जरूरत से ज्यादा प्यार

Mother watching her child using mobile indoors while grandmother observes during rainy day at home


घर के बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। खिड़की के पास खड़ी नेहा अपने बेटे आरव को देख रही थी, जो सोफे पर बैठा मोबाइल में कार्टून देख रहा था। उसकी उम्र सिर्फ 5 साल थी, लेकिन उसकी आदतें किसी बड़े बच्चे जैसी हो चुकी थीं।


“आरव बेटा, बाहर बारिश हो रही है… चलो कागज़ की नाव बनाते हैं,” नेहा ने प्यार से कहा।


आरव ने बिना नजर उठाए जवाब दिया—

“नहीं मम्मी… मुझे बाहर नहीं जाना, गंदा हो जाऊंगा।”


नेहा थोड़ा चुप हो गई। उसके मन में अचानक कुछ खटका।


उसी समय उसकी सास, सुशीला जी, चाय लेकर आईं। उन्होंने आरव को देखा और फिर नेहा की तरफ मुस्कुराते हुए बोलीं—

“आजकल के बच्चे बाहर खेलना भूलते जा रहे हैं।”


नेहा ने धीरे से कहा—

“मम्मी जी, मैं तो चाहती हूं ये खेले… लेकिन इसे बाहर जाना पसंद ही नहीं है।”


सुशीला जी ने गहरी सांस ली—

“पसंद नहीं है… या आदत नहीं है?”


नेहा चौंक गई—

“मतलब…?”



सुशीला जी कुर्सी पर बैठते हुए बोलीं—


“जब आरव छोटा था ना… तब तुम उसे ज़मीन पर बैठने भी नहीं देती थीं। हमेशा या तो गोद में रखती थीं, या बिस्तर पर ही सुलाए रखती थीं।”


नेहा को वो दिन याद आ गए। सच में, वह हर छोटी-छोटी बात का बहुत ध्यान रखती थी।


नेहा ने हल्की सफाई देते हुए कहा—

“आप ही बताइए मम्मी जी… इतना छोटा बच्चा था, मैं उसे फर्श पर कैसे छोड़ देती?”


सुशीला जी हल्का सा मुस्कुराईं और बोलीं—

“अगर घर का फर्श साफ हो, तो बच्चे को वहाँ खेलने देने से कुछ नहीं होता। उल्टा, इससे बच्चा धीरे-धीरे मजबूत बनता है। लेकिन तुमने उसे हर चीज़ से बचाकर ही रखा।”


फिर थोड़ी गंभीर होकर उन्होंने कहा—

“और सिर्फ इतना ही नहीं… तुमने हमेशा उसे जरूरत से ज्यादा संभालकर रखा। हर बार हाथ धोकर ही खाना खिलाया, बाहर की हवा से दूर रखा, मिट्टी में तो कभी खेलने ही नहीं दिया… यहां तक कि हल्की सी ठंडी हवा भी उसे लगने नहीं देती थीं।”


नेहा अब पूरी तरह चुप हो गई। उसे धीरे-धीरे अपनी गलती समझ आने लगी थी।



“तुम्हें याद है,” सुशीला जी ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा,

“जब आरव सिर्फ एक साल का था, तब तुम उसे रोज़ बादाम, काजू, शहद और न जाने कितनी तरह की चीज़ें खिलाती थीं?”


