आत्मसम्मान की कीमत
“धड़ाम!”
स्टील की थाली ज़मीन पर गिरकर जोर से बज उठी।
आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पूरे घर में सन्नाटा छा गया।
रीना के हाथ काँप रहे थे। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह रो नहीं रही थी।
सामने खड़ा उसका पति अजय गुस्से से लाल था।
“इतनी हिम्मत कब से आ गई तुममें?” अजय दहाड़ा।
“मेरी माँ को जवाब देती हो? और ऊपर से कहती हो कि अब घर के सारे खर्चों का हिसाब अलग होगा?”
रीना चुप खड़ी रही।
सास, कमला देवी, सोफे पर बैठी थीं। उन्होंने व्यंग्य से कहा,
“देखा अजय? मैंने पहले ही कहा था, नौकरी वाली बहू घर नहीं संभालती। आज हिसाब मांग रही है, कल घर पर हक भी जताएगी।”
रीना ने धीरे से उनकी तरफ देखा।
उसी कमला देवी के लिए उसने पिछले साल अपने गहने बेचकर ऑपरेशन करवाया था।
उसी घर के लिए उसने अपनी आधी सैलरी हर महीने दे दी थी।
लेकिन आज वही सब जैसे किसी को याद नहीं था।
अजय फिर चिल्लाया,
“तुम्हारी सैलरी आती है तो समझती हो घर तुम्हारे पैसों से चल रहा है?”
रीना ने पहली बार आँख उठाकर अजय को देखा।
“नहीं अजय,” उसने शांत आवाज़ में कहा,
“मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे तो सिर्फ इतना लगता है कि इस घर में मेरी मेहनत की कोई कीमत नहीं है।”
अजय हँस पड़ा।
“ओह, अब तुम भाषण दोगी? स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हो इसलिए घर में भी टीचर बनोगी?”
कमला देवी ने भी हँसते हुए कहा,
“अरे रहने दे अजय। पढ़-लिखकर दिमाग खराब हो जाता है औरतों का।”
रीना ने कुछ नहीं कहा।
उसने झुककर ज़मीन से गिरी थाली उठाई और सिंक में रख दी।
लेकिन उसके अंदर कुछ टूट चुका था।
स्कूल पहुँचकर भी उसका मन पढ़ाने में नहीं लग रहा था।
कक्षा में बच्चे बैठे थे।
“मैम, आज कौन सा चैप्टर पढ़ाएँगी?”
एक बच्चे ने पूछा।
रीना ने किताब खोली, लेकिन शब्द धुंधले लग रहे थे।
उसे सुबह की बातें याद आ रही थीं।
कैसे अजय ने सबके सामने उसे अपमानित किया।
कैसे उसकी सास ने उसे ताने दिए।
लंच ब्रेक में उसकी सहेली और सहकर्मी मीना उसके पास आई।
“क्या हुआ रीना? आज बहुत चुप हो।”
रीना ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा।
फिर धीरे से बोली,
“मीना, क्या एक औरत की कमाई पर उसका खुद का हक नहीं होता?”
मीना ने तुरंत जवाब दिया,
“बिल्कुल होता है।”
“लेकिन घर में तो ऐसा नहीं लगता,” रीना बोली।
“मेरी सैलरी आते ही अजय अपने अकाउंट में ट्रांसफर करवा लेता है। और अगर मैं कुछ पूछ लूँ तो कहता है कि घर का पैसा घर में ही लग रहा है।”
मीना कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“रीना, घर चलाना और अपना सम्मान बचाना दोनों अलग चीजें हैं। अगर कोई तुम्हारी मेहनत की कद्र ही नहीं करता, तो वहाँ चुप रहना भी गलत है।”
रीना को लगा जैसे किसी ने उसके दिल की बात कह दी हो।
स्कूल खत्म होने के बाद वह सीधे बैंक गई।
बैंक मैनेजर उसे पहचानता था।
“आइए मैडम, बैठिए। कैसे आना हुआ?”
रीना ने सीधा कहा,
“मुझे अपना सैलरी अकाउंट बदलना है।”
मैनेजर ने आश्चर्य से पूछा,
“लेकिन आपका तो जॉइंट अकाउंट है?”
“अब नहीं रहेगा,” रीना ने शांत स्वर में कहा।
“मेरी सैलरी अब मेरे पर्सनल अकाउंट में आएगी।”
मैनेजर ने फॉर्म आगे बढ़ा दिया।
रीना ने साइन किए।
उसके अंदर एक अजीब सी शांति थी।
घर पहुँचते ही टीवी की आवाज़ सुनाई दी।
अजय सोफे पर बैठा मैच देख रहा था।
कमला देवी रसोई में थीं।
अजय ने रीना को देखते ही कहा,
“कहाँ रह गई थीं? चाय क्यों नहीं बनी अभी तक?”
रीना ने बैग मेज पर रखा।
“आज चाय नहीं बनेगी,” उसने कहा।
अजय ने टीवी बंद कर दिया।
“क्या मतलब?”
रीना ने धीरे से कहा,
“मतलब यह कि अब मैं सिर्फ इस घर की नौकरानी नहीं रहूँगी।”
अजय गुस्से में उठ खड़ा हुआ।
“दिमाग खराब हो गया है तुम्हारा?”
रीना ने बैग से एक फाइल निकाली।
“यह पिछले दो साल का खर्च है,” उसने टेबल पर रखते हुए कहा।
अजय और कमला देवी दोनों चुप हो गए।
“घर का किराया – 18 हज़ार।
राशन – 8 हज़ार।
बिजली-पानी – 4 हज़ार।
आपकी दवाइयाँ – 3 हज़ार।”
कमला देवी की आँखें फैल गईं।
रीना आगे बोली,
“कुल मिलाकर 33 हज़ार हर महीने। और मेरी सैलरी 40 हज़ार है।”
अजय चुप था।
“और तुम्हारा योगदान?” रीना ने पूछा।
अजय ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उसे पता था जवाब क्या है।
रीना ने धीरे से कहा,
“मैंने कभी शिकायत नहीं की। क्योंकि मुझे लगा पति-पत्नी एक-दूसरे का साथ देते हैं। लेकिन आज मुझे समझ आया कि साथ और शोषण में फर्क होता है।”
कमला देवी गुस्से से बोलीं,
“बहू होकर ऐसा बोलती है?”
रीना ने उनकी तरफ देखा।
“बहू हूँ, इसलिए अब तक चुप थी।”
फिर उसने अजय की तरफ देखा।
“आज से मेरी सैलरी मेरे अकाउंट में आएगी। और घर के खर्च का हिसाब बराबर होगा।”
अजय चिल्लाया,
“और अगर मैं मना कर दूँ तो?”
रीना मुस्कुराई।
“तो फिर मैं यहाँ नहीं रहूँगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अजय को पहली बार डर महसूस हुआ।
“तुम घर छोड़ दोगी?” उसने धीमी आवाज़ में पूछा।
रीना ने सिर हिलाया।
“अगर सम्मान नहीं मिलेगा, तो हाँ।”
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर रीना ने कहा,
“और एक बात और अजय…”
“आज से मैं तुम्हारी इजाज़त से नहीं, अपने आत्मसम्मान से जीऊँगी।”
इतना कहकर वह अपने कमरे की तरफ चली गई।
उसके कदम भारी थे, लेकिन दिल हल्का था।
क्योंकि पहली बार उसे लगा
कि उसने अपने लिए सही फैसला लिया है।

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