समय से पहले समझ आ जाए तो रिश्ते बच जाते हैं

Two brothers standing on opposite sides of a wall in a traditional Indian house symbolizing family conflict


सुबह का समय था।


आंगन में सुबह की कोमल धूप उतर आई थी। नीम के पेड़ की छाया जमीन पर लहर रही थी और गली में दूधवाले की साइकिल की घंटी सुनाई दे रही थी।


सरोज देवी बरामदे में चारपाई पर बैठकर चाय पी रही थीं। उनकी उम्र लगभग सत्तर साल थी। चेहरा झुर्रियों से भरा था, लेकिन आँखों में आज भी अपने परिवार के लिए वही ममता थी।


उनके दो बेटे थे — बड़ा बेटा अजय और छोटा बेटा विजय।


कभी दोनों भाइयों में इतना प्यार था कि लोग मिसाल देते थे। बचपन में दोनों एक ही स्कूल जाते, साथ खेलते और एक ही थाली में खाना खाते थे।


पर आज उसी घर में एक दीवार खड़ी थी।


वह दीवार ईंटों की थी, लेकिन उससे भी ऊँची दीवार दोनों भाइयों के दिलों में खड़ी हो चुकी थी।


यह सब करीब पंद्रह साल पहले शुरू हुआ था।


जब विजय की शादी हुई और घर में उसकी पत्नी मीना आई।


मीना पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी, लेकिन अजय की पत्नी पूजा को शुरू से ही लगा कि अब घर में उसकी अहमियत कम हो जाएगी।


धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातों पर ताने शुरू हो गए।


कभी रसोई को लेकर झगड़ा होता, कभी खर्च को लेकर।


पूजा अक्सर अजय से कहती, “देख लेना, तुम्हारा छोटा भाई धीरे-धीरे पूरा घर अपने नाम करवा लेगा।”


अजय भी पत्नी की बातों में आने लगा।


उधर मीना भी कई बार विजय से शिकायत करती कि भाभी उसे हर बात पर नीचा दिखाती हैं।


बस, इसी तरह छोटी-छोटी बातें धीरे-धीरे बड़ी होती चली गईं।


एक दिन तो बात इतनी बढ़ गई कि दोनों भाइयों में जोरदार झगड़ा हो गया।


अजय गुस्से में बोला, “आज से हमारा तुमसे कोई रिश्ता नहीं। तुम अपने हिस्से में रहो और हम अपने।”


कुछ ही दिनों में घर के बीचों-बीच दीवार खिंच गई।


सरोज देवी उस दिन बहुत रोई थीं।


उन्होंने कहा था, “बेटा, घर की दीवारें बनती हैं तो दिलों की दूरी भी बढ़ जाती है।”


लेकिन उस समय किसी ने उनकी बात नहीं सुनी।


समय बीतता गया।


दोनों परिवार एक ही घर में रहते हुए भी अजनबी बन गए।


सालों तक त्योहार भी अलग-अलग मनाए जाने लगे।


सरोज देवी का दिल धीरे-धीरे टूटता जा रहा था।


उन्हें सबसे ज्यादा दर्द तब होता था जब उनके पोते-पोती भी आपस में बात नहीं करते थे।


एक दिन अचानक अजय को तेज सीने में दर्द हुआ।


वह अपने कमरे में गिर पड़ा।


पूजा घबरा गई। उसने पड़ोसियों को बुलाया और जल्दी-जल्दी अस्पताल ले जाया गया।


डॉक्टरों ने कहा, “दिल का दौरा पड़ा है। हालत गंभीर है।”


यह खबर सुनते ही विजय भी अस्पताल पहुँच गया।


कई सालों बाद दोनों भाई आमने-सामने खड़े थे।


पर इस बार किसी के पास बोलने के लिए शब्द नहीं थे।


विजय ने डॉक्टर से कहा, “डॉक्टर साहब, जो भी इलाज करना हो कीजिए। पैसों की चिंता मत कीजिए।”


पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।


उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस देवर को वह अपना दुश्मन समझती थी, वही सबसे पहले मदद के लिए खड़ा है।


अजय तीन दिन बाद खतरे से बाहर आया।


जब उसे होश आया, तो उसने देखा कि विजय उसके पास बैठा है।


दोनों की आँखें मिलते ही सालों की कड़वाहट आँसुओं में बह गई।


अजय धीरे से बोला, “मुझे माफ कर दे भाई।”


विजय ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“भाई से माफी नहीं माँगते।”


उस दिन अस्पताल के उस छोटे से कमरे में दोनों भाइयों का गले लगकर रोना देख सरोज देवी की आँखों में भी आँसू आ गए।


उन्हें लगा जैसे उनका टूटा हुआ परिवार फिर से जुड़ गया है।


कुछ ही दिनों बाद घर की वह दीवार गिरा दी गई।


अब फिर से सब एक साथ रहने लगे।


शाम को जब पूरा परिवार आंगन में बैठकर चाय पीता, तो सरोज देवी की आँखों में संतोष झलकता था।


एक दिन उन्होंने मुस्कुराकर कहा,


“रिश्ते बहुत कीमती होते हैं। इन्हें टूटने में एक पल लगता है, लेकिन जुड़ने में पूरी जिंदगी लग जाती है।”


उस दिन सबने मन ही मन ठान लिया कि अब इस घर में कभी अहंकार को जगह नहीं मिलेगी।


क्योंकि उन्हें समझ आ चुका था कि


मुश्किल समय में साथ देने वाला कोई और नहीं, सिर्फ अपना परिवार ही होता है।




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