सास के ताने और बहू की चुप्पी
सुबह का समय था।
घर के आँगन में हल्की धूप फैल रही थी और रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी।
रीमा रसोई में खड़ी नाश्ता बना रही थी। रीमा की शादी को छह साल हो चुके थे और उसका एक बेटा आरव था। वह कोशिश करती थी कि घर का हर काम अच्छे से करे, ताकि किसी को शिकायत न हो।
तभी उसकी सास, कमला देवी, रसोई में आईं।
“बहू, आज मेरे कुछ रिश्तेदार घर आ रहे हैं। दोपहर के खाने में पूड़ी, कचौड़ी, दाल, तीन तरह की सब्जी, रायता और हलवा बना देना।”
रीमा ने हैरानी से पूछा,
“माँजी, कितने लोग आ रहे हैं?”
कमला देवी तुरंत बोलीं,
“अरे ये क्या सवाल है? हमारे ज़माने में तो बहुएँ इतना नहीं पूछती थीं। जितना कहा जाए उतना चुपचाप कर देती थीं।”
रीमा धीरे से बोली,
“माँजी, मैं बस इसलिए पूछ रही थी ताकि खाना कम या ज्यादा न हो जाए।”
कमला देवी हँसते हुए बोलीं,
“हमारे समय में तो हमें कोई बताने वाला भी नहीं था। हम तो अंदाज़े से ही सब कर लेते थे।”
रीमा चुप हो गई। उसने सोचा कि बहस करने से कोई फायदा नहीं।
रीमा चुपचाप रसोई में काम करने लगी।
वह अकेले ही सारे काम संभाल रही थी—
आटा गूंथना, सब्जियाँ काटना, दाल चढ़ाना और रायता तैयार करना। रसोई में इधर-उधर भागते हुए वह जल्दी-जल्दी सब कुछ निपटाने की कोशिश कर रही थी।
कुछ देर बाद थककर उसने धीरे से अपनी सास से कहा,
“माँजी, अगर आप थोड़ी-सी मदद कर देतीं तो काम जल्दी हो जाता।”
यह सुनते ही कमला देवी थोड़ा नाराज़ होकर बोलीं,
“क्या कहा तुमने? सास से मदद? हमारे ज़माने में तो बहुओं की इतनी हिम्मत भी नहीं होती थी कि वे सास से मदद मांग लें। हम तो चुपचाप सारा काम कर लेते थे।”
कमला देवी की बात सुनकर रीमा चुप हो गई।
उसने बिना कुछ कहे फिर से अपने काम में हाथ लगा लिया।
दोपहर तक रीमा पूरी तरह थक चुकी थी।
सुबह से वह लगातार रसोई में काम कर रही थी।
लेकिन जब मेहमान आए तो उसने थकान को चेहरे पर आने नहीं दिया और सबको बड़े प्यार से खाना परोसने लगी।
मेहमान खाना खाकर बहुत खुश हुए।
एक मेहमान मुस्कुराते हुए बोले,
“कमला जी, आपकी बहू तो सच में बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती है। खाना बहुत अच्छा है।”
यह सुनते ही कमला देवी तुरंत बोल पड़ीं,
“अरे, ये सब तो मैंने ही इसे सिखाया है। वरना आजकल की लड़कियों को भला क्या आता है?”
