औकात का आईना
घर के दरवाज़े पर खड़ी रीमा की आँखों में थकान भी थी और उम्मीद भी। हाथ में दवाईयों का छोटा सा पैकेट था और मन में आने वाले बच्चे के सपने। आठवां महीना चल रहा था, फिर भी वह दिनभर बुटीक में काम करके अभी-अभी लौटी थी।
अंदर आते ही उसने देखा—राहुल सोफे पर मोबाइल में व्यस्त था।
“राहुल… आज डॉक्टर ने कहा है कि अब मुझे ज़्यादा आराम करना चाहिए,” रीमा ने धीरे से कहा।
राहुल ने बिना उसकी तरफ देखे जवाब दिया, “तो कर लो आराम… मुझे क्यों बता रही हो?”
रीमा चुप हो गई। यह वही राहुल था, जिसने शादी के समय उसे हर खुशी देने का वादा किया था। लेकिन अब जैसे वह बदल चुका था।
रीमा बुटीक में सिलाई का काम करती थी। उसकी मेहनत से ही घर में खुशहाली आई थी। मगर राहुल को अब उसकी कोई परवाह नहीं थी।
असल में राहुल की जिंदगी में किसी और की एंट्री हो चुकी थी—कव्या।
कव्या उसके ऑफिस में नई आई थी—खूबसूरत, चालाक और अपने फायदे के लिए कुछ भी करने को तैयार। धीरे-धीरे उसने राहुल को अपने जाल में फंसा लिया।
अब राहुल का ज्यादातर समय कव्या के साथ बीतने लगा—महंगे कैफे, होटल, गिफ्ट्स… सब कुछ।
उधर रीमा अपने बच्चे के लिए हर दिन संघर्ष कर रही थी।
एक दिन रीमा को राहुल की शर्ट की जेब में एक होटल का बिल मिला। उसने हिम्मत करके पूछा—
“ये क्या है राहुल?”
राहुल ने झुंझलाकर कहा, “ऑफिस मीटिंग थी… हर चीज़ में शक मत किया करो।”
रीमा ने बात वहीं खत्म कर दी, लेकिन उसके दिल में एक डर बैठ गया।
कुछ ही दिनों बाद राहुल ने एक और कदम उठाया—उसने कव्या को अपने घर में रहने के लिए बुला लिया।
“बेचारी अकेली है, रहने की जगह नहीं है,” राहुल ने इंसानियत का मुखौटा पहनते हुए कहा।
रीमा को अजीब लगा, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह अपने बच्चे और घर को बचाना चाहती थी।
लेकिन सच ज्यादा दिन छुप नहीं पाया।
एक रात रीमा ने दोनों को साथ बैठकर हँसते-बात करते देखा, और उसी पल उसकी पूरी दुनिया जैसे बिखर गई।
“ये सब क्या है राहुल?” उसकी आवाज काँप रही थी।
राहुल ने साफ शब्दों में कहा, “मैं कव्या से प्यार करता हूँ… और उसी के साथ रहना चाहता हूँ।”
रीमा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“और मैं…? हमारा बच्चा?” उसने रोते हुए पूछा।
राहुल ने बेरुखी से जवाब दिया, “तुम चाहो तो मायके चली जाओ।”
इतना कहकर उसने रीमा को धक्का दिया। रीमा गिरते-गिरते बची।
उस दिन रीमा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपनी बेटी को उठाया और चुपचाप घर छोड़ दिया।
वक्त बीतता गया…
रीमा ने हार नहीं मानी।
उसने हिम्मत जुटाई और एक नई शुरुआत की। एक छोटे से कमरे में सिलाई मशीन लगाकर उसने अपना काम शुरू किया।
शुरुआत आसान नहीं थी—कभी काम कम मिलता, तो कभी पैसों की कमी परेशान करती। लेकिन रीमा ने हार मानने के बजाय दिन-रात मेहनत करना चुना।
वह अपनी छोटी-सी बेटी का ख्याल रखती, उसे पढ़ाती और साथ ही अपने काम को भी आगे बढ़ाती रही।
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। उसके काम की तारीफ होने लगी, ग्राहक बढ़ने लगे और उसका छोटा-सा काम एक बड़े बुटीक में बदल गया।
अब वही रीमा, जो कभी हालातों से हारती हुई नजर आती थी, शहर की एक जानी-मानी डिजाइनर बन चुकी थी।
उसके आत्मविश्वास में एक नई चमक थी, उसकी पहचान अब किसी की मोहताज नहीं थी—वह खुद अपनी पहचान बन चुकी थी।
कई साल बाद…
एक बड़े शॉपिंग मॉल में रीमा का नया स्टोर खुला था।
उसी दिन राहुल वहाँ आया—फटेहाल, थका हुआ, और पछतावे से भरा।
कव्या उसे छोड़कर जा चुकी थी। पैसे खत्म हो चुके थे। जिंदगी बिखर गई थी।
उसने रीमा को देखा—आत्मविश्वास से भरी, मुस्कुराती हुई, अपनी दुनिया में खुश।
वह उसके पास आया और धीमी आवाज में बोला—
“रीमा… मुझे माफ कर दो… मैं बहुत गलत था…”
रीमा ने उसे कुछ सेकंड तक देखा।
फिर एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा।
पूरा मॉल सन्न रह गया।
रीमा ने आँखों में सीधा देखते हुए कहा—
“ये उसी थप्पड़ का जवाब है… जो तुमने मुझे उस दिन दिया था… जब मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली थी।”
राहुल शर्म से सिर झुका कर खड़ा रह गया।
रीमा आगे बोली—
“मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा था राहुल… तुमने खुद अपनी किस्मत खो दी थी।”
इतना कहकर वह मुड़ी और अपनी बेटी का हाथ पकड़कर आगे बढ़ गई।
अब उसे किसी की जरूरत नहीं थी।
सीख:
“जो अपने साथ खड़े रिश्तों की अहमियत नहीं समझता, वक्त उसे उसी जगह अकेला खड़ा कर देता है जहाँ उसने कभी किसी अपने को गिराया था।”

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