अपना घर, अपना हक
सुबह की पहली किरण जब खिड़की से अंदर आई, तो घर में रोशनी तो फैल गई… लेकिन रीना के मन का अंधेरा वैसा ही बना रहा।
रसोई में खड़ी वो चाय बना रही थी, लेकिन उसकी उंगलियाँ जैसे आदत से चल रही थीं… दिल तो कहीं और अटका हुआ था।
रात भर उसकी आँखों ने नींद को छुआ तक नहीं था। तकिए पर अब भी सूखे आँसुओं के निशान थे।
“क्या सच में मैं सिर्फ पैसों के लिए इस घर में हूँ…?”
उसने खुद से पूछा… और जवाब में सन्नाटा मिला।
तभी पीछे से सास, कमला देवी की आवाज़ आई—
“बहू, चाय बनी क्या? और हाँ… आज अपने भाई को फोन कर देना। अमित को पैसों की जरूरत है।”
रीना के हाथ एक पल के लिए रुक गए।
चाय उबलकर बाहर आने लगी… जैसे उसके अंदर का दर्द भी अब बाहर निकलना चाहता हो।
उसने गैस बंद की… और बहुत धीरे से कहा—
“माँजी… अब मैं मायके से पैसे नहीं मांगूंगी…”
कमला देवी जैसे सुनकर भी नहीं समझीं—
“क्या कहा तूने?”
रीना ने इस बार थोड़ा मजबूत होकर कहा—
“मैं अब अपने घरवालों से पैसे नहीं मांगूंगी… कभी नहीं…”
“अरे, ये कैसी बातें कर रही है?” कमला देवी की आवाज़ ऊँची हो गई,
“शादी के बाद लड़की का घर ससुराल होता है! मायका तो ऐसे ही काम आता है!”
रीना की आँखों में अचानक नमी उतर आई—
“मायका काम आता है… माँजी… लेकिन उसे लूटा नहीं जाता…”
इतने में अमित आ गया—
“क्या हो रहा है सुबह-सुबह?”
कमला देवी ने तुरंत कहा—
“तेरी पत्नी अब तेरे लिए अपने मायके से पैसे नहीं लाएगी!”
अमित का चेहरा सख्त हो गया—
“रीना, ये सच है?”
रीना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“हाँ… ये सच है।”
“तो तुम चाहती क्या हो?” अमित की आवाज़ में गुस्सा साफ था,
“मैं अकेला सब संभालूँ? मैं टूट जाऊँ… और तुम्हें फर्क भी न पड़े?”
रीना का दिल जैसे चीर गया…
“मैं चाहती हूँ कि हम मिलकर संभालें… लेकिन अपने-अपने घरों को तोड़कर नहीं…”
अमित ने गुस्से में कहा—
“अगर तुम मेरे साथ नहीं दे सकती… तो इस घर में रहने का कोई हक नहीं है तुम्हारा!”
ये शब्द… जैसे किसी ने रीना के दिल में गहरे उतार दिए हों।
कमला देवी भी बोलीं—
“हाँ, ऐसी बहू का क्या फायदा जो पति के काम न आए?”
रीना कुछ पल तक वहीं खड़ी रही…
उसकी आँखों से अब आँसू गिरने लगे… लेकिन इस बार वो कमज़ोरी के नहीं थे…
वो एक टूटते भ्रम के आँसू थे।
वो धीरे-धीरे अपने कमरे की तरफ बढ़ी…
हर कदम जैसे एक रिश्ते से दूर जा रहा था।
कुछ देर बाद वो वापस आई… हाथ में एक पुरानी फाइल थी…
जिसे उसने सालों से संभालकर रखा था… बिना किसी को बताए।
“ये क्या है?” अमित ने चिढ़कर पूछा।
रीना ने फाइल खोली… उसके हाथ हल्के काँप रहे थे—
“ये इस घर के कागज़ हैं…”
अमित हँस पड़ा—
“तो? इससे क्या बदल जाएगा?”
रीना की आँखों से एक आँसू गिरा…
लेकिन आवाज़ अब स्थिर थी—
“सब कुछ…”
कमला देवी और अमित दोनों चुप हो गए।
“ये घर… मेरे नाम है…”
कमरे में जैसे समय ठहर गया।
“पापा ने शादी से पहले ही ये घर मेरे नाम कर दिया था…”
रीना की आवाज़ भर्रा गई—
“उन्होंने कहा था… ‘बेटा, जिंदगी में कभी खुद को मजबूर मत बनने देना…’”
उसने फाइल बंद कर दी…
“मैंने कभी ये बात इसलिए नहीं बताई… क्योंकि मैं रिश्ते बचाना चाहती थी… अधिकार जताना नहीं…”
अमित की आँखों में अब घबराहट थी—
“रीना… तुम… तुम ऐसा नहीं कर सकती…”
रीना ने धीरे से कहा—
“मैं कुछ गलत नहीं कर रही… बस अपने आत्मसम्मान को बचा रही हूँ…”
उसने दरवाज़े की तरफ देखा… फिर वापस उनकी तरफ—
“मैं आपको घर से निकाल नहीं रही… क्योंकि मैं अभी भी इस रिश्ते की इज्जत करती हूँ…”
उसकी आवाज़ टूट गई—
“लेकिन अब इस घर में… कोई मुझे मेरे ही अस्तित्व के लिए मजबूर नहीं करेगा…”
कमला देवी के आँसू बहने लगे—
“बहू… हमें माफ कर दे… हमने तुझे समझा ही नहीं…”
रीना तुरंत उनके पास गई… उनके हाथ पकड़ लिए—
“माँजी… गलती आपकी नहीं… सोच की थी… जो अब बदल सकती है…”
अमित वहीं खड़ा रह गया…
उसकी आँखों में पछतावा था… शर्म थी… और एक डर भी—
“कहीं मैं सच में सब कुछ खो न दूँ…”
दिन बीतते गए…
घर में अब आवाज़ें कम थीं… लेकिन सुकून ज्यादा था।
एक शाम…
रीना बालकनी में बैठी थी… आसमान को देखते हुए…
जैसे अपने टूटे हुए हिस्सों को जोड़ रही हो।
कमला देवी चाय लेकर आईं—
“बहू… तेरी पसंद की अदरक वाली चाय…”
रीना ने मुस्कुराकर कप लिया—
“धन्यवाद माँजी…”
अमित भी धीरे से पास आकर बैठ गया—
“रीना…”
“हम्म…”
“मुझे माफ कर दो…”
उसकी आवाज़ भर आई—
“मैंने तुम्हें समझा ही नहीं… तुम्हें इस्तेमाल करना चाहा…”
रीना की आँखें नम हो गईं—
“गलती मान लेना ही सबसे बड़ा सुधार होता है…”
अमित ने धीरे से कहा—
“अब से… मैं तुम्हारे साथ चलूँगा… तुम्हारे ऊपर नहीं…”
रीना ने हल्की मुस्कान दी—
“बस यही तो चाहिए था…”
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था…
लेकिन इस बार अंधेरा डरावना नहीं था…
क्योंकि दिल में रोशनी लौट आई थी।
सीख:
कभी-कभी सबसे बड़ा दर्द वही देता है… जिससे हम सबसे ज्यादा उम्मीद रखते हैं।
लेकिन जब इंसान खुद के लिए खड़ा होना सीख जाता है…
तभी उसकी असली कहानी शुरू होती है।

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