रिश्तों की असली कीमत

Indian family scene showing a son apologizing to his elderly parents while his wife stands nearby and a small child hugs his grandfather in a warm emotional moment inside a middle class home.



सुबह के करीब आठ बजे थे।

घर में रोज़ की तरह हलचल शुरू हो चुकी थी। आँगन में हल्की धूप फैल रही थी और रसोई से चाय और ताज़े नाश्ते की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी।


सीमा रसोई में खड़ी नाश्ता बना रही थी। गैस पर चाय उबल रही थी और तवे पर गरम-गरम पराठे सिक रहे थे। वह जल्दी-जल्दी काम कर रही थी ताकि सबको समय पर नाश्ता मिल सके।


तभी उसके पति अजय ऑफिस जाने की तैयारी करते हुए बोले।


“सीमा, एक बात बतानी थी।”


“क्या बात है?” सीमा ने पूछा।


अजय थोड़ा रुककर बोला, “पापा अगले महीने रिटायर हो रहे हैं। अब वो और मां हमारे साथ ही रहेंगे।”


सीमा कुछ पल के लिए चुप हो गई। फिर बोली,

“अच्छा… ठीक है।”


अजय खुश होकर बोला,

“मुझे पता था तुम मना नहीं करोगी।”


लेकिन सीमा के मन में कुछ और ही चल रहा था।


थोड़ी देर बाद वह अपनी सहेली राधा को फोन करती है।


“यार राधा, अभी तक तो सब ठीक चल रहा था। अब सास-ससुर भी आ जाएंगे।”


“तो क्या हुआ?” राधा ने पूछा।


सीमा बोली,

“अब हर बात पर टोकाटाकी होगी। कब उठो, क्या बनाओ, क्या पहनो… मैं तो परेशान हो जाऊंगी।”


राधा बोली,

“अरे तो कामवाली रख लो। सारा काम वही कर लेगी।”


सीमा को यह बात सही लगी।


अगले हफ्ते अजय के मां-पापा शहर आ गए।


अजय की मां, शारदा देवी, बहुत खुश थीं।


उन्होंने घर में कदम रखते ही कहा,

“अब तो अच्छा लगेगा। वहां गाँव में अकेले-अकेले मन नहीं लगता था।”


सीमा ने हल्की सी मुस्कान दी और बोली,

“जी।”


लेकिन उसके व्यवहार में अपनापन नहीं था।


यह बात शारदा देवी ने महसूस तो की, पर कुछ कहा नहीं।


कुछ दिनों बाद सीमा ने घर में काम के लिए एक कामवाली रख ली, जिसका नाम गीता था।


अब घर के सारे काम गीता ही करती थी।


एक दिन शारदा देवी ने गीता से कहा,

“बेटी, ज़रा एक कप चाय बना दे।”


गीता बोली,

“अभी बहुत काम है आंटी जी, बाद में बनाऊंगी।”


शारदा देवी चुप हो गईं।


तभी सीमा वहां आ गई।


“मम्मी जी, गीता को परेशान मत किया कीजिए। उसके पास बहुत काम रहता है।”


शारदा देवी ने धीरे से कहा,

“मैंने तो बस चाय ही मांगी थी।”


सीमा बोली,

“तो आप खुद भी बना सकती हैं ना।”


यह सुनकर शारदा देवी चुप हो गईं।


उधर अजय के पापा, रामलाल जी, अक्सर अपने पोते राहुल के साथ बैठते थे।


उसे कहानियाँ सुनाते और पढ़ाई भी करवाते।


राहुल को अपने दादा-दादी बहुत अच्छे लगते थे।


लेकिन सीमा को यह सब पसंद नहीं था।


एक दिन राहुल ने खाना नहीं खाया।


सीमा ऑफिस से लौटकर जोर-जोर से बोलने लगी।


“मम्मी जी, राहुल ने खाना क्यों नहीं खाया?”


शारदा देवी बोलीं,

“बेटी, मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन वो नहीं खा रहा था।”


सीमा गुस्से में बोली,

“आपको इतना भी नहीं आता बच्चे को कैसे खिलाते हैं?”


यह सुनकर रामलाल जी को बहुत बुरा लगा।


लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।


रात को अजय घर आया तो सीमा ने शिकायत शुरू कर दी।


“तुम्हारे मां-पापा को बच्चे की भी जिम्मेदारी नहीं है।”


अजय ने बिना कुछ सोचे अपने मां-पापा से बात कर ली।


“मां, राहुल ने खाना क्यों नहीं खाया?”


शारदा देवी चुप रहीं।


रामलाल जी बोले,

“बेटा, बच्चों को जबरदस्ती नहीं खिलाया जाता।”


अजय बोला,

“लेकिन कोशिश तो करनी चाहिए थी।”


यह सुनकर दोनों बहुत दुखी हुए।


धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा।


अजय अब कम ही अपने मां-पापा के पास बैठता था।


एक दिन गीता ने शारदा देवी से कहा,


“आंटी जी, अब आप अपने कपड़े खुद धो लिया करो। मेरे पास बहुत काम रहता है।”


रामलाल जी ने यह बात सुन ली।


उन्हें बहुत बुरा लगा।


रात को उन्होंने अजय से कहा,


“बेटा, अगर तुम्हें लगता है कि हम यहाँ बोझ हैं, तो हमें वापस गांव जाने दे।”


अजय हैरान रह गया।


“पापा, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”


रामलाल जी बोले,


“जहाँ नौकरानी की बात पर बेटा अपने मां-बाप से सवाल करे, वहाँ रहना मुश्किल हो जाता है।”


तभी राहुल दौड़ता हुआ आया।


“दादा जी, आप कहीं नहीं जाएंगे। मैं भी आपके साथ जाऊंगा।”


रामलाल जी ने प्यार से उसे गले लगाया।


“नहीं बेटा, हर बच्चे को अपने मम्मी-पापा के साथ ही रहना चाहिए।”


राहुल मासूमियत से बोला,


“तो फिर पापा आपके साथ क्यों नहीं रहना चाहते?”


यह सुनकर अजय की आँखें झुक गईं।


उसे अपनी गलती का एहसास हो गया।


वह तुरंत अपने पापा के पैरों में बैठ गया।


“पापा, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हो गई।”


फिर उसने सीमा की तरफ देखा और बोला,


“सीमा, ये घर मेरे मां-पापा का है। मैं इनके बिना नहीं रह सकता।”


सीमा को अपनी गलती समझ में आ गई।


वह भी शर्मिंदा होकर बोली,


“मम्मी जी, पापा जी… मुझे माफ कर दीजिए। आगे से ऐसा कभी नहीं होगा।”


शारदा देवी मुस्कुरा दीं।


रामलाल जी बोले,


“बेटा, घर प्यार और सम्मान से चलता है, गुस्से से नहीं।”


उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।


अब सीमा भी अपने सास-ससुर का सम्मान करने लगी।


राहुल सबसे ज्यादा खुश था, क्योंकि अब उसका परिवार सच में एक हो गया था।


कहानी की सीख:

जिस घर में बड़ों का सम्मान होता है, उस घर में हमेशा सुख और शांति रहती है।





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