फैसले की असली कीमत
दरवाज़े के बाहर रखे जूतों की कतार देखकर ही निशा समझ गई कि घर के अंदर फिर कोई तूफ़ान खड़ा है।
उसने धीरे से कुंडी खोली। अंदर कदम रखते ही उसे वही तनाव महसूस हुआ जो पिछले कुछ महीनों से इस घर का हिस्सा बन चुका था।
ड्रॉइंग रूम में उसके पति अमित इधर-उधर टहल रहे थे और उनकी माँ, कमला देवी, कोने में चुपचाप बैठी थीं। आँखें सूजी हुई थीं—जैसे बहुत देर से रो रही हों।
"लो आ गई तुम्हारी बीवी!" अब खुद ही पूछ लो, आखिर ये चाहती क्या है!"
निशा ने बैग नीचे रखा और शांत स्वर में पूछा, "क्या हुआ फिर से?"
कमला देवी ने कुछ कहना चाहा, लेकिन आवाज़ गले में ही अटक गई।
अमित बीच में ही बोल पड़ा, "माँ को अब इस घर में रहना मुश्किल लग रहा है। कह रही हैं कि या तो वो रहेंगी या तुम!"
निशा एक पल के लिए स्तब्ध रह गई।
"मैंने ऐसा कब कहा?" कमला देवी घबराकर बोलीं। "मैं तो बस इतना कह रही थी कि घर में रोज़-रोज़ का झगड़ा अब सहा नहीं जाता…"
"तो फिर मतलब क्या हुआ इसका?" अमित ने तीखे स्वर में कहा।
निशा ने गहरी सांस ली। "मतलब ये कि हम सब थक चुके हैं अमित। रोज़ का तनाव… किसी के लिए अच्छा नहीं है।"
"तो समाधान क्या है?" अमित ने चुनौती दी।
कुछ पल के सन्नाटे के बाद निशा ने धीरे से कहा,
"समाधान यह है कि हम सब एक-दूसरे को समझने की कोशिश करें… न कि एक-दूसरे से छुटकारा पाने की।"
लेकिन अमित का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।
"निशा, सीधी बात करो। तुम्हें माँ से दिक्कत है या नहीं?"
निशा ने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा,
"दिक्कत है… लेकिन माँ से नहीं, हालात से है।"
कमरा एकदम शांत हो गया।
"माँ हर बात पर मुझे टोकती हैं—मैं कैसे कपड़े पहनूँ, कैसे खाना बनाऊँ, किससे मिलूँ… मैं इंसान हूँ अमित, मशीन नहीं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैं इन्हें घर से निकालना चाहती हूँ।"
कमला देवी की आँखों से फिर आँसू बहने लगे।
"मुझे लगा… मैं ही बोझ बन गई हूँ," उन्होंने धीमे से कहा।
निशा तुरंत उनके पास बैठ गई। "ऐसा मत कहिए माँ। बस… हमें साथ रहने का तरीका बदलना होगा।"
लेकिन बात वहीं खत्म नहीं हुई।
अगले कुछ दिन फिर तनाव में बीते। छोटी-छोटी बातें बड़ी लड़ाई बन जातीं।
एक दिन अमित ने तंग आकर फैसला सुना दिया—
"मैंने तय कर लिया है। माँ को ‘शांति निवास’ में शिफ्ट कर देते हैं। वहाँ उनकी उम्र के लोग होंगे, अच्छा माहौल होगा। यहाँ रोज़ का तनाव खत्म हो जाएगा।"
निशा चौंक गई।
"आप सच में ऐसा सोच रहे हैं?" उसने पूछा।
"हाँ," अमित ने ठंडे स्वर में कहा। "सबके लिए यही बेहतर है।"
कमला देवी चुप रहीं। शायद उन्होंने हार मान ली थी।
लेकिन निशा के अंदर कुछ टूट गया।
उस रात वह सो नहीं पाई।
उसे अपनी माँ की याद आई—जो गाँव में अकेली रहती थीं। अगर कभी उसके साथ ऐसा हुआ तो?
अगले दिन, जब अमित ऑफिस चला गया, निशा कमला देवी के कमरे में गई।
"माँ, आप सच में जाना चाहती हैं?" उसने पूछा।
कमला देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"बेटा, जहाँ अपने होने का एहसास खत्म हो जाए, वहाँ रहना मुश्किल हो जाता है।"
निशा की आँखें भर आईं।
"तो फिर एक बार कोशिश करते हैं… आखिरी बार।"
उसने उसी दिन एक प्लान बनाया।
शाम को जब अमित घर लौटा, तो घर का माहौल थोड़ा अलग था।
डाइनिंग टेबल सजी हुई थी, खाना भी खास बनाया गया था।
"आज क्या बात है?" अमित ने हैरानी से पूछा।
निशा ने मुस्कुराकर कहा,
"आज हम तीनों साथ बैठकर बिना झगड़े के बात करेंगे।"
तीनों चुपचाप बैठ गए।
कुछ पल बाद निशा ने शुरू किया—
"आज कोई आरोप नहीं लगेगा। बस हर कोई अपनी बात रखेगा… और बाकी दो लोग बिना टोके सुनेंगे।"
पहले कमला देवी ने बोलना शुरू किया।
"मुझे लगता है कि मैं इस घर में फिट नहीं बैठती। मेरी आदतें पुरानी हैं… और शायद मैं इन्हें बदल भी नहीं सकती।"
फिर निशा ने कहा—
"मुझे लगता है कि मेरी हर बात पर सवाल उठता है। मुझे लगता है कि मैं कभी सही नहीं हो सकती।"
अंत में अमित की बारी आई।
वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला—
"मुझे लगता है कि मैं दोनों के बीच फँस गया हूँ… और किसी को खुश नहीं रख पा रहा।"
तीनों की आँखें नम थीं।
निशा ने धीरे से कहा—
"तो फिर हम लड़ क्यों रहे हैं? हम तीनों ही दुखी हैं…"
उस दिन पहली बार, तीनों ने एक-दूसरे को समझने की कोशिश की।
कुछ नियम बनाए गए—
कमला देवी बिना पूछे दखल नहीं देंगी
निशा भी उनकी भावनाओं का ध्यान रखेगी
और अमित बीच में फैसला सुनाने की बजाय दोनों को समझेगा
धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा।
झगड़े पूरी तरह खत्म नहीं हुए, लेकिन अब उनमें कड़वाहट नहीं थी।
एक दिन, कुछ महीनों बाद, अमित ने अचानक कहा—
"निशा, अगर उस दिन तुमने माँ को रोकने की कोशिश नहीं की होती… तो शायद आज हम तीनों अलग-अलग जगह होते।"
निशा मुस्कुरा दी।
कमला देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा—
"तूने घर बचा लिया बेटा।"
निशा ने धीरे से कहा—
"घर बचाने के लिए कभी-कभी जीतना नहीं… समझना पड़ता है।"
उस दिन घर में कोई शोर नहीं था, कोई तकरार नहीं थी—
बस एक सुकून था, जो लंबे समय बाद लौटा था।
और तीनों को समझ आ गया था—
रिश्ते तब नहीं टूटते जब लोग अलग सोचते हैं… रिश्ते तब टूटते हैं जब लोग एक-दूसरे को सुनना बंद कर देते हैं।

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