रीमा ने यह बात सुनी, लेकिन कुछ नहीं बोली।
वह बस हल्का सा मुस्कुरा दी और चुपचाप सबको खाना परोसती रही।
शाम का समय था।
रीमा अपने बेटे आरव को बैठाकर पढ़ा रही थी। अगले दिन उसकी परीक्षा थी, इसलिए वह चाहती थी कि आरव अच्छे से तैयारी कर ले।
तभी कमला देवी कमरे में आ गईं।
उन्होंने थोड़े कड़े स्वर में कहा,
“बहू, ज़रा पहले आकर रसोई के बर्तन साफ कर दो। बच्चे को बाद में भी पढ़ा सकती हो।”
रीमा ने धीरे से जवाब दिया,
“माँजी, कल इसकी परीक्षा है। बस थोड़ी देर इसे पढ़ा दूँ, फिर मैं सारे बर्तन साफ कर दूँगी।”
कमला देवी तुरंत बोलीं,
“हमारे समय में तो हम घर का सारा काम भी करते थे और बच्चों को भी पढ़ाते थे। आजकल की बहुएँ तो बस बहाने ढूँढती रहती हैं।”
यह सुनकर रीमा चुप हो गई।
वह कुछ कहना तो चाहती थी, लेकिन सास से बहस करना उसे ठीक नहीं लगा।
उसने आरव की किताब बंद की और बोली,
“बेटा, तुम थोड़ी देर खुद पढ़ लो, मैं अभी आती हूँ।”
इतना कहकर वह उठी और चुपचाप रसोई में जाकर बर्तन साफ करने लगी।
अगले दिन स्कूल से परीक्षा का परिणाम आया।
आरव चुपचाप घर में दाखिल हुआ। उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि वह थोड़ा उदास है।
रीमा ने प्यार से पूछा,
“क्या हुआ बेटा? रिजल्ट मिल गया?”
आरव ने धीरे से अपनी कॉपी माँ के हाथ में दे दी।
रीमा ने जैसे ही नंबर देखे, वह समझ गई कि इस बार उसके अंक पहले से कम आए हैं।
तभी पास खड़ी कमला देवी ने भी कॉपी देख ली।
उन्होंने तुरंत ताना मारते हुए कहा,
“देख लिया बहू! यही होता है जब घर का काम भी ढंग से नहीं होता और बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता।”
कमला देवी की बात सुनकर रीमा कुछ पल के लिए चुप रह गई।
उसकी आँखों में हल्के-हल्के आँसू आ गए, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
वह बस आरव के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली,
“कोई बात नहीं बेटा, अगली बार हम और मेहनत करेंगे।”
शाम को जब अमित ऑफिस से घर लौटा, तो उसने देखा कि रीमा बहुत उदास बैठी हुई है। उसके चेहरे पर थकान और मायूसी साफ दिखाई दे रही थी।
अमित ने चिंतित होकर पूछा,
“क्या हुआ रीमा? तुम इतनी उदास क्यों हो?”
रीमा कुछ नहीं बोली। उसने बस हल्की सी मुस्कान देने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में छुपा दर्द साफ नजर आ रहा था।
तभी पास में बैठी कमला देवी बोल पड़ीं,
“अरे कुछ नहीं हुआ है। आजकल की बहुएँ थोड़े से काम में ही थक जाती हैं, बस वही बात है।”
अमित ने धीरे और शांति से कहा,
“माँ, रीमा सुबह से लेकर शाम तक घर का सारा काम करती है। क्या आपने कभी उसकी मेहनत की तारीफ भी की है?”
यह सुनकर कमला देवी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
अमित ने आगे कहा,
“माँ, घर तभी खुशहाल बनता है जब उसमें प्यार और समझदारी हो। अगर हर समय ताने ही दिए जाएँ, तो घर का माहौल भारी हो जाता है। कोई भी खुश नहीं रह पाता।”
अमित की बात सुनकर कमला देवी को अपनी गलती का एहसास होने लगा।
वह धीरे-धीरे रीमा के पास आईं और प्यार से बोलीं,
“बहू, मुझे माफ कर दे। शायद मैं हमेशा अपने पुराने समय की बातें सोचकर तुझे समझ नहीं पा रही थी। मैंने तुझे बहुत बार बिना वजह डाँटा और ताने दिए।”
रीमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“माँजी, आप मेरी माँ जैसी हैं। आपकी बातों से मुझे दुख जरूर होता था, लेकिन मैं कभी घर में लड़ाई नहीं चाहती थी। इसलिए हमेशा चुप रह जाती थी।”
कमला देवी की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने प्यार से रीमा को गले लगा लिया।
उस दिन के बाद घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।
अब कमला देवी हर छोटी-बड़ी बात पर ताने देने की बजाय रीमा की मदद करने लगीं।
और सच में, कुछ ही दिनों में उस घर में फिर से खुशियाँ और अपनापन लौट आया।

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