दो बच्चों का हक
बरामदे में रखी छोटी-सी प्लास्टिक की कार फर्श पर घूम रही थी।
उसे धक्का दे रहा था पाँच साल का रोहन और उसके पीछे-पीछे हँसता हुआ भाग रहा था तीन साल का कबीर।
दोनों की खिलखिलाहट पूरे घर में गूँज रही थी।
दरवाज़े के पास खड़ी रश्मि उन दोनों को देख रही थी।
उसकी आँखों में खुशी भी थी और हल्का-सा डर भी।
तभी अंदर से तेज आवाज आई—
“रश्मि, कितनी बार कहा है उस बच्चे को यहाँ मत लाया कर!”
ये आवाज थी उसकी सास शकुंतला देवी की।
रश्मि चुपचाप अंदर चली गई।
शकुंतला देवी कुर्सी पर बैठी नाराज़ चेहरा बनाए बोलीं—
“हमने साफ-साफ कहा था कि हमें तेरे बेटे से कोई मतलब नहीं। तू हमारे घर में रोहन की देखभाल के लिए आई है, किसी और के बच्चे के लिए नहीं।”
रश्मि ने धीरे से कहा
“माँ जी… वो भी मेरा ही बेटा है।”
“तो अपने मायके में पाल उसे। यहाँ मत लाया कर।”
इतना कहकर शकुंतला देवी ने मुँह फेर लिया।
रश्मि कुछ नहीं बोली।
उसकी नज़र फिर से बाहर खेलते दोनों बच्चों पर चली गई।
रोहन ने कबीर को अपनी चॉकलेट का आधा हिस्सा दे दिया था।
दोनों ऐसे खेल रहे थे जैसे सगे भाई हों।
रश्मि की आँखें भर आईं।
रश्मि की जिंदगी पहले ऐसी नहीं थी।
उसकी पहली शादी अमन से हुई थी।
दोनों बहुत खुश थे।
कुछ ही सालों में उनके घर कबीर का जन्म हुआ।
सब कुछ ठीक चल रहा था।
लेकिन एक सड़क हादसे में अमन की मौत हो गई।
एक पल में रश्मि की पूरी दुनिया बदल गई।
ससुराल वालों ने कुछ महीने तो साथ रखा, लेकिन धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदलने लगा।
एक दिन साफ कह दिया—
“हम और जिम्मेदारी नहीं उठा सकते। अपने मायके चली जाओ।”
रश्मि कबीर को लेकर अपने पिता के घर आ गई।
उसके पिता रिटायर्ड क्लर्क थे।
घर में पहले ही आर्थिक परेशानी थी।
रश्मि ने नौकरी ढूँढनी शुरू कर दी और एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी।
वहीं उसकी मुलाकात रोहन से हुई।
रोहन उस स्कूल में पढ़ता था।
उसे रोज उसकी दादी शकुंतला देवी लेने आती थीं।
एक दिन उन्होंने रश्मि से बात करते-करते उसकी पूरी कहानी जान ली।
उनका बेटा निखिल भी विधुर था।
उसकी पत्नी की बीमारी से मौत हो चुकी थी।
घर में निखिल और पाँच साल का रोहन ही थे।
कुछ दिनों बाद शकुंतला देवी ने रश्मि के पिता से शादी की बात की।
लेकिन एक शर्त थी—
“रश्मि हमारे घर आ सकती है, लेकिन उसके बेटे की जिम्मेदारी हम नहीं लेंगे।”
रश्मि के पिता बहुत परेशान थे।
घर की हालत खराब थी।
भाई-भाभी भी रश्मि और कबीर को लेकर खुश नहीं थे।
काफी समझाने के बाद रश्मि ने शादी के लिए हाँ कर दी।
लेकिन उस दिन उसने अपने पिता से एक ही बात कही थी—
“पापा, कबीर को कभी अकेला मत छोड़ना।”
पिता ने वादा किया था।
शादी के बाद रश्मि निखिल के घर आ गई।
वह बहुत समझदार थी।
धीरे-धीरे उसने पूरे घर को संभाल लिया।
रोहन भी उससे बहुत जल्दी घुल-मिल गया।
वह उसे “मम्मा” कहकर बुलाने लगा।
निखिल भी रश्मि की इज्जत करता था।
सब कुछ ठीक चल रहा था।
लेकिन रश्मि के दिल में हमेशा कबीर की याद रहती थी।
जब वह रोहन को गोद में लेकर कहानी सुनाती थी, तब उसे कबीर का चेहरा याद आता था।
कई बार निखिल उसे कबीर से मिलने मायके ले जाता था।
लेकिन उसे घर लाने की बात कभी नहीं हुई।
कुछ साल बाद अचानक रश्मि के पिता बहुत बीमार पड़ गए।
डॉक्टर ने बताया कि उन्हें गंभीर बीमारी है।
अब वह कबीर की देखभाल नहीं कर सकते थे।
रश्मि का भाई-भाभी भी साफ मना कर चुके थे।
आखिरकार रश्मि के पिता कबीर को लेकर उसके ससुराल पहुँचे।
लेकिन शकुंतला देवी ने साफ मना कर दिया।
“हमारे घर में इस बच्चे के लिए जगह नहीं है।”
रश्मि चुपचाप सब सुनती रही।
उसके पिता कबीर को लेकर वापस चले गए।
उस रात रश्मि बहुत रोई।
निखिल भी चुप था।
कुछ दिन बाद अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।
दरवाज़ा खोलते ही रश्मि हैरान रह गई।
उसके पिता कबीर को गोद में लिए खड़े थे।
लेकिन उनके साथ निखिल भी था।
निखिल ने मुस्कुराते हुए कहा—
“आज से कबीर यहीं रहेगा।”
अंदर से शकुंतला देवी की आवाज आई—
“क्यों? हमने कोई अनाथ आश्रम खोल रखा है क्या?”
निखिल ने शांत आवाज में कहा—
“माँ, अगर रोहन को माँ का प्यार मिल सकता है, तो कबीर को उसकी माँ क्यों नहीं मिल सकती?”
घर में कुछ देर सन्नाटा छा गया।
रोहन दौड़ता हुआ आया और कबीर का हाथ पकड़ लिया।
“चलो भाई, मेरे कमरे में खिलौने हैं।”
दोनों बच्चे अंदर भाग गए।
रश्मि की आँखों से आँसू बहने लगे।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद जिंदगी इतनी बेरहम भी नहीं होती।
कभी-कभी सही समय पर सही इंसान साथ खड़ा हो जाए, तो कई जिंदगियाँ बदल जाती हैं।

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