नाज़ुक परवरिश
“आर्या… बेटा धीरे-धीरे चलो… गिर जाओगी!”
रीमा ने घबराकर अपनी 5 साल की बेटी को आवाज लगाई।
आर्या पार्क में बाकी बच्चों को देख रही थी—कोई दौड़ रहा था, कोई झूले पर था, कोई मिट्टी में खेल रहा था।
लेकिन आर्या… बस खड़ी थी।
उसके पैरों में नए-नए जूते थे, कपड़े बिलकुल साफ, और चेहरे पर हल्की सी झिझक।
“मम्मी… मैं झूले पर जाऊं?”
आर्या ने धीरे से पूछा।
“नहीं बेटा… गिर जाओगी। ये बच्चे बहुत तेज खेलते हैं।”
रीमा ने तुरंत मना कर दिया।
पास ही बैठी उसकी पड़ोसन सविता ये सब देख रही थी।
थोड़ी देर बाद सविता बोली—
“रीमा, उसे खेलने दो ना… बच्चे हैं, गिरेंगे तो सीखेंगे।”
रीमा ने तुरंत जवाब दिया—
“नहीं दीदी, मुझे रिस्क नहीं लेना। आजकल बहुत इंफेक्शन होते हैं, चोट लग गई तो?”
सविता चुप हो गई, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।
समय बीतता गया…
आर्या अब 8 साल की हो चुकी थी।
लेकिन उसकी आदतें नहीं बदली थीं।
वह अकेले कहीं नहीं जाती थी।
स्कूल में भी खेलकूद से दूर रहती थी।
छोटी-सी बात पर डर जाती थी।
एक दिन स्कूल से फोन आया।
“मैडम, आर्या खेलते समय हल्का सा गिर गई थी… लेकिन वो बहुत डर गई और रोने लगी। बाकी बच्चे तो तुरंत उठकर खेलने लगे।”
रीमा घबरा गई और तुरंत स्कूल पहुंची।
आर्या को सीने से लगाकर बोली—
“कुछ नहीं हुआ बेटा… मम्मी है ना…”
लेकिन पहली बार… टीचर ने धीरे से कहा—
“मैडम, अगर आप बुरा ना मानें… तो एक बात कहूं?”
रीमा ने हैरानी से देखा—
“जी कहिए…”
“आप अपनी बेटी को बहुत संभाल रही हैं… शायद जरूरत से ज्यादा। इसलिए वो छोटी-छोटी चीज़ों से भी डरने लगी है।”
रीमा थोड़ा असहज हो गई—
“मैं तो बस उसका ध्यान रखती हूं…”
टीचर मुस्कुराईं—
“ध्यान रखना और उसे मजबूत बनाना—दोनों अलग बातें हैं।”
उस दिन रीमा बहुत सोच में पड़ गई।
घर आकर उसने देखा—
आर्या अकेले बैठी थी, हाथ में रंग भरने की किताब थी… लेकिन बाहर खेलने की हिम्मत नहीं थी।
रीमा उसके पास बैठी और पूछा—
“बेटा… तुम बाकी बच्चों के साथ क्यों नहीं खेलती?”
आर्या ने मासूमियत से कहा—
“मम्मी… आप ही तो कहती हो कि गिर जाऊंगी… चोट लग जाएगी… इसलिए डर लगता है।”
ये सुनकर रीमा जैसे अंदर से हिल गई।
उसे एहसास हुआ—
जिस चीज़ से वो अपनी बेटी को बचा रही थी… वही डर उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया।
अगले दिन…
रीमा खुद आर्या को पार्क ले गई।
“जाओ बेटा… खेलो,”
उसने मुस्कुराते हुए कहा।
आर्या ने हैरानी से पूछा—
“सच में मम्मी… गिर गई तो?”
रीमा ने प्यार से जवाब दिया—
“तो उठ जाना… मैं यहीं हूं।”
आर्या धीरे-धीरे आगे बढ़ी…
पहले झूले के पास गई… फिर स्लाइड पर… और फिर बाकी बच्चों के साथ खेलने लगी।
थोड़ी देर बाद वो सच में गिर गई…
रीमा का दिल एक पल के लिए रुक गया…
लेकिन इस बार वह दौड़ी नहीं।
उसने दूर से ही कहा—
“कुछ नहीं हुआ… उठो बेटा!”
आर्या खुद उठी… थोड़ा मुस्कुराई… और फिर खेलने लग गई।
उस दिन पहली बार…
रीमा को अपनी बेटी पर गर्व महसूस हुआ।
शाम को सविता ने पूछा—
“आज तो आर्या खूब खेल रही थी?”
रीमा मुस्कुराई—
“हां दीदी… आज मैंने उसे संभालना नहीं, मजबूत बनाना सीखा है।”
सीख:
बच्चों को हर गिरने से बचाओगे…
तो वो चलना ही नहीं सीख पाएंगे।
थोड़ी आज़ादी, थोड़ी चोट…
यही उन्हें जिंदगी के लिए मजबूत बनाती है।

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