देवर का फैसला
शाम का समय था।
आँगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। आसमान में सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था और पूरे घर में एक अजीब सी खामोशी फैली हुई थी।
इस घर में रामप्रसाद जी, उनकी पत्नी सावित्री, छोटा बेटा अर्जुन और बड़ी बहू मीरा रहते थे।
कुछ साल पहले तक यह घर हँसी-खुशी से भरा रहता था। मीरा की शादी जब रोहित से हुई थी, तब पूरे घर में खुशियाँ ही खुशियाँ थीं। रोहित और मीरा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे।
लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।
शादी के सिर्फ दो साल बाद ही एक सड़क दुर्घटना में रोहित की मौत हो गई।
उस दिन के बाद जैसे मीरा की जिंदगी से सारी खुशियाँ छिन गईं।
मीरा के माथे की बिंदी मिट गई, हाथों की चूड़ियाँ टूट गईं और उसकी हँसी हमेशा के लिए कहीं खो गई।
रोहित की मौत का सबसे ज्यादा दुख सावित्री को हुआ था। लेकिन उन्होंने अपने दुख का सारा गुस्सा मीरा पर निकालना शुरू कर दिया।
वह अक्सर कहतीं—
“मनहूस लड़की… मेरे बेटे को खा गई।”
मीरा हर बार चुप रह जाती।
वह सुबह चार बजे उठ जाती।
सबसे पहले आँगन में झाड़ू लगाती, फिर रसोई में जाकर सबके लिए चाय बनाती, नाश्ता बनाती, कपड़े धोती और पूरे घर का काम करती।
लेकिन फिर भी उसे कभी किसी से प्यार के दो शब्द नहीं मिलते।
घर में सिर्फ एक इंसान था जिसे मीरा का दुख दिखाई देता था।
वह था अर्जुन।
अर्जुन अपने बड़े भाई रोहित से बहुत प्यार करता था। और वह मीरा को हमेशा अपनी बड़ी बहन की तरह मानता था।
उसे अपनी माँ का मीरा के साथ किया गया व्यवहार बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।
एक दिन सुबह मीरा आँगन में बैठकर ढेर सारे कपड़े धो रही थी।
सर्दी का मौसम था और पानी बहुत ठंडा था।
मीरा के हाथ काँप रहे थे, लेकिन वह फिर भी कपड़े धोती जा रही थी।
तभी अर्जुन वहाँ आया।
उसने देखा कि मीरा का चेहरा बहुत लाल हो रखा है और वह बार-बार चक्कर खा रही है।
अर्जुन घबरा गया।
“भाभी… आप ठीक तो हैं?”
मीरा ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा—
“हाँ अर्जुन… मैं ठीक हूँ।”
इतना कहते ही अचानक मीरा का सिर घूम गया और वह गिरने लगी।
अर्जुन ने तुरंत उसे संभाल लिया।
उसने मीरा का माथा छुआ तो उसका माथा आग की तरह तप रहा था।
“भाभी… आपको तो बहुत तेज बुखार है!”
अर्जुन तुरंत उसे कमरे में ले गया।
उसने कंबल ओढ़ाया और डॉक्टर को फोन किया।
डॉक्टर ने जांच करके कहा—
“इन्हें तेज बुखार है। इन्हें पूरा आराम चाहिए।”
डॉक्टर के जाते ही अर्जुन गुस्से में अपनी माँ के पास गया।
“माँ, भाभी बीमार हैं। फिर भी आप उनसे इतना काम करवाती हैं?”
सावित्री गुस्से में बोलीं—
“घर की बहू है वो… काम तो करेगी ही।”
अर्जुन ने दुखी होकर कहा—
“माँ, वो भी इंसान हैं।”
लेकिन सावित्री ने उसकी बात नहीं सुनी।
उस दिन के बाद अर्जुन ने मीरा का बहुत ख्याल रखना शुरू कर दिया।
वह उसे समय पर दवा देता, उसके लिए खाना बनाता और उसे हँसाने की कोशिश करता।
धीरे-धीरे मीरा के चेहरे पर थोड़ी मुस्कान वापस आने लगी।
लेकिन मोहल्ले वालों को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगे।
एक दिन पड़ोसन शांता सावित्री के पास आई और बोली—
“बहन, ज़रा अपने बेटे को संभालो। लोग कह रहे हैं कि देवर और भाभी का रिश्ता ठीक नहीं लग रहा।”
यह सुनते ही सावित्री का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
उस दिन जब मीरा रसोई में काम कर रही थी, सावित्री ने उसे बहुत बुरी-बुरी बातें सुनाईं।
“तू मेरे दूसरे बेटे को भी फँसाना चाहती है?”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“माँ जी… मैंने ऐसा कुछ नहीं किया…”
लेकिन सावित्री ने उसकी एक नहीं सुनी।
उन्होंने गुस्से में मीरा को घर से निकाल दिया।
बेचारी मीरा रोती हुई अपने मायके चली गई।
लेकिन वहाँ भी उसकी जिंदगी आसान नहीं थी।
उसकी भाभी उसे रोज ताने देती—
“कब तक यहाँ बैठी रहेगी?”
मीरा चुपचाप सब सहती रही।
उधर अर्जुन को जब पता चला कि मीरा को घर से निकाल दिया गया है, तो वह बहुत परेशान हो गया।
वह तुरंत मीरा के मायके पहुँचा।
मीरा दरवाज़े के पास बैठी रो रही थी।
अर्जुन ने कहा—
“भाभी… चलिए मेरे साथ घर।”
मीरा ने आँसू पोंछते हुए कहा—
“नहीं अर्जुन… लोग हमें बदनाम करेंगे।”
अर्जुन कुछ देर चुप रहा।
फिर उसने दृढ़ आवाज में कहा—
“अगर समाज को रिश्ता चाहिए… तो मैं आपको अपना नाम देने को तैयार हूँ।”
मीरा हैरान रह गई।
“क्या मतलब?”
अर्जुन बोला—
“मैं आपसे शादी करना चाहता हूँ।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“लेकिन मैं विधवा हूँ…”
अर्जुन मुस्कुराया।
“आप इंसान भी तो हैं… आपको भी खुश रहने का अधिकार है।”
कुछ दिनों बाद अर्जुन सचमुच बारात लेकर मीरा के घर पहुँचा।
पूरा मोहल्ला यह देखकर हैरान रह गया।
ढोल नगाड़े बज रहे थे।
अर्जुन घोड़ी पर बैठा था।
मीरा की आँखों में आँसू थे।
लेकिन इस बार ये आँसू दुख के नहीं… खुशी के थे।
दोनों की शादी हो गई।
शादी के बाद अर्जुन मीरा को लेकर अपने घर पहुँचा।
सावित्री दरवाज़े पर खड़ी थीं।
कुछ देर तक वे दोनों को देखती रहीं।
फिर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने मीरा से कहा—
“बहू… मुझे माफ कर दो।”
मीरा ने उनके पैर छू लिए।
उस दिन के बाद उस घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।
और मीरा को भी आखिरकार वह प्यार और सम्मान मिल गया… जिसकी वह हमेशा से हकदार थी।

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