नेहा ने धीमे से सिर झुका कर कहा—

“हाँ… ताकि वो स्वस्थ और मजबूत रहे।”


सुशीला जी ने समझाते हुए कहा—

“स्वस्थ तो वह बना… लेकिन जरूरत से ज्यादा। हर चीज़ की एक सीमा होती है बेटा।”


थोड़ा रुककर उन्होंने आगे कहा—

“तुमने उसे इतना आराम और इतनी सुविधा की आदत डाल दी कि अब ज़रा सी मेहनत भी उसे मुश्किल लगती है। बाहर खेलना, दौड़ना, गिरना—ये सब उसके लिए बिल्कुल नया और अजीब अनुभव बन गया है।”



उसी वक्त दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई।

नेहा ने दरवाज़ा खोला तो सामने पड़ोस की छोटी सी पिहू खड़ी थी, चेहरे पर वही मासूम मुस्कान।


“आंटी, आरव को खेलने भेजिए ना… हम सब नीचे खेल रहे हैं,” उसने उत्साह से कहा।


नेहा ने पलटकर आरव की तरफ देखा, जो अब भी सोफे पर बैठा मोबाइल में खोया हुआ था।


“जाओ बेटा, दोस्तों के साथ खेलो… अच्छा लगेगा,” नेहा ने प्यार से समझाया।


आरव ने बिना उठे ही सिर हिला दिया—

“नहीं मम्मी… मैं नहीं जाऊंगा… वहां गिर जाऊंगा।”


उसकी आवाज़ में डर साफ झलक रहा था।


पिहू ये सुनकर हल्के से हंस पड़ी—

“अरे, गिरते तो हम भी हैं… फिर उठकर दोबारा खेलने लगते हैं!”


इतना कहकर वो सीढ़ियों की तरफ भाग गई, जैसे उसे यकीन हो कि खेल उससे ज्यादा जरूरी है।


दरवाज़ा बंद करते हुए नेहा कुछ पल वहीं खड़ी रह गई।

उसकी नजर फिर से आरव पर गई—जो अब भी उसी जगह चुपचाप बैठा था।


नेहा के दिल में एक अजीब सी चुभन उठी—

क्या उसका बच्चा सच में खेलने से ज्यादा डरने लगा है…?



नेहा ने हल्की झिझक के साथ धीमे स्वर में पूछा—

“मम्मी जी… क्या मुझसे सच में कोई गलती हो गई?”


सुशीला जी ने स्नेह से उसका हाथ थामते हुए मुस्कुराकर कहा—

“नहीं बेटा, गलती नहीं… बस तुमने उसे ज़रूरत से ज़्यादा संभाल लिया, ज़रूरत से ज़्यादा प्यार दे दिया।”


थोड़ा ठहरकर उन्होंने समझाया—

“याद रखना, बच्चों को सिर्फ हर मुश्किल से बचाना ही जरूरी नहीं होता… उन्हें उन मुश्किलों का सामना करना और उनसे मजबूत बनना सिखाना उससे भी ज़्यादा जरूरी होता है।”



अगले दिन…


नेहा खुद आरव का हाथ पकड़कर नीचे पार्क में ले गई।


“चलो बेटा… आज बस थोड़ा सा खेलते हैं।”


पहले तो आरव हिचकिचाया… लेकिन धीरे-धीरे उसने स्लाइड पर चढ़ना शुरू किया। एक बार गिरा भी… लेकिन नेहा ने दौड़कर उठाने की बजाय ताली बजाकर कहा—


“वाह! मेरा शेर बेटा… खुद उठ गया!”


आरव खुद उठकर मुस्कुराने लगा।



कहानी की सीख:


उस दिन नेहा को समझ आ गया—


बच्चों को हर छोटी-बड़ी परेशानी से बचाकर रखना ही सच्चा प्यार नहीं होता, बल्कि उन्हें उन परिस्थितियों का सामना करना सिखाना ज्यादा ज़रूरी होता है, ताकि वे मजबूत और आत्मनिर्भर बन सकें।


जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और हर समय की सुरक्षा बच्चों को अंदर से कमजोर बना देती है, क्योंकि वे जीवन की चुनौतियों से जूझना सीख ही नहीं पाते।


और बचपन की वही छोटी-छोटी ठोकरें, हल्की चोटें और मिट्टी में खेलना ही उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, जो आगे चलकर जिंदगी की बड़ी मुश्किलों का सामना करने की ताकत देता है।




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