अपने घर की समझ
सुबह की नरम रोशनी धीरे-धीरे आँगन में उतर रही थी। हल्की ठंडी हवा चल रही थी और पास के पेड़ों से पक्षियों की मधुर आवाजें सुनाई दे रही थीं। पूरे घर में सुबह की ताज़गी भरी हलचल महसूस हो रही थी।
रसोई से गरम चाय और तवे पर सिकते पराठों की खुशबू फैलकर पूरे घर में पहुँच रही थी।
सुनीता रसोई में खड़ी नाश्ते की तैयारी में लगी हुई थी। वह एक तरफ पराठे सेंक रही थी और साथ-साथ चाय भी उबाल रही थी।
उधर बरामदे में उसके सास-ससुर आराम से बैठकर सुबह की चाय का आनंद ले रहे थे और दिन की शुरुआत पर आपस में बातें कर रहे थे।
सुनीता के ससुर रामनाथ जी अख़बार पढ़ते हुए बोले,
“भाग्यवान, आजकल घर का खर्च कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है।”
उनकी पत्नी शांति देवी बोलीं,
“अरे खर्च तो बढ़ेगा ही। आखिर हमारी बेटी पूजा भी तो है। जब उसे जरूरत पड़ती है, तो हम मदद नहीं करेंगे क्या?”
सुनीता चुपचाप ये सब सुन रही थी।
असल में शांति देवी की एक बेटी पूजा और एक बेटा रोहित था। पूजा की शादी को दो साल हो चुके थे। रोहित की शादी अभी आठ महीने पहले ही हुई थी।
शांति देवी को अपनी बेटी पूजा से बहुत लगाव था। इसलिए जब भी पूजा को किसी चीज की जरूरत होती, वह तुरंत अपनी माँ को फोन कर देती।
और शांति देवी बिना सोचे-समझे उसे सब कुछ दे देती थीं।
कभी पैसे, कभी सामान, कभी कपड़े — जो भी पूजा माँगती, वह तुरंत भेज देती थीं।
शुरू-शुरू में तो सबको यह सामान्य लगा। लेकिन धीरे-धीरे बात बढ़ने लगी।
एक दिन पूजा ने फोन करके कहा,
“मम्मी, हमारे घर का फ्रिज बहुत पुराना हो गया है। ठंडा भी ठीक से नहीं करता। अगर आप नया फ्रिज दिलवा दो तो अच्छा रहेगा।”
शांति देवी बोलीं,
“अरे इसमें कौन सी बड़ी बात है? मैं कल ही तुम्हारे लिए नया फ्रिज मंगवा देती हूँ।”
और सच में अगले ही दिन नया फ्रिज पूजा के घर पहुँच गया।
सुनीता यह सब देखती रही, लेकिन उसने कभी कुछ नहीं कहा।
लेकिन परेशानी तब शुरू हुई जब रोहित को भी कुछ जरूरत पड़ती, तो घर में पैसे कम पड़ जाते।
एक दिन रोहित ऑफिस से आया और बोला,
“माँ, मेरी स्कूटी बहुत पुरानी हो गई है। रोज रास्ते में खराब हो जाती है। अगर नई ले लूँ तो अच्छा रहेगा।”
शांति देवी बोलीं,
“अभी थोड़े दिन रुक जा बेटा। अभी पैसे की थोड़ी कमी है।”
रोहित ने चुपचाप सिर हिला दिया।
लेकिन सुनीता को यह बात अच्छी नहीं लगी।
उसे लगा कि जब पूजा के लिए सब कुछ तुरंत हो सकता है, तो रोहित के लिए क्यों नहीं?
एक दिन पड़ोस की कमला चाची घर आईं।
उन्होंने हंसते हुए कहा,
“शांति बहन, सुना है आपने पूजा को नया फ्रिज दिलवाया है।”
शांति देवी गर्व से बोलीं,
“अरे बेटी है मेरी। उसकी जरूरत पूरी करना मेरा फर्ज है।”
कमला चाची धीरे से बोलीं,
“फर्ज जरूर है, लेकिन इतना भी नहीं कि अपने घर वालों की जरूरतें पीछे रह जाएँ।”
शांति देवी को यह बात थोड़ी बुरी लगी।
उन्होंने कहा,
“आपको हमारे घर की चिंता करने की जरूरत नहीं है। हम अपना घर संभालना जानते हैं।”
कमला चाची मुस्कुरा कर चुप हो गईं।
कुछ दिन बाद पूजा फिर अपने मायके आ गई।
इस बार उसने आते ही कहा,
“मम्मी, हमें एक नई वॉशिंग मशीन चाहिए। हाथ से कपड़े धोना बहुत मुश्किल हो जाता है।”
शांति देवी फिर तुरंत तैयार हो गईं।
लेकिन इस बार रामनाथ जी चुप नहीं रहे।
उन्होंने सख्त आवाज में कहा,
“बस बहुत हो गया।”
शांति देवी हैरान होकर बोलीं,
“क्या हुआ?”
रामनाथ जी बोले,
“बेटी की मदद करना गलत नहीं है, लेकिन हर चीज हम ही देंगे तो वो लोग खुद कब सीखेंगे?”
पूजा थोड़ी नाराज़ होकर बोली,
“पापा, मैं आपसे भीख थोड़ी मांग रही हूँ।”
रामनाथ जी शांत स्वर में बोले,
“बेटी, बात भीख की नहीं है। बात जिम्मेदारी की है। अगर हम हर चीज देते रहेंगे, तो तुम लोग मेहनत करना ही छोड़ दोगे।”
घर में कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर रामनाथ जी बोले,
“आज से हम तुम्हारी जरूरत पड़ने पर मदद जरूर करेंगे, लेकिन हर छोटी-बड़ी चीज नहीं देंगे। तुम्हें भी अपने घर की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी।”
पूजा को यह बात पहले तो बुरी लगी।
लेकिन जब वह अपने घर लौटी, तो उसने और उसके पति ने मिलकर थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाना शुरू किया।
कुछ महीनों बाद उन्होंने अपनी मेहनत से नई वॉशिंग मशीन भी खरीद ली।
उस दिन पूजा ने अपनी माँ को फोन करके कहा,
“मम्मी, आज समझ में आया कि पापा सही कहते थे। अगर आप लोग हमें हमेशा देते रहते, तो शायद हम कभी खुद कुछ करने की कोशिश ही नहीं करते।”
शांति देवी को भी अपनी गलती समझ आ गई।
अब वह अपनी बेटी से पहले यही कहती थीं —
“जरूरत हो तो जरूर बताना, लेकिन पहले खुद कोशिश करना।”
और धीरे-धीरे दोनों घरों में संतुलन भी आ गया और रिश्तों में मिठास भी बनी रही।
सीख:
बच्चों से प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन जरूरत से ज्यादा सहारा देना उन्हें कमजोर बना सकता है। सही समय पर सही समझ देना ही सच्चा प्यार होता है।

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