सम्मान की कीमत

 

Indian family conflict scene showing daughter-in-law arguing with mother-in-law and in-laws in a traditional household, expressing emotional tension and self-respect


दरवाज़े के पास रखी चप्पलों की आवाज़ से ही पता चल जाता था कि घर में कौन आया है। उस दिन भी जैसे ही चप्पलें खिसकीं, राधा ने समझ लिया—सासू माँ लौट आई हैं।


लेकिन आज घर का माहौल कुछ अलग था।


हॉल में तेज़ आवाज़ें गूंज रही थीं। राधा के देवर अमन और ननद कविता उससे उलझे हुए थे। और इस बार राधा भी चुप नहीं थी।


"भाभी, आपको कितनी बार कहा है कि हमारे सामने फोन पर हंस-हंसकर बात मत किया करो," कविता ने तीखे स्वर में कहा।


"और ये क्या तरीका है? घर में सबके रहते आप अपने मन से काम करती हो," अमन ने भी जोड़ दिया।


राधा ने गहरी सांस ली, फिर शांत लेकिन सख्त आवाज़ में बोली, "मैंने क्या गलत किया है? अपने पति से बात करना गलत है क्या?"


इतने में सासू माँ, शकुंतला देवी अंदर आईं। उन्होंने एक नजर सब पर डाली, और बिना कुछ पूछे सीधे राधा पर बरस पड़ीं—


"राधा! ये क्या तरीका है? देवर-ननद से ऐसे बात करते हैं क्या? थोड़ी तो समझदारी रखो।"


राधा ने खुद को संभालते हुए कहा, "माँ जी, पहले पूरी बात तो सुन लीजिए…"


"हमें कुछ नहीं सुनना," शकुंतला देवी ने बीच में ही रोक दिया, "छोटे हैं वो तुमसे, मजाक कर रहे होंगे। तुम ही दिल पर ले लेती हो।"


राधा की आंखों में इस बार आंसू नहीं, बल्कि ठहराव था।


"माँ जी, छोटे हैं तो क्या हुआ? हर बार मुझे ही क्यों समझाया जाता है? क्या कभी आपने इन्हें भी समझाया है?"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


लेकिन शकुंतला देवी को ये बात चुभ गई।


"हमारे जमाने में बहुएं सिर झुकाकर रहती थीं। जवाब देना तो दूर, आंख उठाकर भी नहीं देखती थीं," उन्होंने कहा।


राधा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "और उसी जमाने में बहुत सी बहुएं चुप रहकर अंदर ही अंदर टूट भी जाती थीं, माँ जी।"


इतना कहकर वो वहां से चली गई।


पीछे अमन और कविता ने आग में घी डालना शुरू कर दिया।


"माँ, आपने भाभी को बहुत सिर पर चढ़ा रखा है," कविता बोली।


"हाँ माँ, आजकल की बहुएं बस मौका ढूंढती हैं हावी होने का," अमन ने भी कहा।


धीरे-धीरे शकुंतला देवी के मन में भी यही बैठने लगा कि गलती राधा की ही है।



राधा की शादी को डेढ़ साल हो चुका था।


उसका पति रोहन शहर से बाहर नौकरी करता था। महीने में एक-दो बार ही आ पाता था।


घर में राधा ही सब संभालती थी—खाना, सफाई, दवाइयाँ, रिश्तेदारों की देखभाल… सब कुछ।


लेकिन बदले में उसे सिर्फ ताने मिलते।


कविता हर बात पर टोकती— "ये कपड़े क्यों पहने?" "इतनी देर तक क्यों सोई?" "इतना हंसने की क्या जरूरत थी?"


और अमन… वो तो जैसे हर समय निगरानी करता रहता था।


एक दिन तो हद ही हो गई।


राधा अपनी माँ से फोन पर बात कर रही थी। तभी अमन चुपचाप दरवाज़े के पास खड़ा होकर सब सुनने लगा।


फोन रखते ही उसने ताना मारा, "बहुत शिकायतें हो रही हैं हमारी?"


राधा ने पहली बार सख्ती से कहा, "आपको मेरी बातें सुनने का कोई हक नहीं है।"


अमन हंस पड़ा, "इस घर में रहकर प्राइवेसी की बात करती हो?"


और जैसे ही राधा ने जवाब दिया, वही पुराना खेल शुरू—शिकायत, ताने, और फिर सास की डांट।



उस रात राधा ने फैसला कर लिया।


जब रोहन का फोन आया, उसने साफ कहा, "मैं यहाँ अब और नहीं रह सकती। या तो आप मुझे अपने साथ ले जाइए, या फिर…"


रोहन कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, "ठीक है, इस बार तुम मेरे साथ चलो।"



राधा के जाने के बाद घर का संतुलन बिगड़ गया।


अब ना समय पर खाना बनता था, ना घर ठीक से चलता था।


कविता को पहली बार समझ आया कि जिम्मेदारी क्या होती है।


अमन को भी एहसास हुआ कि सिर्फ बोलना आसान होता है, निभाना नहीं।


और शकुंतला देवी…


वो अक्सर चुपचाप बैठी रहतीं।


एक दिन उन्होंने रोहन को फोन किया, "बेटा, राधा को वापस भेज दो… घर सूना लगता है।"


रोहन ने फोन राधा को दे दिया।


राधा ने शांत स्वर में कहा, "माँ जी, मैं मिलने जरूर आऊंगी। लेकिन अब वहीं रहूंगी जहाँ मुझे सम्मान मिले।"


शकुंतला देवी की आंखों में आंसू आ गए।


उन्हें अब समझ आ चुका था—


घर चलाने के लिए सिर्फ रिश्ते नहीं, सम्मान और समझदारी भी जरूरी होती है।




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