। घर में छोटी-मोटी बातें होती रहीं। लेकिन असली तूफ़ान तब आया जब तुम्हारे दादा जी की जमीन बेचकर कुछ पैसे घर में आए।
सीमा की नजर उन्हीं पैसों पर थी।
एक दिन उसने माँ जी से कहा—
“माँ, भैया और भाभी सारा पैसा अपने पास रख लेंगे। आप सब कुछ मेरे नाम कर दो।”
तुम्हारे पापा ने ये बात सुन ली।
उन्होंने माँ जी से कहा—
“माँ, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस इतना भरोसा रखिए कि हम आपका बुरा कभी नहीं सोचेंगे।”
माँ जी कुछ देर चुप रहीं। लेकिन सीमा को ये बात बिल्कुल पसंद नहीं आई।
उसने एक रात घर से गहने और पैसे गायब कर दिए और सुबह शोर मचा दिया—
“माँ, लगता है भाभी ने चोरी की है!”
आर्या हैरान रह गई।
“फिर?”
रीमा ने लंबी साँस ली।
“तुम्हारे पापा ने मेरा साथ दिया। लेकिन उस घटना के बाद घर में बहुत झगड़े हुए। सीमा ससुराल चली गई, पर माँ जी का मन हमारे खिलाफ हो गया।
उन्हें लगता रहा कि उनकी बेटी उनसे दूर हो गई, और उसका कारण हम हैं।”
आर्या उदास हो गई।
“और पापा?”
रीमा की आँखें भर आईं।
“इतने झगड़ों और तनाव के बीच तुम्हारे पापा बीमार रहने लगे। एक दिन अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा… और वो हमें छोड़कर चले गए।”
आर्या की आँखों में भी आँसू आ गए।
“फिर आपने अकेले सब संभाला?”
रीमा ने सिर हिलाया।
“हाँ। मैंने सिलाई का काम शुरू किया। तुम्हें पढ़ाया… और माँ जी की भी देखभाल करती रही। भले ही वो मुझे कभी स्वीकार नहीं कर पाईं।”
इतना कहते-कहते रीमा चुप हो गई।
उसी समय कमरे के अंदर से आवाज आई—
“आर्या… बेटा… जरा इधर आना।”
दोनों जल्दी से अंदर गईं।
रुक्मिणी देवी काँप रही थीं।
रीमा ने तुरंत रजाई ठीक की और चूल्हे में आग जला दी। फिर सरसों का तेल गर्म करके उनके हाथ-पैर मलने लगी।
रुक्मिणी देवी ने धीरे से आँखें खोलीं।
“तू अभी तक गई नहीं?”
रीमा हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“कहाँ जाऊँ माँ जी… ये घर ही तो मेरा है।”
कुछ देर बाद उनकी हालत थोड़ी सुधर गई।
आर्या बोली,
“दादी, अब कैसा लग रहा है?”
रुक्मिणी देवी की आवाज भर्रा गई।
“लगता है… जैसे मौत के दरवाजे से कोई वापस ले आया हो।”
फिर उन्होंने पहली बार सीधे रीमा की तरफ देखा।
“बहू… तू क्यों करती है ये सब? मैंने तो तुझे कभी अपनाया ही नहीं।”
रीमा शांत स्वर में बोली,
“क्योंकि आप मेरे पति की माँ हैं… और मेरी बेटी की दादी।”
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
कुछ देर बाद रुक्मिणी देवी ने अलमारी की ओर इशारा किया।
“वहाँ एक डिब्बा रखा है… उसमें कुछ पैसे हैं। मैं आर्या की शादी के लिए जोड़ रही थी। ले लेना।”
रीमा चौंक गई।
“आप हमारे लिए पैसे जोड़ रही थीं?”
रुक्मिणी देवी बोलीं,
“मुझ पर भरोसा नहीं है ना तुझे… इसलिए चुपचाप जोड़ती रही।”
आर्या हँसते हुए बोली,
“दादी, पहले आप ठीक हो जाइए… शादी की चिंता बाद में करेंगे।”
रुक्मिणी देवी ने उसका माथा चूम लिया।
दरवाज़े के पीछे खड़ी रीमा सब देख रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
उसे लगा जैसे वर्षों से जमा हुआ दर्द आज थोड़ा हल्का हो गया है।
रुक्मिणी देवी धीरे से बोलीं,
“शायद इंसान उम्र के साथ नहीं… पछतावे के साथ बदलता है।”
रीमा ने धीरे से कहा,
“अगर दिल साफ हो जाए… तो देर कभी नहीं होती।”
नीम के पेड़ के नीचे हवा चल रही थी।
और उस घर में पहली बार रिश्तों की गर्माहट लौट आई थी।

Post a Comment