समझ की नई राह

Indian mother-in-law and daughter-in-law bonding in a kitchen, preparing food together with warm natural lighting, showing family harmony and mutual understanding


घर के आँगन में हल्की-हल्की धूप फैली हुई थी, लेकिन अंदर का माहौल थोड़ा खिंचा-खिंचा सा था—जैसे हर बात में एक अनकही टकराहट छुपी हो।


“अरे बहुरिया, तू अभी तक झाड़ू ही लगा रही है? रसोई में काम पड़ा है, जरा जल्दी-जल्दी हाथ चला!”

अम्मा जी ने कमरे के दरवाज़े से झांकते हुए आवाज लगाई।


राधा ने झाड़ू रोकते हुए हल्का सा सिर उठाया और बोली,

“अम्मा जी, बस ये कमरा साफ हो जाए, फिर रसोई में ही जा रही हूँ।”


“अरे काम का कोई टाइम होता है! सब कुछ टाइम पर होना चाहिए,” अम्मा जी थोड़ा नाराज़ होकर बोलीं।


राधा चुप रही। वो जानती थी—जवाब देने से बात बढ़ेगी।


थोड़ी देर बाद रसोई में…


राधा आटा गूंध रही थी और साथ ही चूल्हे पर दाल चढ़ा रखी थी। तभी फिर से अम्मा जी आ गईं।


“दाल अभी तक नहीं बनी? और ये आटा भी अभी गूंध रही है?”

उन्होंने एक साथ कई सवाल दाग दिए।


राधा ने शांत स्वर में कहा,

“अम्मा जी, सब हो जाएगा। एक-एक करके कर रही हूँ ना…”


“हमारे ज़माने में तो एक साथ चार-चार काम निपट जाते थे!” अम्मा जी गर्व से बोलीं।


राधा हल्का सा मुस्कुरा दी, लेकिन कुछ बोली नहीं।



तभी दरवाज़े पर आवाज हुई—

“माँ, मैं आ गया!”


अम्मा जी का चेहरा तुरंत खिल उठा।

“अरे मेरा बेटा आ गया!” कहकर वो जल्दी से बाहर चली गईं।


राहुल अंदर आया, बैग उतारा और सीधे रसोई में चला गया।


“अरे राधा, तुम अभी तक काम में लगी हो? थक नहीं जाती?”

उसने प्यार से पूछा।


राधा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

“थोड़ा काम तो रहता ही है…”


राहुल ने बिना कुछ कहे पानी का गिलास खुद भर लिया और पी लिया।


तभी अम्मा जी अंदर आईं और ये देखकर भड़क उठीं—

“अरे! तू खुद पानी ले रहा है? बहू क्या कर रही है?”


राहुल ने हँसते हुए कहा,

“अम्मा, मैं खुद कर सकता हूँ। इसमें क्या बड़ी बात है?”


“बड़ी बात क्यों नहीं है! अब बहू है घर में, तो उसका काम है ये सब करना!” अम्मा जी बोलीं।


राधा चुपचाप अपना काम करती रही।


शाम को…


राधा सबके लिए खाना परोस रही थी। राहुल खुद अपनी प्लेट उठाकर बैठ गया।


“देखो तो! खुद ही सब कर रहा है!”

अम्मा जी फिर से बोल पड़ीं।


इस बार राहुल थोड़ा गंभीर हो गया।


“अम्मा, एक बात पूछूँ?”

उसने धीरे से कहा।


“क्या?” अम्मा जी ने पूछा।


“जब मैं शहर में अकेला था, तब तो मैं अपने सारे काम खुद करता था… तब आपको कोई दिक्कत नहीं थी। अब शादी के बाद अगर मैं वही काम कर रहा हूँ, तो गलत कैसे हो गया?”


अम्मा जी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।


राहुल आगे बोला,

“राधा मेरा साथ देने आई है, मेरी सेवा करने नहीं। हम दोनों मिलकर घर चलाएँगे—तभी तो घर खुश रहेगा।”


राधा ने पहली बार राहुल की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक सुकून था।


अगले दिन…


राधा रसोई में काम कर रही थी। तभी अम्मा जी धीरे से अंदर आईं।


“बहुरिया…”

उन्होंने धीमे से आवाज दी।


राधा पलटी,

“जी अम्मा जी?”


“आज मैं सब्ज़ी काट देती हूँ… तू बाकी काम कर ले,”

अम्मा जी ने थोड़ा संकोच से कहा।


राधा हैरान रह गई, लेकिन मुस्कुराकर बोली,

“ठीक है अम्मा जी।”


दोनों साथ बैठकर काम करने लगीं।


थोड़ी देर बाद अम्मा जी बोलीं,

“शायद… मैं थोड़ा ज्यादा सोच रही थी। आदत जो पुरानी थी…”


राधा ने प्यार से कहा,

“कोई बात नहीं अम्मा जी, हम सब सीख ही रहे हैं।”



उस दिन घर का माहौल सच में बदल चुका था।


अब वहाँ सिर्फ काम का बोझ नहीं था, बल्कि एक-दूसरे का साथ था।

सिर्फ जिम्मेदारियाँ निभाई नहीं जा रही थीं, बल्कि उन्हें समझ के साथ बाँटा जा रहा था।


और सबसे खूबसूरत बात यह थी कि—

अब उस घर के रिश्तों में बराबरी थी, अपनापन था और सच्चा प्यार बसने लगा था।




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